नई दिल्ली (पाञ्चजन्य डिजिटल): महाभारत में जीवन, समाज और बुद्धिमत्ता को लेकर कई गूढ़ बातें हैं। आज के ‘सुभाषितम्’ में हम महाभारत के उद्योग पर्व का ऐसा श्लोक लेकर आए हैं, जो हमें जीवन की सबसे बड़ी पूंजी यानी ‘प्रज्ञा’ (सही-गलत का भेद करने वाली बुद्धि) के महत्व से परिचित कराता है।
श्लोक:
एकस्मात् कारणात् प्रज्ञां मृगयन्ते पृथग्विधाम्।
प्रज्ञालाभो हि भूतानामुत्तमः प्रतिभाति माम् ॥ (महाभारत)
हिंदी अनुवाद:
महाभारत के इस श्लोक में ‘प्रज्ञा’ को सभी सांसारिक लाभों में श्रेष्ठ बताया गया है। इसका सरल अर्थ है- “मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि संसार के समस्त लाभों में ‘प्रज्ञालाभ’ (विवेक या सही बुद्धि का मिलना) ही सबसे उत्तम और सर्वोच्च है। यही एकमात्र कारण है कि अपने जीवन का कल्याण चाहने वाले मनुष्य उस विविध रूपों वाली प्रज्ञा (बुद्धि) की खोज में निरंतर लगे रहते हैं।”
आज के दौर में प्रासंगिकता
आज के डिजिटल युग में यह श्लोक सबसे ज्यादा प्रासंगिक है। संसार में धन, संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा का लाभ अस्थायी हो सकता है, लेकिन ‘प्रज्ञा’ यानी सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता व्यक्ति का कभी साथ नहीं छोड़ती। चाहे करियर का चुनाव हो, बिजनेस का फैसला हो या पारिवारिक जीवन, यदि आपके पास विवेकपूर्ण बुद्धि (प्रज्ञा) है, तो आप हर संकट को पार कर सकते हैं। इसलिए, केवल भौतिक संसाधनों के पीछे भागने के बजाय अपनी प्रज्ञा को निखारने का प्रयास करें, क्योंकि यही आत्म-कल्याण और सफलता का एकमात्र मार्ग है।

















