मनुष्य झूठ बोल सकता है, लेकिन उसके शरीर के हाव-भाव और आंखें यह सच बता देती हैं कि वह झूठ बोल रहा है कि सच। आज का श्लोक इसी विश्वास को परखने पर केंद्रित है।
श्लोक
आकारैरिंगितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च।
नेत्रवक्त्रविकारैश्च लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः।।
भावार्थ-
प्राणियों के आकार से, इंगित से, चेष्टा से, भाषण से तथा नेत्र, मुख व भू-भंगिमा से अनेक हृद्गत भावों को अवगत कर लेना तथा उनके स्वभाव का परिचय प्राप्त करना बुद्धि का कार्य है।
आज क्यों है प्रासंगिक
यह श्लोक आज के बॉडी लैंग्वेज और इमोशनल इंटेलिजेंस का आधार है। कॉर्पोरेट इंटरव्यू, व्यक्तिगत रिश्तों और अभिनय की दुनिया में, सामने वाले के शब्दों से ज्यादा उसके हाव-भाव और आंखें उसके असली इरादे बता देती हैं। उसके अंतर्मन का सच बताती हैं। धोखा देने की नीयत से सचेत करती हैं।
















