बेअदबी कानून बना मान सरकार के लिए सियासी बूमरैंग?
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बेअदबी कानून बना मान सरकार के लिए सियासी बूमरैंग?

पंजाब में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के लिए श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी को लेकर लाया गया ‘जगत ज्योति श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम’ अब यही राजनीतिक बूमरैंग साबित होता दिख रहा है।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by Mahak Singh
Jul 1, 2026, 02:50 pm IST
inपंजाब
पंजाब मुख्यमंत्री, भगवंत सिंह मान

पंजाब मुख्यमंत्री, भगवंत सिंह मान

बूमरैंग आस्ट्रेलिया के मूलनिवासियों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला वो हथियार है जो लक्ष्य भेदने में असफल होने पर मारने वाले पर ही पलटवार करता है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के लिए श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी को लेकर लाया गया ‘जगत ज्योति श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम’ अब यही राजनीतिक बूमरैंग साबित होता दिख रहा है। अकाली दल को घेरने व सिख मतदाताओं को रिझाने के लिए लाए गए इस अधिनियम में खुद सरकार फसी हुई दिख रही है।

बेअदबी मामलों की पृष्ठभूमि

पंजाब में साल 2015 के बाद अचानक गुरुद्वारों में व अन्य स्थानों पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबियों की घटनाओं की अंधेरी सी आ गई। इसको लेकर कई हिंसक आंदोलन व धरना प्रदर्शन भी हुए, जिसमें दो प्रदर्शनकारियों की मौत भी हुई। राज्य में उस समय अकाली दल बादल की सरकार थी जिसके मुख्यमंत्री स. प्रकाश सिंह बादल थे। लोगों का सरकार के प्रति गुस्सा पनपा जो 2017 बादल सरकार की विदाई का एक कारण बना। उसके बाद कांग्रेस सरकार बेअदबी  को लेकर आई और अब चुनावों को नजदीक आते देख आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस पर दांव खेला। आप का यह पासा उलटा पड़ता दिखाई दे रहा है।

अकाल तख्त के सामने सरकार  घुटनों के बल

पंजाब की राजनीति में उस समय नया मोड़ आया जब अकाल तख्त के जत्थेदार कुलदीप सिंह गडग़ज ने निर्वाचित विधानसभा को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और सदस्यों से यह स्पष्टीकरण मांगा कि उन्होंने बिना सलाह के एक पंथ से जुड़ा कानून क्यों पारित किया। संवैधानिक रूप से सदन के अंदर विधायकों द्वारा कही या की गई किसी भी बात को कहीं भी चुनौती नहीं दी जा सकती। वे केवल अध्यक्ष, न्यायालयों और जनता के प्रति ही जवाबदेह होते हैं, लेकिन जत्थेदार गडग़ज ने जनता के इन प्रतिनिधियों के साथ स्कूली बच्चों जैसा व्यवहार किया। सही उत्तर न देने पर उन्हें डांटा और एक महीने के भीतर अपना होमवर्क पूरा करने का आदेश देकर वापस भेज दिया। इस पेशी के दौरान सामने आया कि कुछ विधायकों ने तो इस कानून का प्रारूप तक नहीं पढ़ा था और बिना पढ़े इन पर हस्ताक्षर कर दिए। जब अकाल तख्त के जत्थेदार ने ‘जगत ज्योति श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम’ की कुछ धाराओं व तकनीकी शब्दों के बारे में पूछा, तो कई विधायकों ने इस संबंध में अनभिज्ञता व्यक्त की।

अकालियों के जाल में फंसे मान

भगवंत सिंह मान इतने लंबे समय से राजनीति में सक्रिय हैं, इसके बावजूद, वे अकाली दल के बुने जाल में आसानी से फंस गए। आम आदमी पार्टी अब ऐसे मोड़ पर है जहां अकाल तख्त के जत्थेदार द्वारा सुझाए गए संशोधनों को लागू करने पर भी उसे परेशानी होगी और लागू न करने पर भी वह मुश्किल में पड़ जाएगी। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने सार्वजनिक रूप से कानून में किसी भी बदलाव से इनकार कर चुके हैं, लेकिन उन्हें अपने स्टैंड पर कोहनीमोड़ लेना पड़ेगा। यदि पार्टी जत्थेदार के सुझावों को खारिज कर देती है तो वह पंथक विरोध के झंझावत में फंस जाएगी। विशेषज्ञ कहते हैं कि मान सरकार को कानून पारित करने से पहले पंथक धड़ों सहित सभी पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श करना चाहिए था। यदि मुख्यमंत्री ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति को इस प्रक्रिया में शामिल किया होता तो उसे यह समय नहीं देखना पड़ता। वर्तमान में अकाली दल बादल के अध्यक्ष सुखबीर बादल का एसजीपीसी पर पूर्ण नियंत्रण है, जिस पर आरोप हैं कि वह मनमाने ढंग से अकाल तख्त जत्थेदारों की नियुक्ति और बर्खास्तगी करती है। बादल की यह सुनियोजित रणनीति भगवंत मान के लिए संकट की घड़ी पैदा करने की थी और वे जिसमें सफल रहे। राजनीतिक क्षेत्र में अपनी स्थिति पुन: प्राप्त करने के लिए उत्सुक श्री बादल इसके लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। आम सिखों द्वारा बेअदबी विरोधी कानून का हार्दिक स्वागत अकाली दल के खेमे में खतरे की घंटी बजा चुका था। सुखबीर बादल सिख वोट बैंक छिटकने को लेकर चिंतित थे, लेकिन मान सरकार ने अपनी सूझबूझ की कमी से बादल को पंथक एजेंट पर लाभ वाली मुद्रा में ला दिया।

मुख्यमंत्री ने संवैधानिक मर्यादा पर सवाल कड़े किए

भगवंत मान की अकाल तख्त साहिब में पेश होने को लेकर अपनी राजनीतिक मजबूरियाँ हो सकती हैं, लेकिन मुख्यमंत्री के इस कदम ने संवैधानिक मर्यादा पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। गौरतलब है कि ज्ञानी जैल सिंह और प्रकाश सिंह बादल को जब बुलाया गया तो वे तुरंत अकाल तख्त साहिब नहीं गए। उन्होंने खुद पेश होने का समय तय किया था। सुरजीत सिंह बरनाला (पूर्व मुख्यमंत्री) और बूटा सिंह (पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री) ने संवैधानिक पदों से हटने के बाद ही गलतियों को माफ करवाने के लिए अकाल तख्त साहिब में पेश होने का रास्ता चुना था। लेकिन न तो मान और न ही उनकी सरकार इतना हौंसला दिखा सकी कि वह अपने पद व संवैधानिक मर्यादा का पालन करवा सके। पूरे प्रकरण में वे एक कमजोर मुख्यमंत्री और उनके विधायक अनाड़ी जनप्रतिनिधि साबित हुए हैं। रोचक बात है कि सरकार में 92 विधायक होने के बावजूद कोई प्रबुद्ध संकट प्रबंधक व कुशल मार्गदर्शक नजर नहीं आ रहा है। इस प्रकरण ने सरकार की राजनीतिक कुशलता व रणनीतिक योग्यता पर भी प्रश्न खड़े किए हैं। यह अब समय ही बातएगा कि इस राजनीतिक बूमरैंग में आप सरकार के हाथ कितने जख्मी होते हैं।

Topics: Aam Aadmi PartyPunjab NewsBhagwant Mann governmentAkal TakhtPunjab PoliticsPunjab latest NewsPunjab Sacrilege LawSacrilege LawGuru Granth Sahib sacrilege
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