Explainer: किसानों से सीधे दाल-तिलहन खरीद: अमित शाह का बड़ा फैसला, 48 घंटे में भुगतान
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Explainer: किसानों से सीधे दाल-तिलहन खरीद: अमित शाह का बड़ा फैसला, 48 घंटे में भुगतान

केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने NAFED और NCCF को निर्देश दिया है कि वे किसानों से सीधे दालें और तिलहन खरीदें और 48 घंटे के अंदर भुगतान करें। इस फैसले से बिचौलिए खत्म होंगे और किसानों को MSP का पूरा लाभ मिलेगा। भारतीय किसान संघ ने फैसले का स्वागत किया।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by कुलदीप सिंह
Jun 28, 2026, 11:40 am IST
inभारत
Amit Shah dalhan tilhan

अमित शाह, केंद्रीय गृह मंत्री

देश में दालों और तिलहनों की खरीद व्यवस्था में एक बड़े बदलाव का संकेत देते हुए केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने NAFED और NCCF को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे किसानों से सीधे खरीद सुनिश्चित करें और भुगतान 48 घंटे के भीतर उनके बैंक खातों में पहुंचाएं। अब केंद्र सरकार द्वारा लिए गए इस निर्णय का सबसे पहले स्‍वागत ‘भारतीय किसान संघ’ ने किया है।

दरअसल, इस निर्णय का उद्देश्य एक ओर किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाना है, वहीं उन बिचौलिया तंत्रों को भी समाप्त करना है जो लंबे समय से कृषि व्यापार की प्रक्रिया पर प्रभाव रखते रहे हैं। सरकार के समर्थक इसे किसान हित में ऐतिहासिक कदम बता रहे हैं, जबकि इस फैसले ने एक बार फिर उन विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों पर बहस छेड़ दी है जो पिछले वर्षों में कृषि सुधारों के मुद्दे पर सामने आए थे।

खेत से बाजार तक की यात्रा में सबसे बड़ी बाधा

भारतीय कृषि व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह रही है कि किसान और अंतिम खरीदार के बीच कई स्तरों की मध्यस्थता मौजूद रहती है। किसान अपनी फसल बेचता है, लेकिन उसकी उपज का बड़ा हिस्सा विभिन्न स्तरों पर कमीशन, परिवहन, भंडारण और दलाली के रूप में खर्च हो जाता है।

सरकार का तर्क है कि यदि दालों और तिलहनों की खरीद सीधे किसानों से की जाए तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का वास्तविक लाभ उसी व्यक्ति तक पहुंचेगा जिसने फसल पैदा की है। यही कारण है कि अमित शाह ने NAFED और NCCF को निर्देश दिया है कि वे “एक-एक दाना” किसानों से सीधे खरीदें और पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएं। सरकार के अनुसार, यह केवल खरीद प्रणाली में बदलाव नहीं है बल्कि कृषि विपणन की सोच में परिवर्तन है, जिसमें किसान को व्यवस्था के केंद्र में रखा जा रहा है।

दो वर्षों की समयसीमा: केवल घोषणा नहीं, लक्ष्य भी

अमित शाह ने इस व्यवस्था को लागू करने के लिए दो वर्ष की समयसीमा तय की है। उनका कहना है कि अगले दो वर्षों में ऐसा तंत्र विकसित किया जाएगा जिसमें किसान सीधे NAFED और NCCF को अपनी उपज बेच सकेंगे और भुगतान सीधे बैंक खाते में प्राप्त करेंगे। यह लक्ष्य महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि देशभर में करोड़ों किसानों को जोड़ना, उनकी उपज का डिजिटल रिकॉर्ड बनाना, खरीद केंद्रों का विस्तार करना और भुगतान प्रणाली को मजबूत करना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है। फिर भी सरकार इसे सहकारिता आधारित कृषि सुधारों की दिशा में निर्णायक कदम मान रही है।

तकनीक बनेगी पारदर्शिता की गारंटी

इस अभियान के साथ कई नई डिजिटल पहलें भी शुरू की गई हैं। NAFED ने अपना डिजिटल नीलामी मंच Nafex.in लॉन्च किया है। इससे पहले नीलामी के लिए निजी प्लेटफॉर्मों का उपयोग किया जाता था। अब सरकार का दावा है कि अपना मंच होने से प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बनेगी।

इसे भी पढ़ें: जब जज ने कहा- इंदिरा गांधी से कह दो फैजाबाद में चाहें तो बम गिरा दें, मैं इन्हें जमानत दे रहा हूं 

दृष्टि पोर्टल

दालों और तिलहनों के भंडारण तथा स्टॉक प्रबंधन के लिए “दृष्टि” पोर्टल शुरू किया गया है। इससे वास्तविक समय में स्टॉक की जानकारी उपलब्ध रहेगी और प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ेगी।

ERP प्रणाली

संपूर्ण खरीद और प्रबंधन प्रक्रिया को डिजिटल रूप से एकीकृत करने के लिए ERP प्लेटफॉर्म भी शुरू किया गया है। सरकार का मानना है कि तकनीक का उपयोग बिचौलियों के लिए उपलब्ध अवसरों को कम करेगा और किसानों तथा सरकारी एजेंसियों के बीच सीधा संबंध स्थापित करेगा।

किसान परिवारों के लिए नई पहल

NAFED ने अपने लाभ का एक प्रतिशत हिस्सा किसानों के बच्चों की शिक्षा और करियर विकास के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया है। सरकार इसे केवल खरीद नीति नहीं, बल्कि किसान परिवारों के समग्र विकास की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है। इससे आर्थिक सहायता के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा का संदेश भी जाता है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

‘भारतीय किसान संघ’ (बीकेएस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. साई रेड्डी ने कहा, “भारत आज भी हर वर्ष लगभग 60 से 70 लाख टन दालों और 1.5 से 1.6 करोड़ टन खाद्य तेलों का आयात करता है। इसका अर्थ है कि घरेलू उत्पादन अभी भी देश की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं है। ऐसे में यदि किसानों को यह भरोसा मिल जाए कि उनकी उपज बिना किसी कटौती के सीधे सरकारी एजेंसियां खरीदेंगी, तो वे दाल और तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए अधिक प्रोत्साहित होंगे। इससे खेती का रकबा बढ़ेगा, उत्पादन बढ़ेगा और आयात पर निर्भरता कम होगी। सरकार इसी दृष्टिकोण के साथ इस योजना को आत्मनिर्भर भारत और कृषि आत्मनिर्भरता से जोड़कर देख रही है।”

उन्‍होंने कहा, “भारतीय किसान संघ की यह मांग पुरानी है कि किसानों के लिए कोई मिडिलमेन(बिचौलिया) नहीं चाहिए, इसलिए किसानों के हित के लिए वर्ष 2019 में, फिर दिसम्‍बर 2023 में (बीकेएस) संगठन ने केंद्र सरकार से मांग की थी कि वह इस मामले में निर्णय ले। आज हमें खुशी हो रही है कि सरकार ने इस दिशा में किसानों के हितों को देखते हुए निर्णय लिया है। भारतीय किसान संघ सरकार के लिए गए इस निर्णय से बहुत खुश है। इससे सीधे तौर पर देश के 25 से 35 प्रतिशत किसानों को लाभ मिल सकेगा।”

बीकेएस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. साई रेड्डी इसके साथ अपनी बात में यह भी जोड़ते हैं, “निश्‍चित तौर पर सरकार का विश्वास बना है कि प्रत्यक्ष खरीद, डिजिटल पारदर्शिता और सहकारिता आधारित ढांचा मिलकर इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभाएंगे, इसलिए ही ये निर्णय आज हम सभी के सामने आया है। NAFED और NCCF को किसानों से सीधे दालें और तिलहन खरीदने का निर्देश कृषि विपणन की पूरी संरचना को बदलने का प्रयास है। यदि यह योजना अपने घोषित स्वरूप में लागू होती है और भुगतान वास्तव में सीधे तथा समयबद्ध तरीके से किसानों तक पहुंचता है, तो इससे करोड़ों किसानों को लाभ मिलना तय है।”

दूसरी ओर भारतीय किसान संघ के मध्‍य क्षेत्र (मप्र-छग) संगठन मंत्री महेश चौधरी ने कहा, “भारत सरकार के कृषि मंत्रालय, आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 तथा ‘मिशन दलहन आत्मनिर्भरता’ की रिपोर्टों के अनुसार देश के कुल सक्रिय किसानों में लगभग 35 प्रतिशत किसान अपनी मुख्य फसल या सह-फसल (इंटरक्रॉपिंग) के रूप में दलहन और तिलहन की खेती करते हैं। देश में लगभग 2 करोड़ किसान सीधे तौर पर दलहन उत्पादन से जुड़े हुए हैं। ऐसे में इस निर्णय का लाभ स्‍वभाविक है, इन सभी किसानों को मिलेगा।”

हालांकि उन्‍होंने यह भी बताया कि मध्‍य प्रदेश जैसे कुछ राज्‍य पहले से ही सीधे एमएसपी का लाभ किसानों को पहुंचा रहे हैं, लेकिन देश के अधिकांश राज्‍यों में बिचौलियों की भूमिका है, जोकि इस निर्णय से अब समाप्‍त हो जाएगी।

क्या यह पुराने विवादों का जवाब है?

इस संबंध में भारतीय किसान संघ के ही छत्‍तीसगढ़ राज्‍य के संगठन मंत्री मनीष शर्मा का मानना है, “कृषि सुधारों और बाजार सुधारों का विरोध करने वाले कई समूहों की वास्तविक चिंता किसानों का हित नहीं बल्कि मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखना था। यदि किसान और सरकारी एजेंसियों के बीच सीधा संबंध स्थापित हो जाता है, तो लंबे समय से मौजूद कमीशन आधारित संरचनाओं का प्रभाव कम हो जाएगा। ऐसे में वे लोग स्वाभाविक रूप से असहज होंगे जिनकी आर्थिक या राजनीतिक शक्ति इस व्यवस्था से जुड़ी रही है। आज जब NAFED और NCCF को सीधे खरीद का निर्देश दिया गया है, तो यह स्पष्ट हो रहा है कि सरकार की प्राथमिकता किसानों को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाना है।”

उनका कहना है, “यदि भुगतान सीधे बैंक खातों में पहुंचता है, खरीद पारदर्शी होती है और MSP का लाभ सीधे उत्पादक तक पहुंचता है, तो इससे सबसे अधिक लाभ हमारे किसानों का है। वहीं दूसरी ओर दालों और खाद्य तेलों के आयात पर भारी खर्च देश की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डालता है। यदि किसान अधिक मात्रा में इन फसलों का उत्पादन करते हैं और उन्हें खरीद की गारंटी मिलती है, तो देश की आयात निर्भरता कम हो जाएगी, यह देश हित में है।”

भारत में दलहन एवं तिलहन कृषि का राज्यवार परिदृश्य

भारत विश्व का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक देश है और देश की कुल दलहन खेती का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल दस प्रमुख राज्यों में केंद्रित है। दलहन उत्पादन में मध्य प्रदेश अग्रणी राज्य है, जिसकी राष्ट्रीय क्षेत्रफल हिस्सेदारी 20.4 प्रतिशत है। राज्य के लगभग 45 प्रतिशत से अधिक किसान खरीफ और रबी दोनों मौसमों में चना, अरहर (तुअर) और मसूर की खेती करते हैं।

इसके बाद महाराष्ट्र का स्थान है, जिसकी हिस्सेदारी 19.6 प्रतिशत है और यहां मुख्य रूप से अरहर तथा चने का उत्पादन किया जाता है। राजस्थान 15.3 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ तीसरे स्थान पर है, जहां पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों में मूंग, मोठ और चने की खेती बड़े पैमाने पर होती है। उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत है, जबकि कर्नाटक 7.5 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में शामिल है। कर्नाटक विशेष रूप से अरहर उत्पादन के लिए जाना जाता है।

2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती हैं नौ प्रमुख तिलहन फसलें

तिलहन उत्पादन की दृष्टि से भारत में सोयाबीन, मूंगफली, सरसों सहित नौ प्रमुख तिलहन फसलें लगभग 2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती हैं। राजस्थान देश का सबसे बड़ा तिलहन उत्पादक राज्य है, जिसकी राष्ट्रीय उत्पादन में 23 से 25 प्रतिशत हिस्सेदारी है। वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान ने 10.6 मिलियन मीट्रिक टन तिलहन उत्पादन कर देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। राज्य विशेष रूप से सरसों उत्पादन में अग्रणी है। गुजरात 18 से 20 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर है और देश की कुल मूंगफली उत्पादन का लगभग 43.7 प्रतिशत हिस्सा अकेले उत्पादित करता है।

मध्य प्रदेश, जिसे ‘सोयाबीन स्टेट’ भी कहा जाता है, देश के कुल तिलहन उत्पादन में 16 से 18 प्रतिशत योगदान देता है। यहां राष्ट्रीय सोयाबीन उत्पादन का 34 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पैदा होता है। महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 12 से 14 प्रतिशत है, जहां विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में सोयाबीन तथा सूरजमुखी की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इसके अतिरिक्त आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के किसान मुख्य रूप से मूंगफली की खेती करते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पश्चिम बंगाल में सरसों प्रमुख तिलहन फसल है।

दलहन एवं तिलहन क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि तिलहन की लगभग 72 प्रतिशत खेती छोटे और सीमांत किसानों द्वारा वर्षा आधारित परिस्थितियों में की जाती है। ऐसे किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद और सहकारी संस्थाओं द्वारा प्रत्यक्ष खरीद व्यवस्था महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच का कार्य करती है। पिछले एक दशक के दौरान सरकारी प्रोत्साहन और नीतिगत हस्तक्षेपों के परिणामस्वरूप देश में दलहन उत्पादन में 43 प्रतिशत तथा तिलहन उत्पादन में 44 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। यह वृद्धि भारत की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के साथ-साथ खाद्य तेलों और दालों में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

Topics: किसानों से सीधी खरीद दाल तिलहनअमित शाह NAFED निर्देशदाल तिलहन MSP सीधी खरीददलहन तिलहन आत्मनिर्भरता
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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