भुवनेश्वर: स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की वर्ष 2008 में हुई हत्या के मामले में एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ओडिशा हाईकोर्ट में दायर एक नई याचिका में इस बहुचर्चित हत्याकांड की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से न्यायालय की निगरानी में जांच कराने की मांग की गई है। याचिका में विशेष रूप से न्यायमूर्ति ए.एस. नायडू आयोग की जांच रिपोर्ट के मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) से कथित रूप से गायब हो जाने के मामले को उठाया गया है।
अधिवक्ता देबाशीष होता द्वारा दायर अंतरिम आवेदन में कहा गया है कि न्यायिक आयोग की रिपोर्ट का राज्य के सर्वोच्च कार्यकारी कार्यालय से गायब होना अत्यंत गंभीर मामला है और इससे प्रशासनिक पारदर्शिता तथा न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस घटनाक्रम से यह आशंका मजबूत होती है कि मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को दबाने या साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास किया गया हो सकता है।
याचिका के अनुसार, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार अनुयायियों की 23 अगस्त 2008 को कंधमाल जिले के जलेसपेटा आश्रम में निर्मम हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया था और इसके बाद व्यापक सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति ए.एस. नायडू आयोग का गठन किया था, जिसे हत्या की परिस्थितियों और उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। आयोग ने विस्तृत जांच के बाद वर्ष 2015 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी। हालांकि, रिपोर्ट की सामग्री कभी सार्वजनिक नहीं की गई। इसी कारण समय-समय पर इसकी जानकारी सार्वजनिक करने और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठती रही है।
विवाद तब सामने आया जब गृह विभाग द्वारा 10 जून 2026 को दर्ज कराई गई एक शिकायत में बताया गया कि न्यायमूर्ति नायडू आयोग की रिपोर्ट, जिसे सितंबर 2016 में मुख्यमंत्री कार्यालय भेजा गया था, अब उपलब्ध नहीं है। शिकायत के अनुसार, जून 2024 में राज्य में सरकार परिवर्तन के बाद जब विभिन्न विभागों की फाइलें वापस संबंधित विभागों को भेजी गईं, तब यह रिपोर्ट और उससे संबंधित कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज नहीं मिले। इस शिकायत के आधार पर कैपिटल थाना पुलिस ने 20 जून को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। इसके बाद राज्य सरकार और प्रशासनिक तंत्र में हलचल बढ़ गई। कई वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रियों ने सार्वजनिक रूप से यह आशंका जताई कि रिपोर्ट केवल गुम नहीं हुई है, बल्कि उसे जानबूझकर हटाया गया हो सकता है।
अधिवक्ता देबाशीष होता ने कहा कि मुख्यमंत्री कार्यालय से न्यायिक आयोग की रिपोर्ट का गायब होना बेहद चिंताजनक है। उनके अनुसार, यह घटना स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के पीछे की सच्चाई को छिपाने की संभावित कोशिशों की ओर संकेत करती है। उन्होंने हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि वह इस नए घटनाक्रम को रिकॉर्ड पर लेते हुए लंबित सीबीआई जांच संबंधी याचिका की सुनवाई के दौरान इसे महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में विचार करे। याचिका में कहा गया है कि राज्य पुलिस द्वारा अब तक की गई जांच और न्यायिक आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक न होने के कारण कई प्रश्न अब भी अनुत्तरित हैं। ऐसे में एक स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी द्वारा जांच कराए जाने से पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी पड़ताल संभव हो सकेगी।
इस बीच, मुख्यमंत्री कार्यालय से आयोग से संबंधित दो फाइलों के गायब होने की जांच भी तेज कर दी गई है। ओडिशा पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआईटी) इस मामले की जांच कर रही है। हाल ही में जांच अधिकारियों ने भुवनेश्वर स्थित लोक सेवा भवन के सामान्य प्रशासन विभाग में एक और दौर की तलाशी और दस्तावेजों की जांच की। इस दौरान मुख्य सचिव कार्यालय सहित कई वरिष्ठ सरकारी कार्यालयों के रिकॉर्ड खंगाले गए। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि संबंधित फाइलें कब और किन परिस्थितियों में गायब हुईं, उनके लिए कौन जिम्मेदार हो सकता है तथा क्या इस पूरे घटनाक्रम के पीछे किसी प्रकार की आपराधिक साजिश मौजूद है।
राज्य के राजस्व मंत्री सुरेश पुजारी ने हाल ही में कहा था कि उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि रिपोर्टों को जानबूझकर हटाया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जांच के दौरान दस्तावेजों के प्रबंधन और संरक्षण से जुड़े सभी व्यक्तियों से पूछताछ की जाएगी तथा यदि किसी की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी। गौरतलब है कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या ओडिशा के इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, हत्या के बाद भड़की हिंसा में कम से कम 38 लोगों की मौत हुई थी और कई जिलों में लंबे समय तक तनाव की स्थिति बनी रही थी। यही कारण है कि यह मामला आज भी सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। अब न्यायमूर्ति नायडू आयोग की रिपोर्ट के कथित रूप से गायब होने और सीबीआई जांच की नई मांग के बाद यह मामला एक बार फिर राज्य की राजनीति और न्यायिक प्रणाली के केंद्र में आ गया है। सभी की नजरें अब ओडिशा हाईकोर्ट पर टिकी हैं, जो इस नई याचिका और उससे जुड़े तथ्यों पर क्या रुख अपनाता है।

















