सिंधी समाज के त्याग पर बोले सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत!
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विभाजन में सिंधी समाज ने संपत्ति नहीं, धर्म और राष्ट्र चुना, केवल जीविकोपार्जन की दौड़ शिक्षा नहीं! : डॉ. मोहन भागवत जी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने नागपुर में सिन्धु एजुकेशन सोसायटी के अमृत महोत्सव का उद्घाटन किया। उन्होंने वास्तविक शिक्षा और सिंधी समाज के संघर्षों को रेखांकित किया।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Jul 2, 2026, 06:11 pm IST
in भारत, संघ @100, महाराष्ट्र
Mohan Bhagwat Nagpur Speech Sindhu Education Society Amrit Mahotsav RSS Chief

नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने नागपुर के जरीपटका स्थित सिन्धु एजुकेशन सोसायटी के अमृत महोत्सव वर्ष (75 वर्ष) के भव्य उद्घाटन कार्यक्रम को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा उपस्थित नागरिकों को जीवन में संघर्ष, धैर्य और वास्तविक शिक्षा के महत्व पर बेहद प्रेरणादायी मार्गदर्शन दिया।

संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में विभाजन की विभीषिका के दौरान सिंधी समाज के संघर्षों को याद किया और स्पष्ट किया कि विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति को कभी अपनी दिशा नहीं बदलनी चाहिए।

सिन्धु एजुकेशन सोसायटी अमृत महोत्सव कार्यक्रम

गूगल डिस्कवर और पाठकों की त्वरित समझ के लिए इस कार्यक्रम और सरसंघचालक जी के संबोधन के मुख्य पहलुओं का विवरण नीचे दी गई तालिका में संकलित है-

कार्यक्रम एवं विमर्श का आयामआधिकारिक एवं वैचारिक विवरण
आयोजक संस्थासिन्धु एजुकेशन सोसायटी (जरीपटका, नागपुर)
ऐतिहासिक अवसरअमृत महोत्सव वर्ष (स्थापना के 75 गौरवशाली वर्ष)
मुख्य मार्गदर्शकडॉ. मोहन भागवत (सरसंघचालक, RSS)
संबोधन का मुख्य सूत्र“परिस्थिति बदले, पर जीवन की दिशा नहीं बदलनी चाहिए।”
प्रस्तुत ऐतिहासिक संदर्भडॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, भगवान श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद और सिंधी समाज का विस्थापन।

“यह उत्सव केवल आनंद का नहीं, उसके पीछे छिपे संघर्ष की गाथा का स्मरण है”

डॉ. मोहन भागवत ने संस्था की 75 वर्षों की यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि 75 वर्ष पूर्ण होने का यह उत्सव केवल उत्सव मनाने या आनंद के लिए नहीं है, बल्कि इस मुकाम के पीछे जो संघर्षों की लंबी गाथा रही है, उसे याद करने का समय है।

“परिस्थिति के सामने कभी रोना नहीं चाहिए, बल्कि निरंतर प्रयास, प्रतीक्षा और संघर्ष करना चाहिए। जीवन में कभी भी कठिन परिस्थितियों से भागना नहीं चाहिए। पलायन करने, हट जाने या निराश होकर बैठ जाने से केवल अपकीर्ति (बदनामी) मिलती है। इसलिए हर हाल में मैदान में डटे रहना और अड़े रहना ही मनुष्यता है। ठीक वैसे ही, जैसे कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पलायन करने से रोका था और कर्म का संदेश दिया था।” – डॉ. मोहन भागवत जी, सरसंघचालक

Mohan Bhagwat Nagpur Speech Sindhu Education Society Amrit Mahotsav RSS Chief

जब असफलता के बाद ऋषिकेश चले गए थे डॉ. कलाम: सुनाया प्रेरक प्रसंग

विद्यार्थियों में उत्साह का संचार करने के लिए संघ प्रमुख ने देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के जीवन का एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग साझा किया।

  • कलाम साहब की असफलता: डॉ. कलाम जब एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की परीक्षा और अपने शुरुआती करियर में असफल हो गए थे, तो वे बेहद निराश और हताश हो गए थे।
  • ऋषिकेश में मिला मार्ग: इसी घोर निराशा के बीच वे ऋषिकेश चले गए। वहां उनकी मुलाकात स्वामी शिवानंद से हुई।
  • स्वामी शिवानंद की प्रेरणा: स्वामी शिवानंद के दिव्य मार्गदर्शन से कलाम साहब को यह नई प्रेरणा मिली कि ‘जीवन में अगर एक दरवाजा बंद होता है, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि ईश्वर ने आपके लिए कोई दूसरा बड़ा दरवाजा खोल रखा है।’ इसके बाद कलाम साहब ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और देश के महान वैज्ञानिक बने।

शरणार्थी नहीं विस्थापित थे पूर्वज; विवेक जगाने वाली शिक्षा ही वास्तविक

विभाजन के दर्द और सिंधी समाज के अभूतपूर्व योगदान को रेखांकित करते हुए डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि विभाजन के समय अपना सब कुछ त्यागकर भारत आए सिंधी समाज के पूर्वज शरणार्थी नहीं थे, बल्कि वे ‘विस्थापित’ थे। उन्होंने विषम हालातों में भी अपनी अकूत संपत्ति और करियर के स्थान पर अपने सनातन धर्म और राष्ट्र को सर्वोपरि चुना। धैर्य और सतत पुरुषार्थ के बल पर ही इस समाज ने शून्य से दोबारा साम्राज्य खड़ा किया।

शिक्षा की मूल अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि जीविकोपार्जन (रोजी-रोटी कमाने) के लिए डिग्री और शिक्षा आवश्यक तो है, परंतु वह अपने आप में पर्याप्त नहीं है। वास्तविक शिक्षा वह है जो मनुष्य के भीतर उचित और अनुचित का भेद करने वाले ‘विवेक’ को जागृत करे। ऐसी नैतिक शिक्षा सबसे पहले घर से और माता के संस्कारों से आरंभ होती है, जो बाद में जीवन भर के थपेड़ों और अनुभवों से पुष्ट होती है।

सरसंघचालक जी ने भगवान बुद्ध की अमर शिक्षाओं का स्मरण कराते हुए विद्यार्थियों से कहा कि जिस भी कर्म से दूसरों को तनिक भी कष्ट पहुंचे, वह पाप की श्रेणी में आता है, इसलिए ऐसे कृत्यों से सदैव बचना चाहिए। जीवन का वास्तविक लक्ष्य केवल स्वयं के स्वार्थ के लिए जीना नहीं, बल्कि समाज और दूसरों के कल्याण के लिए जीना है। शब्दों से नहीं, बल्कि अपने आचरण के माध्यम से एक अच्छा मनुष्य बनकर दूसरों को प्रेरित करना ही जीवन का सच्चा उद्देश्य है।

Topics: डॉ मोहन भागवत नागपुरसिन्धु एजुकेशन सोसायटी अमृत महोत्सवसिंधी समाज विभाजन संघर्षविवेक जाग्रत करने वाली शिक्षाडॉ एपीजे अब्दुल कलाम ऋषिकेशजरीपटका नागपुर कार्यक्रमRSS Chief StatementPanchjanya newsMohan Bhagwat Nagpur Speech
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Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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