आपातकाल लोकतंत्र नहीं, इंदिरा गांधी की सत्ता बचाने का फैसला था : रामबहादुर राय
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आपातकाल लोकतंत्र नहीं, इंदिरा गांधी की सत्ता बचाने का फैसला था : रामबहादुर राय

वरिष्ठ पत्रकार अजय सेतिया की पुस्तक 'आपातकाल: आंदोलन और विश्वासघात की अंतर्कथा' के विमोचन पर रामबहादुर राय ने कहा कि इंदिरा गांधी ने केवल अपनी सत्ता बचाने के लिए आपातकाल लगाया था। पढ़ें पूरी रिपोर्ट

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by Shivam Dixit
Jun 27, 2026, 09:25 pm IST
inभारत, दिल्ली
Emergency Andolan Aur Vishwasghat Book Launch Ajay Sethia Ram Bahadur Rai KN Govindacharya

नई दिल्ली । आपातकाल से पहले बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का श्रीगणेश करने वाले श्री राम बहादुर राय ने कहा है कि इंदिरा गांधी ने जय प्रकाश नारायण के सेना को सरकार का आदेश न मानने की सलाह वाल बयान के कारण नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी ने अपनी प्रधानमंत्री पद की कुर्सी बचाने के लिए देश पर आपातकाल थोंपा था।

वह प्रज्ञा प्रवाह और जिज्ञासा की ओर से राष्ट्रीय कला केंद्र में वरिष्ठ पत्रकार अजय सेतिया की नवीनतम पुस्तक ” आपातकाल : आंदोलन और विश्वासघात की अंतर्कथा” के विमोचन और आपातकाल के सबक विषय पर चर्चा में बोल रहे थे।

कार्यक्रम में आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने वाले इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय के अलावा श्री के. एन गोविंदाचार्य और श्री राज कुमार भाटिया मुख्य वक्ता थे । यहां उल्लेखनीय यह है पुस्तक लेखक अजय सेतिया और तीनों अन्य वक्ता भी आपातकाल के दौरान में जेल में रहे थे।

पुस्तक लेखक अजय सेतिया ने कहा कि सिद्धार्थ शंकर रे ने शाह आयोग के सामने कबूल किया था कि आपातकाल का फैसला जय प्रकाश नारायण के भाषण से पहले लिया जा चुका था।

उन्होंने अपनी पुस्तक के हवाले सेब्ताया कि इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति के सामने झूठ बोला था, राष्ट्रपति इतने दब्बू निकले कि इंदिरा गांधी का एपीएस आरके धवन रात ग्यारह बजे उनसे प्रधानमंत्री आवास में टाईप किए गए आपातकाल के आदेश पर दस्तखत करवा लाया था।

उन्होंने बताया कि पुस्तक में आपातकाल के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के सत्याग्रह और भूमिगत आंदोलन पर विस्तार से चर्चा की गई है, जबकि अब तक प्रकाशित अन्य पुस्तकों में इन दोनों संगठनों की अनदेखी की गई थी।

किताब में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले अनेक व्यक्तियों की भूमिका को ऐतिहासिक संदर्भों और तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया गया है। सेतिया ने कहा कि इस पुस्तक में कई ऐसे दस्तावेज और तथ्य शामिल किए गए हैं, जो पहले व्यापक रूप से सामने नहीं आए थे। इनमें बाला साहब देवरस के वे पत्र भी हैं, जिन पर समाजवादी और कम्युनिस्ट हर साल बिना आधार का बावेला मचाते हैं|

डॉ. राजकुमार भाटिया ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे नई पीढ़ी तक तथ्यात्मक रूप में पहुंचाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए इतिहास से सीख लेना समय की आवश्यकता है।

लोकतंत्र की रक्षा केवल संवैधानिक व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि नागरिकों की जागरूकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी होती है।आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर लगे प्रतिबंधों को स्मरण करते हुए उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाए रखने का आह्वान किया।

रामबहादुर राय ने कहा कि 25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल देश की आंतरिक सुरक्षा के कारण नहीं, बल्कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के खिलाफ आए फैसले और सुप्रीम कोर्ट के अर्धनारीश्वर जैसे फैसले के कारण लगाया गया था, जिसमें वह लोकसभा की सदस्य तो नहीं रही थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले तक प्रधानमंत्री पद पर रह सकती थी।

इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल लगा विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और संविधान संशोधन कर के उन कानूनों को ही बदल दिया, जिनके कारण हांईकोर्ट का फैसला उनके खिलाफ आया था।

इसलिए आपातकाल सिर्फ और सिर्फ अपनी सत्ता बचाने के लिए लिया गया राजनीतिक निर्णय था।

उन्होंने कहा कि उस समय जिन परिस्थितियों का हवाला देकर आपातकाल लगाया गया, वे वास्तविकता से परे थीं। रेलवे कर्मचारियों का आंदोलन समाप्ति की ओर था और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन भी उस स्तर पर नहीं था कि उससे देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता।

उन्होंने आपातकाल की कई खी अनकही घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का भ्रम ही देश में लोकतंत्र की बहाली का माध्यम बना था |

इंटेलिजेंस इनपुट के इस भ्रम में कि वे चुनाव जीत जाएंगी, उन्होंने लोकसभा के बढाए हुए कार्यकाल के पूरा होने से 15 महीने पहले ही चुनावों की घोषणा कर दी। यही भ्रम अंततः उनकी हार और देश में लोकतंत्र की बहाली का माध्यम बना। राय ने कहा कि इंदिरा गांधी संघ और विपक्ष की चौतरफा घेरेबंदी को भांप नहीं सकीं।

उन्होंने बताया कि भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे काले पन्नों में दर्ज 1975 के ‘आपातकाल’ को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य और अनसुने घटनाक्रम सामने आए हैं। उन्होंने बताया कि किस तरह 12 जून 1975 को घटी तीन बड़ी घटनाओं ने देश की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया और कैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भूमिगत रहकर इस तानाशाही के खिलाफ मोर्चा संभाला।

राय ने बताया कि 12 जून 1975 का दिन इंदिरा गांधी सरकार के लिए सबसे बड़ा अपशकुन साबित हुआ था। उस दिन तीन मुख्य घटनाएं घटीं। इनमें सुबह 06:00 बजे इंदिरा गांधी के सबसे भरोसेमंद सलाहकार डी.पी. धर ने अंतिम सांस ली।

सुबह 10:00 बजे: इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग (यशपाल कपूर को चुनाव एजेंट बनाने) के आरोप में इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया और शाम 04:00 बजे: गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम आए, जिसमें इंदिरा गांधी के सघन प्रचार के बावजूद कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।

इस अदालती फैसले के बाद दिल्ली के गोलमेथी चौक पर इंदिरा गांधी के समर्थन में और न्यायपालिका पर दबाव बनाने के लिए भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी।

राय ने बताया कि उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अधिवक्ता नानी पालकीवाला ने उच्चतम न्यायालय के वेकेशन जज जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर की अदालत में याचिका दायर की। 24 जून को कोर्ट ने एक बीच का रास्ता निकाला, जिसके तहत इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर तो बनी रह सकती थीं लेकिन उन्हें संसद में मतदान करने का अधिकार नहीं था।

इसके ठीक अगले दिन, 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण (जेपी) की ऐतिहासिक रैली हुई और उसी रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया।
उन्होंने खुलासा करते हुए कहा कि इस आपातकाल को लगाने के पीछे इंदिरा गांधी के तीन स्पष्ट और मुख्य उद्देश्य थे।

प्रधानमंत्री पद पर बने रहना, अदालती लड़ाई जीतना (इसके लिए संसद का विशेष सत्र बुलाकर 38वां, 39वां और 40वां संविधान संशोधन पास कराया गया, ताकि प्रधानमंत्री के चुनाव को अदालत के दायरे से बाहर किया जा सके।) और विपक्षी नेताओं तथा असहमति की आवाज़ों को जेल में डालकर पूरी तरह निष्प्रभावी कर देना।

उनके अनुसार, जब 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर प्रतिबंध लगाया गया, तो संघ ने अपनी पुरानी रणनीतियों का इस्तेमाल किया। प्रतिबंध से पहले ही सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने आंदोलन की कमान माधवराव मुले को सौंप दी थी।

उन्होंने बताया कि संघ ने सीधा अपने नाम से काम करने के बजाय ‘लोक संघर्ष समिति’ के बैनर तले देशव्यापी भूमिगत आंदोलन शुरू किया। पूरे देश को 6 हिस्सों में बांटा गया, जिसमें रज्जू भैया को राजनीतिक दलों से संपर्क और दत्तोपंत ठेंगड़ी को जन आंदोलनों की ज़िम्मेदारी दी गई। सरकारी दावों के विपरीत, संघ के 1100 से अधिक प्रचारकों में से केवल 117 ही गिरफ्तार हो सके, जबकि बाकी ने भूमिगत रहकर इंदिरा गांधी की खुफिया एजेंसियों को छकाए रखा।

उन्होंने कहा कि आपातकाल के दौरान विपक्ष में वैचारिक मतभेद भी गहरे थे। जहां एक ओर जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में ‘डायनामाइट’ जैसी क्रांतिकारी धारा चल रही थी (जिसे जनसंघ नेता वीरेन जे. शाह ने वित्तीय मदद दी थी)। इसी बीच इंदिरा गांधी ने दोहरा मापदंड अपनाते हुए वीरेन शाह को जेल भेजा लेकिन चिमनभाई पटेल के खिलाफ जांच बंद करवा दी।

इस पूरे आंदोलन में जयप्रकाश नारायण (जेपी) की भूमिका 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में महात्मा गांधी जैसी रही। उन्होंने आरएसएस, समाजवादियों और यहाँ तक कि नक्सलियों जैसी विपरीत विचारधाराओं को एक मंच पर ला खड़ा किया। लालकृष्ण आडवाणी और ओमप्रकाश त्यागी ने इस नेतृत्व को स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।

उन्होंने बताया कि नवंबर 1975 में ही संघ नेतृत्व और जेपी को यह भनक लग गई थी कि इंदिरा गांधी भ्रम में आकर जल्द ही चुनाव करा सकती हैं।

‘इकोनॉमिक टाइम्स’ के तत्कालीन संपादक हिरण्मय कारलेकर, जो इंदिरा गांधी के दौरों पर साथ रहते थे, उन्होंने इसकी जानकारी रामनाथ गोयनका के माध्यम से विपक्ष तक पहुंचाई थी। इसके बाद, संघ के वरिष्ठ नेता भाऊराव देवरस ने नवंबर में ही उत्तर प्रदेश में जनसंघ के नेताओं को 40 चुनावी सीटें चुनने के निर्देश दे दिए थे। वहीं, जेल से आने के बाद जेपी ने भी स्पष्ट संदेश दिया कि अब एकमात्र लक्ष्य “सभी लोकतांत्रिक विपक्षी दलों को एक करना” होना चाहिए।

Topics: इलाहाबाद हाईकोर्ट इंदिरा गांधीबालासाहेब देवरस पत्र विवादPanchjanya newsNational Politics BreakingEmergency Book Launch Ajay Sethiaरामबहादुर राय आपातकालके एन गोविंदाचार्यआपातकाल आंदोलन और विश्वासघात की अंतर्कथाआरएसएस भूमिगत आंदोलन 1975
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