गत दिनों बेंगलुरु स्थित आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर में भारतीय शिक्षण मंडल की तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रांत टोली बैठक आयोजित हुई। इसमें देश के 43 प्रांतों से आए लगभग 380 प्रतिनिधियों-कुलपति, शिक्षाविद्, शोधकर्ता, शिक्षक एवं कार्यकर्ताओं ने सहभागिता की। इसका समापन 28 जून को हुआ। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कहा कि आज विश्व अनेक संकटों और जटिल प्रश्नों से जूझ रहा है। वर्तमान वैश्विक विचारधाराएं और व्यवस्थाएं जीवन को आंशिक रूप से देखती हैं, जबकि भारत की दृष्टि जीवन, समाज, प्रकृति और समस्त सृष्टि को एकात्म रूप में समझती है।
भारत की ज्ञान परंपरा का उद्देश्य किसी पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि धर्म, संतुलन और समस्त मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है। उन्होंने कहा कि विश्व को पूर्णता प्रदान करना हमारा कार्य है। हमारी समग्र दृष्टि के आधार पर समस्त प्राणिमात्र के कल्याण के लिए भारत की वाणी को विश्व को सुनना ही होगा। यह समय की आवश्यकता भी है और अनिवार्यता भी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय दृष्टि अन्य विचारों को अस्वीकार नहीं करती, बल्कि प्रत्येक समाज के अनुभवजन्य सत्य का सम्मान करती है। भारतीय चिंतन की ‘अनेकता’ की अवधारणा सभी दृष्टिकोणों का आदर करते हुए शास्त्रार्थ और संवाद के माध्यम से सत्य के व्यापक स्वरूप को समझने का मार्ग प्रदान करती है।
उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षण मंडल का कार्य कोई सीमित संगठनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि भारत के व्यापक सभ्यतागत दायित्व का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह कार्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था के निर्माण का प्रयास है जो मनुष्य के समग्र विकास को केंद्र में रखती है तथा केवल आजीविका या आर्थिक सफलता तक सीमित नहीं रहती। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षण मंडल सदैव राजनीतिक दलों और उनकी सीमाओं से स्वतंत्र रहकर कार्य करता है। समाज और शिक्षा के क्षेत्र में दीर्घकालिक परिवर्तन के लिए वैचारिक स्वतंत्रता और मूल्यों पर आधारित दृष्टि आवश्यक है।
आज विश्व अनेक संकटों और जटिल प्रश्नों से जूझ रहा है। वर्तमान वैश्विक विचारधाराएं और व्यवस्थाएं जीवन को आंशिक रूप से देखती हैं, जबकि भारत की दृष्टि जीवन, समाज, प्रकृति और समस्त सृष्टि को एकात्म रूप में समझती है। – मोहनराव भागवत, सरसंघचालक, रा.स्व.संघ
राष्ट्र निर्माण में शिक्षा की भूमिका पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी कार्यकर्ता का सबसे महत्वपूर्ण गुण एकाग्रता और निरंतरता है। परिवर्तन केवल घोषणाओं और आयोजनों से नहीं आता, बल्कि सतत साधना, अनुशासित प्रयास और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता से आता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के संदर्भ में उन्होंने शिक्षाविदों से आह्वान किया कि वे केवल नीति के क्रियान्वयन तक सीमित न रहें, बल्कि यह भी विचार करें कि शिक्षा के माध्यम से किस प्रकार का भारत निर्मित करना है। दृष्टि के बिना कार्य अंधा होता है और कार्य के बिना दृष्टि निष्प्राण। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भारत को एक ऐतिहासिक अवसर प्रदान किया है, जिसे भारतीय अनुभव, भारतीय चिंतन और भारतीय शिक्षा मॉडल के आधार पर सार्थक बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कौशल-आधारित शिक्षा की आवश्यकता है ताकि युवा रोजगार योग्य, उद्यमी और आत्मनिर्भर बन सकें, किंतु संस्कारों से रहित कौशल समाज में असंतुलन उत्पन्न कर सकता है। भारतीय शिक्षा का उद्देश्य ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना है, जिसमें कुशल हाथ, चिंतनशील मस्तिष्क और संवेदनशील हृदय का समन्वय हो।
भारत की सभ्यतागत चेतना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की श्रेष्ठता किसी अहंकार पर नहीं, बल्कि उसके अनुभव, जीवन-दृष्टि और धर्मनिष्ठ परंपरा पर आधारित है। आज जब विश्व टिकाऊ जीवन पद्धति, संतुलित विकास और मानवीय मूल्यों की खोज में है, तब भारतीय ज्ञान परम्पराएं उसके अनेक प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत कर सकती हैं।
कार्यक्रम में श्री भागवत ने भारतीय शिक्षण मंडल की नवीन आधिकारिक वेबसाइट का लोकार्पण भी किया। वेबसाइट लोकार्पण की प्रक्रिया का संचालन भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. संजय पाठक ने किया। यह वेबसाइट भारतीय शिक्षण मंडल की गतिविधियों, विचारों, शोध एवं भारतीय शिक्षा की दृष्टि को देश-विदेश के शिक्षकों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों एवं समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य, भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानन्द जोशी, अखिल भारतीय महामंत्री डॉ. भरत शरण, अखिल भारतीय संगठन मंत्री श्री बी.आर. शंकरानंद सहित अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य उपस्थित रहे। बैठक का वृत्त तथा तीन दिवसीय चिंतन-मंथन के प्रमुख निष्कर्ष भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय संयुक्त महामंत्री श्री सुनील शर्मा ने प्रस्तुत किए।

















