गत 23 जून को नई दिल्ली में भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय महामंत्री मोहिनी मोहन मिश्र ने एक पत्रकार वार्ता में कहा कि देश में कपास उत्पादन में आ रही गिरावट का एकमात्र कारण बी.टी. कपास है।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र भेजकर स्पष्ट किया है कि कपास उत्पादन की कमी के पीछे जी.एम. (अनुवांशिक रूप से संशोधित) फसलों के पक्षकारों द्वारा फैलाया जा रहा गलत विमर्श है।
बी.टी. कपास कभी भी अधिक उपजाऊ नहीं था। जिस कीड़े पिंक बोलवार्म को नियंत्रित करने के लिए इसे विकसित किया गया था, उसे रोकने में यह पूर्णतः असफल रहा है। बी.टी. कपास के आने से देश के विभिन्न प्राकृतिक जलवायु क्षेत्रों में होने वाली कपास की पारंपरिक और देसी प्रजातियां समाप्त हो गई हैं, जिस कारण कुल उपज में भारी कमी आई है।
उन्होंने कहा कि इस संकट से मुक्ति पाने के लिए देश को दोबारा अपनी उच्च उपज वाली देसी किस्मों और पारंपरिक कृषि व्यवस्था को अपनाने की आवश्यकता है। विदेशी कंपनियों के प्रभाव और दबाव के कारण कृषि में बेतहाशा रसायनों के प्रयोग से कृषि उत्पाद जहरीले हो रहे हैं। ग्लाइफोसेट व पैराकाट डाइक्लोराइड रसायनों के बढ़ते प्रयोग से कैंसर जैसी बीमारी अब महामारी का रूप लेती जा रही है जो जनसामान्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
इस पर रोक लगनी चाहिए। कपास का उत्पादन बढ़ाने की तकनीकी की खोज करने पर पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित श्रीरंग देउबा लाड ने बताया कि देश के कपास उत्पादक किसानों को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाने के लिए देशी उन्नत बीज व तकनीकी के प्रशिक्षण की आवश्यकता है, न कि जी.एम. बीज की। उन्होंने सरकार को प्रस्ताव देते हुए कहा कि आईसीएआर द्वारा प्रमाणित कपास का उत्पादन बढ़ाने की इस तकनीकी का देशभर में प्रशिक्षण देने के लिए तैयार हैं। सभी किसानों तक इस तकनीकी को पहुंचाने के लिए सरकार को इस दिशा में सहयोग करना चाहिए।














