प्रवृत्तिञ्च निवृत्तिञ्च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षञ्च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ! सात्विकी॥
भावार्थ-
हे अर्जुन! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग (सत्कर्म में प्रवृत्त कराने वाली) निवृत्ति-मार्ग (देहाभिमान को त्याग कर जीवनन्मुक्त की स्थिति को प्रदान करने वाली), कर्तव्य-अकर्तव्य (सदाचरण व दुराचण), भय तथा अभय प्रदान करने वाले कार्य को एवं बन्धन के हेतु, मोक्ष के हेतु को यथार्थ रूप से शीघ्र समझाने वाली होती है, वही सात्त्विकी (उत्तम) बुद्धि होती है।
आज क्या है प्रासंगिकता
गीता का यह श्लोक मानव बुद्धि की श्रेष्ठता और विवेक को बहुत ही सुंदर ढंग से परिभाषित करता है। आज के तनाव और भ्रम भरे दौर में सात्त्विक बुद्धि सही-गलत का सटीक विवेक देती है। यह हमें नैतिक निर्णय लेने, मानसिक गुलामी से बचने और सही मार्ग चुनने में मदद करती है।

















