“पाकिस्तान ने बांग्लादेश में नरसंहार नहीं किया”, पाकिस्तानी इतिहासकार के इस झूठे बयान के क्या हैं मायने?
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“पाकिस्तान ने बांग्लादेश में नरसंहार नहीं किया”, पाकिस्तानी इतिहासकार के इस झूठे बयान के क्या हैं मायने?

जनरल याहया खान का एक संवाद कई स्थानों पर दर्ज है कि "इनके 30 लाख लोगों को मार डालो, बाकी बचे हमारे हाथों से खाएंगे।"

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jul 8, 2026, 02:47 pm IST
in विश्लेषण
1971 जमात-ए-इस्लामी ने स्थानीय जनता, विशेषकर देशभक्त बंगालियों व हिन्दुओं पर हिंसा, हत्या और अन्य युद्ध अपराधों का कहर ढाया था

1971 जमात-ए-इस्लामी ने स्थानीय जनता, विशेषकर देशभक्त बंगालियों व हिन्दुओं पर हिंसा, हत्या और अन्य युद्ध अपराधों का कहर ढाया था

पाकिस्तान के कथित इतिहासकार अदनान रशीद ने एक बार फिर से विवादित बयान देते हुए कहा कि पाकिस्तान ने 1971 के युद्ध में बांग्लादेश में नरसंहार (जीनोसाइड) नहीं किया था। यह पाकिस्तान के उस छल को एक बार फिर से बता रहा है, जो लगातार यह नकारता हुआ आ रहा है कि उसने लाखों लोगों को मारा था।

अदनान रशीद का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, जिसमें वह कहते हुए नजर आ रहा है कि पाकिस्तान ने किसी का भी जीनोसाइड नहीं किया। 1971 में तो बिल्कुल भी नहीं किया था।

पाकिस्तान का रुख बांग्लादेश को लेकर हमेशा से ही पक्षपाती रहा है। जब भारत से अलग होकर पाकिस्तान बना तो वह ईस्ट और वेस्ट पाकिस्तान के रूप में बना था। ईस्ट पाकिस्तान मौजूदा बांग्लादेश है तो वहीं वेस्ट पाकिस्तान आज का पाकिस्तान। मगर इस गठन के साथ ही बंगाली मुसलमानों के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से भेदभाव आरंभ हो गया। यह भेदभाव धीरे-धीरे बढ़ता गया और इस भेदभाव ने ईस्ट पाकिस्तान के लोगों के दिलों में यह भाव पैदा किया कि ईस्ट और वेस्ट पाकिस्तान, दो अलग-अलग पहचानें हैं, और ये लोग एक दूसरे के साथ नहीं रह सकती हैं।

जिन्ना की जिद और ईस्ट पाकिस्तान का विरोध

धीरे-धीरे लोग वेस्ट पाकिस्तान के चंगुल से निकलने के लिए छटपटाने लगे। 1948 में मोहम्मद अली जिन्ना ने उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा बनाने की घोषणा कर दी। इससे असंतोष पैदा हुआ, क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान अर्थात मौजूदा बांग्लादेश में 90% से अधिक आबादी बांग्ला बोलती थी। जिन्ना के इस निर्णय के खिलाफ पूर्वी पाकिस्तान में भाषा आंदोलन आरंभ हुआ। 21 फरवरी 1952 को ढाका में प्रदर्शन कर रहे बंगाली छात्रों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसमें कई छात्र मौत की नींद सो गए।

यह तो केवल भाषा के स्तर पर भेदभाव था। यह भेदभाव और भी स्तरों पर था। आर्थिक भेदभाव भी इस क्षेत्र के साथ हो रहा था। पूर्वी पाकिस्तान की जूट और कृषि से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा पश्चिमी पाकिस्तान के विकास कार्यों जैसे कि इस्लामाबाद को राजधानी बनाना और सेना को मजबूत करना पर खर्च किया जाता था। वहीं पूर्वी पाकिस्तान को आवंटन का बहुत कम हिस्सा मिलता था। जब वहाँ के लोगों ने इस विषय में विरोध व्यक्त किया, तो उन्हीं के खिलाफ कार्यवाही आरंभ हुई।

वहीं पश्चिमी पाकिस्तान ने सेना और प्रशासनिक सेवाओं में नियुक्तियों से पूर्वी पाकिस्तान अर्थात मौजूदा बांग्लादेश के नागरिकों को दूर रखा, जबकि देश की आबादी में बंगाली 50% के करीब थे। मगर फिर भी सरकार के शीर्ष पदों पर पाकिस्तान के पंजाबी और मुजाहिरों का ही कब्जा रहा।

पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष की चिंगारी सुलगी

ऐसी ही तमाम कार्यवाहियों के चलते पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष की चिंगारियाँ सुलगा रही थीं और 1966 से 1971 तक विद्रोह के चलते लाखों लोग मारे गए। इसी विद्रोह में नेता बनकर उभरे शेख मुजीबुर्रहमान! यह और भी चौंकाने वाला था कि ये वही शेख मुजीबुर्रहमान थे, जिन्होंने पाकिस्तान के लिए काम किया था। शेख मुजीब ने अब अपनी ही सरकार से दो-दो हाथ करने का निर्णय लिया और शेख मुजीब ने पूर्वी पाकिस्तान के लिए पूर्ण स्वायत्तता (Autonomy) की मांग करते हुए 6-सूत्रीय कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इसे सरकार झेल नहीं पाई और पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया और ‘अगरतला साजिश केस’ का झूठा मुकदमा चलाया।

दिसंबर 1970 में हुए चुनावों में मुजीबुर रहमान की आवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान की 169 में से 167 सीटें जीतकर पूरे पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया। नियम के मुताबिक मुजीब को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनना था। मगर पाकिस्तान यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि बंगाली मुसलमान उनपर शासन करेगा। और संसद सत्र को अनिश्चित काल के लिए टाल दिया। और उसके बाद शेख मुजीबुर्रहमान के आंदोलन का नेतृत्व किया और ढाका में ऐतिहासिक भाषण देते हुए नारा दिया कि “इस बार का संग्राम हमारा मुक्ति का संग्राम है, इस बार का संग्राम स्वतंत्रता का संग्राम है।” इसके बाद पाकिस्तानी सेना का वह नृशंस कार्य आरंभ हुआ, जिसे वह आज नकारता है।

पाकिस्तानी सेना ने किया नरसंहार

इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने बंगाल के लोगों का जीनोसाइड करना आरंभ कर दिया। जनरल याहया खान का एक संवाद कई स्थानों पर दर्ज है कि “इनके 30 लाख लोगों को मार डालो, बाकी बचे हमारे हाथों से खाएंगे।”

उसके बाद ऑपरेशन सर्चलाइट आरंभ हुआ और फिर वह वहशीपन आरंभ हुआ, जिसे सुनकर और पढ़कर आज भी दिल कांप जाता है। इसमें पाकिस्तानी सेना ने टैंकों और मशीनगनों के साथ ढाका विश्वविद्यालय पर हमला कर दिया। एक ही रात में सैकड़ों छात्रों, प्रोफेसरों और बुद्धिजीवियों को सोते समय या कतारों में खड़ा करके गोली मार दी गई। हिंदुओं के मोहल्लों और बंगाली पुलिस बैरकों को निशाना बनाया गया।

खून की नदियां बहने लगीं और विडंबना यह थी कि अपने लोगों पर इस अत्याचार में रजाकार, अल-बद्र और अल-शम्स भी साथी रहे और उन्होनें बंगाली हिंदुओं और मुसलमानों को मारना आरंभ कर दिया। आंकड़ों के अनुसार 30 लाख बंगालियों की हत्या की गई थी।

क्या है पाकिस्तान का दृष्टिकोण

पाकिस्तान का आधिकारिक दृष्टिकोण यह है कि – यह कोई जीनोसाइड नहीं था, चूंकि भारत बंगाली मुसलमानों को भड़का रहा था, इसलिए बंगाली मुसलमानों ने वेस्ट पाकिस्तान के साथ विद्रोह किया था। भारत के कारण पाकिस्तान में गृह युद्ध छिड़ा था और वेस्ट पाकिस्तान ने केवल उस विद्रोह को दबाने का कार्य किया था।

पाठ्यपुस्तकों में यह पढ़ाया जाता है कि पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं और भारतीय एजेंटों ने बंगाली मुसलमानों को भड़काया था और ऐसे ही बहकावे में आकर मार्च 1971 से पहले और युद्ध के दौरान, मुक्ति वाहिनी और बंगाली उग्रवादियों ने पूर्वी बंगाल में रहने वाले गैर-बंगाली लोगों (जैसे उर्दू भाषी बिहारी और पश्चिमी पाकिस्तानी नागरिक) की सामूहिक हत्याएं की थीं। इसलिए जो भी पाकिस्तानी सेना ने किया था वह और कुछ नहीं बल्कि अपने देश को एक रखने का प्रयास था, जिसे भारत के कारण वह कर न सका। वह इसे जीनोसाइड नहीं बल्कि गृह युद्ध बताता है।

यही कहा जा सकता है कि पाकिस्तान से बड़ा बेशर्म मुल्क कोई नहीं है, जो अपने ही नागरिकों को मारता है, लड़कियों के साथ बलात्कार करता है, और भी न जाने कितने अत्याचार करता है, जघन्य अपराध को स्वीकारता भी नहीं।

द ब्लड टेलीग्राम

वैश्विक और ऐतिहासिक साक्ष्य पाकिस्तान के अदनान रशीद जैसे तमाम इतिहासकारों की पोल खोलते हैं। केवल द ब्लड टेलीग्राम ही ऐसा दस्तावेज है, जो यह बताती है कि कैसे पाकिस्तानी सेना ने चुनिंदा जेनसाइड किया था। यह ढाका में तैनात अमेरिकी राजनयिक आर्चर ब्लड ने खुद अमेरिकी सरकार को भेजे गए गुप्त संदेश थे, अमेरिका पाकिस्तान का सहयोगी था, मगर उसी के राजनायिक ने ही पाकिस्तान के उस झूठ को आज तक नंगा कर रखा है, जिसके चलते वह सच को नकारता है।

Topics: 1971 का युद्धबांग्लादेश नरसंहारपाकिस्तान बांग्लादेश युद्धपाकिस्तान का झूठा बयानपाकिस्तानी इतिहासकार अदनान रशीद
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