हीटवेव का कहर: यूरोप में अब तक 20,000 से अधिक मौतें, फिर भी पश्चिमी मीडिया का दोगलापन देखिए
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हीटवेव का कहर: यूरोप में अब तक 20,000 से अधिक मौतें, फिर भी पश्चिमी मीडिया का दोगलापन देखिए

यूरोप की 2026 हीटवेव में 20,000 से अधिक मौतें: न्यू साइंटिस्ट रिपोर्ट में खुलासा कि ये रोकी जा सकती थीं। फिर भी पश्चिमी मीडिया चुप, जबकि भारत की अव्यवस्थाओं पर सवाल उठाता है। डबल स्टैंडर्ड की सच्चाई पढ़ें।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Jul 4, 2026, 01:42 pm IST
inविश्व
Europe heatwave

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत की अव्यवस्थाओं पर सवाल उठाने वाले लोग इन दिनों उन मौतों को छिपाने में लगे हुए हैं, जो कथित सभ्य देशों में अव्यवस्थाओं के कारण हो रही हैं। जो कथित सभ्य देशों की नीतियों के कारण हो रही हैं। पश्चिमी मीडिया अपने यहाँ घट रहे अपराधों पर मौन रहना ही चुनता है। जैसे वह ग्रूमिंग गैंग्स पर मौन रहा। वह अपने ही देश की मरती हुई और पाकिस्तानी मुसलमानों द्वारा प्रताड़ित होती रही अपनी ही बेटियों पर दशकों तक चुप रहा।

इतना ही नहीं वह कोरोना में पश्चिमी देशों में हुई अव्यवस्थाओं पर चुप रहा था। उसने नहीं दिखाया कि कैसे कोरोना काल में अमेरिका और यूरोप में मरने वालों की संख्या भारत से कहीं अधिक थी और कैसे वहाँ पर कब्रिस्तान में जगहें कम रह गई थीं। वहाँ की आबादी भारत की तुलना में बहुत कम है, परंतु फिर भी अमेरिका और यूरोप में कोविड से मरने वालों की संख्या भारत से कहीं अधिक रही, परंतु फिर भी वहाँ की मीडिया के लिए अपने देशों का चमकदार चेहरा जरूरी रहा, बजाय इसके कि उन लोगों की पीड़ा और सरकार की अव्यवस्थाएं दिखाई जातीं, जिनके कारण लाखों लोग असमय मौत का शिकार बने।

यूरोप में मौतों पर पश्चिमी मीडिया का दोगलापन

जहाँ भारत में किसी भी आपदा में कुछ मौतों को भारत की व्यवस्थागत खामियों के रूप में पश्चिम का मीडिया लिखता है और भारत में हुई मौतों को बढ़ा चढ़ाकर लिखता है, वहीं अपने देश में हो रही मौतों को बहुत ही सफाई से छिपाकर ले जाता है। यदि वह सफाई से छिपाकर नहीं भी ले जाता है, तो भी मरने वालों की पीड़ा से अधिक उसका ध्यान इस पर होता है कि कैसे इस पूरी घटना को या घटनाक्रम को मानवीय, संवेदनशील, सरकार द्वारा उठाए जा रहे प्रयासों के रूप में प्रस्तुत किया जाए। कैसे पूरी सरकार का मानवीय चेहरा दिखाया जाए, न कि प्रश्न पूछे जाएं। बल्कि वह प्रश्न पूछने वालों को हतोत्साहित करता है। ऐसा क्यों है कि अपने ही देशों में मरते हुए नागरिकों को लेकर वह सरकार की कोई जवाबदेही चाहता ही नहीं है? आखिर ऐसा क्या कारण है कि भारत के प्रति और अपने देशों के प्रति उसका दृष्टिकोण एकदम भिन्न होता है?

यूरोप में हीटवेव से हाहाकार

जैसा कि अभी हालिया हीट वेव को लेकर है। हीटवेव के कारण पूरे यूरोप में हाहाकार मचा हुआ है और रोज ही ऐसे वीडियोज़ आ रहे हैं, जो यूरोप की व्यवस्थागत कमियों पर प्रश्न उठाते हैं। वे रोज नए आंकड़ों के साथ आ रहे हैं। ये लोग हैं जो प्रश्न उठा रहे हैं कि व्यवस्थाओं का अभाव क्यों है? ये लोग कह रहे हैं कि इन हजारों मौतों को रोका जा सकता था, अगर सही कदम उठाए जाते तो!

क्या कहती है नई रिपोर्ट?

newscientist.com पर यूरोप की हीट वेव को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। इसमें पर्याप्त शोध किया गया है और यह भी कहा गया है कि गर्मी यूरोप के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। और साथ ही यूरोप की जो अवसंरचना अर्थात इंफ्रास्ट्रक्चर और यूरोप की स्वास्थ्य प्रणालियाँ हैं, वे जलवायु परिवर्तन से उपजे खतरों से लड़ने के लिए तैयार ही नहीं हैं। इस रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने आँकलन करते हुए भयावह आँकड़े प्रस्तुत किये हैं। उन्होंने यूरोप के विभिन्न देशों में जून 2026 की हीटवेव के दौरान हुई मौतों का अनुमान लगाने के लिए सांख्यकीय मौडलिंग और मृत्यु दर आंकड़ों का प्रयोग किया।

जिसके अनुसार वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि कुल मौतें 20,000 से अधिक हो चुकी हैं। जबकि उनका यह भी कहना है कि यह आँकड़े प्रारम्भिक हैं और ये और भी अधिक हो सकते हैं। क्रिस्टोफर कैलहन (Indiana University, US) की टीम ने 2015–2019 के तापमान और मृत्यु दर डेटा का प्रयोग किया और फिर तापमान और सामान्य से अधिक मौतों के बीच संबंध को निकाल कर यह निष्कर्ष दिया कि इस वर्ष जो तापमान में वृद्धि हुई है, उसके कारण कितनी मौतें हुई हैं।

इन मौतों को रोका जा सकता था

सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह है कि शोधकर्ताओं का यह कहना है कि इन मौतों को रोका जा सकता था। इंडियाना यूनिवर्सिटी के क्रिस्टोफर कल्हन का कहना है कि ये प्रारम्भिक संख्याएं हैं, और इन मौतों को रोकने के लिए तेज अनुकूलन निवेशों की जरूरत है।

यूके में University of Warwick में राकेल नुनेस ने कहा कि “यह आंकड़ा अंतिम संख्या की तुलना में एक अनुमानित आंकड़ा लगता है और असली संख्या आने में कई महीने लग सकते हैं। और क्योंकि मृत्यु प्रमाणपत्र में गर्मी एक कारण नहीं होती है। उन्होंने यह भी कहा, “संकेत साफ हैं: गर्मी अब सबसे बड़ी मौसमी आपदा है। और इनमें से अधिकांश मौतों को रोका जा सकता था।“ उन्होंने आगे कहा कि “अब हम इन घटनाओं का काफ़ी हद तक सही-सही अनुमान लगा सकते हैं; लेकिन हमने स्वास्थ्य, आवास, सामाजिक देखभाल और परिवहन जैसे क्षेत्रों में ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई है, जो इस सटीक अनुमान को असल सुरक्षा में बदल सकें। हालात के हिसाब से खुद को ढालने की रफ़्तार, जोखिम बढ़ने की रफ़्तार के साथ कदम नहीं मिला पा रही है।”

वहीं एक और शोधकर्ता डैन मिशेल (University of Bristol, UK) ने कहा कि क्रिस्टोफर का जो मोडल या अनुमान है, वह केवल तत्काल मौतों की संख्या को गिनाता है, मगर वह दीर्घकाल में होने वाली घटनाओं पर बात नहीं करता है। जैसे कि गर्मियों के कारण बदलते मानसिक स्वास्थ्य पर असर के कारण होने वाली हिंसा और मौतें! और गर्मी के कारण निरंतर शारीरिक स्वास्थ्य पर जो असर होता है, उसपर भी क्रिस्टोफर का मॉडल काम नहीं करता है।

परंतु इन रोकी जा सकने वाली मौतों पर पश्चिमी मीडिया चुप क्यों है? क्यों वह व्यवस्थागत खामियों पर बात नहीं कर रहा है?

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