Explainer: क्या है डीपफेक? AI के झूठ को पहचानने और बचने के उपाय
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Explainer: क्या है डीपफेक? AI के झूठ को पहचानने और बचने के उपाय

एआई (AI) के इस दौर ने जहां अनगिनत सुविधाएं दी हैं, वहीं डीपफेक के रूप में गंभीर चुनौती भी खड़ी कर दी है। देश के शीर्ष राजनेता, फिल्मी सितारे और खिलाड़ी तक इसकी चपेट में आ चुके हैं। जब सबसे बड़े नाम ही सुरक्षित नहीं तो आम आदमी की क्या बिसात?

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Lalit Fulara
Jul 9, 2026, 05:25 pm IST
inविज्ञान और तकनीक

एआई (AI) के इस दौर ने जहां अनगिनत सुविधाएं दी हैं, वहीं डीपफेक के रूप में गंभीर चुनौती भी खड़ी कर दी है। देश के शीर्ष राजनेता, फिल्मी सितारे और खिलाड़ी तक इसकी चपेट में आ चुके हैं। जब सबसे बड़े नाम ही सुरक्षित नहीं तो आम आदमी की क्या बिसात? आजकल व्हाट्सएप पर ऐसे वीडियो भी खूब घूम रहे हैं जिनमें कोई प्रसिद्ध अभिनेता या क्रिकेटर पैसा दोगुना करने वाली योजना की गारंटी देता दिखता है। चेहरा असली, आवाज असली, अंदाज भी असली लेकिन पूरा वीडियो झूठा। इसी धोखे का नाम है डीपफेक और यह अब किसी फ़िल्मी कहानी की बात नहीं रही। यह आम आदमी के फोन तक पहुंच चुका है।

क्या है डीपफेक?
डीपफेक शब्द अंग्रेजी के डीप लर्निंग और फेक को जोड़कर बना है। सरल भाषा में कहें तो यह AI की वह तकनीक है जो किसी व्यक्ति के ढेर सारे चित्रों और आवाज के नमूनों से सीखकर उसका हूबहू नकली चेहरा और नकली आवाज़ गढ़ देती है। कुछ साल पहले तक ऐसा करने के लिए महंगे स्टूडियो और विशेषज्ञों की जरूरत पड़ती थी। आज मोबाइल के मामूली ऐप यह काम मिनटों में कर देते हैं। यहां यह समझना ज़रूरी है कि तकनीक अपने आप में बुरी नहीं होती। इसी तकनीक से फ़िल्मों की डबिंग सुधर रही है और इतिहास के पात्र कक्षाओं में जीवंत हो रहे हैं। असली समस्या उन लोगों की नीयत है जो इसका इस्तेमाल ठगी और बदनामी के लिए कर रहे हैं।

दुरुपयोग के किस्से अब रोज़ अख़बारों में छप रहे हैं। कहीं परिजन की नकली आवाज़ में पैसे माँगे जा रहे हैं, कहीं मशहूर हस्तियों के नाम पर नकली निवेश विज्ञापन चल रहे हैं। महिलाओं की तस्वीरों से छेड़छाड़ करके उन्हें बदनाम किया जा रहा है। चुनावों के समय नेताओं के मुँह से ऐसी बातें कहलवाई जाती हैं जो उन्होंने कभी कही ही नहीं। सबसे आसान निशाना वे लोग बनते हैं जो तकनीक की दुनिया से कम परिचित हैं, फिर चाहे वे कितने ही पढ़े-लिखे क्यों न हों। भारत में सस्ता इंटरनेट घर-घर पहुँच चुका है और बिना पढ़े आगे बढ़ा देना हमारी आदत बन गई है। ऐसे में यह झूठ जंगल की आग की तरह फैलता है।

डीपफेक से कैसे बचा जाए?
अब सवाल यह है कि बचा कैसे जाए। सबसे पहला और सबसे कारगर उपाय है रुकना। जो सामग्री देखते ही आपको गुस्से, डर या लालच से भर दे, समझ लीजिए कि वह इसी मकसद से बनाई गई है। किसी भी सनसनीखेज़ वीडियो को आगे बढ़ाने से पहले खुद से तीन सवाल पूछिए- इसे पोस्ट किसने किया है? क्या यह किसी आधिकारिक या भरोसेमंद स्रोत से आया है? क्या किसी प्रतिष्ठित समाचार संस्था ने इसकी पुष्टि की है?

थोड़ा ध्यान से देखने पर डीपफेक अक्सर अपनी पोल खुद खोल देता है। ऐसे वीडियो में पलकों का झपकना अस्वाभाविक लगता है। होंठों की हरकत और आवाज़ का तालमेल बिगड़ा रहता है। चेहरे के किनारे धुंधले दिखते हैं और रोशनी तथा छाया आपस में मेल नहीं खातीं। कान, बाल या गहनों के आसपास अजीब-सी विकृति नज़र आती है। नकली आवाज़ भी सपाट लहजे, साँसों की कमी और बेतुके ठहराव से पकड़ में आ जाती है। हालाँकि तकनीक सुधरने के साथ ये कमियाँ घटती जा रही हैं इसलिए केवल आँखों पर भरोसा काफ़ी नहीं। गूगल लेंस जैसी सुविधा से किसी तस्वीर का असली स्रोत खोजा जा सकता है और पी.आई.बी. फैक्ट चेक जैसी सेवाओं से वायरल दावों की जाँच हो सकती है। सबसे ज़रूरी बात, अगर कोई परिजन फ़ोन पर पैसे माँगे तो उसके जाने-पहचाने नंबर पर वापस कॉल करके या वीडियो कॉल से पुष्टि कर लीजिए। परिवार में आपस में एक गुप्त कोड शब्द तय रखना भी आज के समय की समझदारी है।

धोखाधड़ी होने पर साइबर हेल्पलाइन पर फौरन करिये फोन
अपनी डिजिटल सुरक्षा पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरों और वीडियो की प्राइवेसी सेटिंग सीमित रखिए ताकि अनजान लोग उन तक न पहुँच सकें। अपनी या अपने बच्चों की हर छोटी-बड़ी तस्वीर सार्वजनिक रूप से डालने से पहले एक बार सोच लीजिए क्योंकि यही तस्वीरें डीपफेक बनाने वालों के लिए स्रोत का काम करती हैं। अनजान नंबर से आए कॉल पर लंबी बातचीत से बचिए क्योंकि ठग आपकी आवाज़ के नमूने रिकॉर्ड कर सकते हैं। और ओ.टी.पी. या बैंक विवरण तो किसी भी हालत में साझा न करें, चाहे सामने वाली आवाज़ कितनी भी अपनी क्यों न लगे।

फिर भी अगर कभी ठगी हो जाए तो घबराने की बजाय तुरंत कदम उठाइए। पैसों की धोखाधड़ी होने पर साइबर हेल्पलाइन 1930 पर फ़ौरन कॉल कीजिए। जितनी जल्दी सूचना देंगे, रकम रुकने की संभावना उतनी ही ज़्यादा रहती है। राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल cybercrime.gov.in पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज हो सकती है और नज़दीकी थाने में भी रिपोर्ट लिखाई जा सकती है। हमारे क़ानूनों में पहचान की चोरी और छेड़छाड़ की गई सामग्री फैलाने पर सज़ा का प्रावधान है और शिकायत मिलने पर सोशल मीडिया कंपनियाँ भी ऐसी सामग्री हटाने के लिए बाध्य हैं। सच पूछिए तो हर दौर में झूठ ने नए रूप धरे हैं और समाज ने परख के नए तरीके सीखे हैं। जब नकली नोट आए तो हमने असली की पहचान करना सीख लिया। अब नकली चेहरे और नकली आवाज़ें आई हैं तो हमें डिजिटल परख सीखनी होगी। बात बस इतनी-सी है कि जो देखें उस पर सोचें, जो सोचें उसे जाँचें और जाँचने के बाद ही मानें या आगे बढ़ाएँ। एआई का झूठ तभी जीतता है जब हम बिना सोचे यकीन कर लेते हैं। तकनीक चाहे कितनी भी चतुर हो जाए, एक सतर्क और विवेकशील नागरिक से बड़ी उसकी कोई काट नहीं है।

Topics: Deepfake DetectionAI Deepfake ScamHow to Spot DeepfakeDeepfake Cyber SecurityDeepfake PreventionDeepfake videoWhat is DeepfakeDeepfake AIDeepfake ExplainedHow to Identify Deepfake
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