
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आजमगढ़ जिले में फर्जी और अस्तित्वहीन मदरसों से जुड़े एक बड़े घोटाले के मामले में बुधवार को मदरसा प्रबंधक की याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने मोहम्मद गालिब खान की उस याचिका को अस्वीकार कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी।
जांच में कुल 219 फर्जी मदरसों की पहचान हुई थी
यह मामला उत्तर प्रदेश सरकार के 9 जनवरी 2023 के एक पत्र से जुड़ा है, जिसके अनुसार आजमगढ़ जिले में मदरसा पोर्टल पर दर्ज 313 मदरसों की जांच की गई थी। राज्य की विशेष जांच टीम की रिपोर्ट में सामने आया कि इनमें से बड़ी संख्या में मदरसे केवल कागजों पर मौजूद हैं और उनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है। जांच में कुल 219 ऐसे फर्जी मदरसों की पहचान हुई, जिनमें से 39 मदरसों ने मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत लगभग 62.84 लाख रुपये का केंद्रीय अनुदान भी प्राप्त किया था। शेष 180 मदरसों के बारे में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के पास कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी।
सरकार के निर्देश पर 180 फर्जी मदरसों पर हुआ मुकदमा
सरकार के निर्देश पर इन 180 फर्जी मदरसों और उनके प्रबंधकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का फैसला लिया गया। इसी क्रम में आर्थिक अपराध शाखा राज्य सीआईडी लखनऊ के अधिकारी कुंवर ब्रह्म प्रकाश सिंह ने थाना अहरौला, आजमगढ़ में 16 मार्च 2025 को भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 420, 467, 468 और 471 के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी। याचिकाकर्ता मोहम्मद गालिब खान, मदरसा कैफी आजमी शिक्षण संस्थान, कलवरिया, गाजी, आजमगढ़ के प्रबंधक हैं। जांच में सामने आया कि वर्ष 2010 में इस मदरसे को तहतानिया स्तर तक अस्थायी मान्यता दी गई थी। मदरसा पोर्टल पर तीन कमरे और एक कार्यालय दिखाया गया था, लेकिन मौके पर मदरसा संचालित होता नहीं पाया गया। उस स्थान पर वास्तव में “श्री अम्बे मां चंद्रावती देवी शिक्षण संस्थान” नामक एक अलग संस्था चल रही थी।
पोर्टल पर 130 छात्रों के नामांकन का दावा किया गया था, लेकिन मौके पर इसकी पुष्टि नहीं हुई। मदरसे से जुड़ी मान्यता की फाइल भी जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी द्वारा उपलब्ध नहीं कराई गई।
कोर्ट ने भी कहा- धोखाधड़ी की नीयत से फर्जी दस्तावेज तैयार करने का मामला प्रतीत होता है
अदालत ने कहा कि यह लगभग तय है कि याचिकाकर्ता का मदरसा पोर्टल पर दर्शाए गए पते पर भौतिक रूप से मौजूद नहीं है और वहां न तो कोई कक्षा-कक्ष बना है, न कोई छात्र नामांकित है। कोर्ट ने माना कि यह स्पष्ट रूप से धोखाधड़ी की नीयत से फर्जी दस्तावेज तैयार करने का मामला प्रतीत होता है। अदालत ने यह भी कहा कि कोई भी व्यक्ति बिना किसी लाभ के ऐसा फर्जी संस्थान यूं ही स्थापित नहीं करेगा, और यह संभावना जांच का विषय है कि सरकारी पोर्टल का दुरुपयोग कर धन प्राप्त किया गया हो या करने का प्रयास किया गया हो। न्यायालय ने यह भी बताया कि सरकारी मान्यता प्राप्त मदरसे की साख का उपयोग कर विदेशी स्रोतों सहित अन्य माध्यमों से भी धन जुटाए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला जांच के शुरुआती चरण में ही एफआईआर रद्द करने योग्य नहीं है और याचिका खारिज कर दी। इस मामले के साथ आजमगढ़ जिले से जुड़े कई अन्य समान मामलों शाइस्ता परवीन, शबाना बानो, अनीश, नसीम अहमद, मोहम्मद खालिक और एहतेशाम अहमद से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई भी एक साथ की गई, हालांकि न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक मामले के अलग तथ्यों को देखते हुए सभी में अलग-अलग आदेश पारित किए जाएंगे। अदालत ने अपने आदेश की प्रति अपर मुख्य सचिव (गृह), वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आजमगढ़ और थाना अहरौला के थानाध्यक्ष को भेजने का भी निर्देश दिया है।