गोवंश हत्या प्रतिबंध के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची विजय सरकार, मद्रास HC के आदेश को चुनौती, कहा- "यह रोक सही नहीं"
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गोवंश हत्या प्रतिबंध के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची विजय सरकार, मद्रास HC के आदेश को चुनौती, कहा- “यह रोक सही नहीं”

तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के गाय और बछड़ों को काटने पर पूर्ण प्रतिबंध वाले फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सरकार का तर्क है कि यह 1958 के राज्य कानून के खिलाफ है।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Jul 2, 2026, 01:01 am IST
inभारत, तमिलनाडु
तमिलनाडु, मुख्यमंत्री जोसेफ विजय

तमिलनाडु, मुख्यमंत्री जोसेफ विजय

चेन्नई / नई दिल्ली। तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के उस बड़े आदेश को देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में चुनौती दी है, जिसमें राज्य के भीतर गायों और बछड़ों को काटने (स्लॉटर) पर पूरी तरह से बैन लगा दिया गया है। राज्य सरकार ने अपनी दलील में कहा है कि हाई कोर्ट का यह निर्देश राज्य के मौजूदा वैधानिक नियमों और पहले से लागू कानूनों के सिद्धांतों के विपरीत है।

सरकार का मानना है कि अदालत का यह निर्देश नियमों को रेगुलेट करने के बजाय उन पर पूर्ण विराम लगाता है, जो कि कानूनी तौर पर सही नहीं है।

तमिलनाडु में गोवंश हत्या से जुड़े कानून बनाम हाई कोर्ट का आदेश

तमिलनाडु सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए कानूनी तर्कों और राज्य के मौजूदा नियमों का विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट है:

लागू कानून / न्यायिक आदेशगोवंश वध को लेकर वैधानिक स्थिति
तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958सर्टिफिकेट के आधार पर 10 साल से अधिक उम्र की और ब्रीडिंग के लिए अनुपयुक्त गायों को काटने की अनुमति देता है।
मद्रास हाई कोर्ट का हालिया निर्देशराज्य में गायों और बछड़ों को काटने पर पूरी तरह से पूर्ण प्रतिबंध (Total Ban)।
पशु क्रूरता निवारण नियम (2001, 2023)जानवरों को काटने की कठोर शर्तें तय करते हैं और प्रक्रिया को रेगुलेट करते हैं, लेकिन पूरी तरह रोक नहीं लगाते।

“1958 के प्रिजर्वेशन एक्ट का हवाला”

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी विशेष अनुमति याचिका (SLP) में कहा है कि हाई कोर्ट का आदेश ‘तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958’ के प्रावधानों को नजरअंदाज करता है। इस ऐतिहासिक एक्ट के तहत यह स्पष्ट व्यवस्था दी गई है कि यदि कोई अधिकृत सरकारी अधिकारी सर्टिफिकेट जारी करता है, तो 10 साल से ज्यादा उम्र की उन गायों को काटने की वैधानिक इजाजत दी जा सकती है जो अब ब्रीडिंग (प्रजनन) या काम के लिए पूरी तरह अनुपयुक्त हो चुकी हैं।

इन अन्य कानूनों का भी दिया गया हवाला:
याचिका में कहा गया है कि राज्य में पशुओं की सुरक्षा और उनके वध को नियंत्रित करने के लिए पहले से ही एक मजबूत कानूनी ढांचा मौजूद है, जो नियंत्रण तो करता है पर पूर्ण प्रतिबंध की बात नहीं करता:

  • प्रिवेंशन ऑफ़ क्रुएल्टी टू Animals एक्ट, 1960: यह केंद्रीय कानून पशुओं के प्रति क्रूरता को रोकता है, लेकिन नियमों के तहत वध की अनुमति देता है।
  • प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू Animals (स्लॉटर हाउस) रूल्स, 2001: इसके तहत बूचड़खानों के संचालन और स्वच्छता के कड़े नियम तय हैं।
  • तमिलनाडु अर्बन लोकल बॉडीज एक्ट, 1998 और रूल्स, 2023: ये स्थानीय नियम शहरी निकायों को वध के स्थानों को रेगुलेट करने का अधिकार देते हैं।

सरकार का दावा

तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि हाई कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में अपनी न्यायिक सीमाओं को लांघा है। सरकार के मुताबिक, यह पूरा विवाद बकरीद से ठीक एक दिन पहले शुरू हुआ था।

“बीती 27 मई को बकरीद (ईद-उल-अजहा) से ठीक एक दिन पहले हिंदू मक्कल काची के जनरल सेक्रेटरी के. सूर्य प्रशांत की तरफ से मद्रास हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई थी।

याचिकाकर्ता की मूल मांग केवल इतनी थी कि त्योहार या सामान्य दिनों में जानवरों का वध खुले में न होकर केवल सरकार द्वारा तय की गई अधिकृत जगहों (स्लॉटर हाउस) पर ही होना चाहिए।

लेकिन, हाई कोर्ट ने इस मांग का दायरा बढ़ाते हुए राज्य भर में कहीं भी गायों और बछड़ों के स्लॉटर पर पूरी तरह से बैन लगाने का आदेश दे दिया।”

राज्य सरकार ने अपनी अपील में सुप्रीम कोर्ट से मद्रास हाई कोर्ट के इस आदेश पर तुरंत अंतरिम रोक लगाने की मांग की है, ताकि राज्य की वैधानिक व्यवस्था और पशुपालन से जुड़े आर्थिक व सामाजिक समीकरण प्रभावित न हों।

अब इस मामले पर देश की सर्वोच्च अदालत के रुख पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

Topics: तमिलनाडु गोवंश वध प्रतिबंध सुप्रीम कोर्टTamil Nadu Cow Slaughter Ban Supreme Courtमद्रास हाई कोर्ट गाय काटने पर रोकसुप्रीम कोर्ट तमिलनाडु सरकारबकरीद जनहित याचिका
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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