भुवनेश्वर: स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती स्मृति न्यास ने ओडिशा सरकार से मांग की है कि वह निर्धारित समयसीमा के भीतर लापता जांच आयोग की रिपोर्ट का पता लगाए और यह सुनिश्चित करे कि उनकी हत्या के लिए जिम्मेदार सभी लोगों को बिना किसी देरी के न्याय के कटघरे में लाया जाए।
मुख्यमंत्री से मुलाकात, लापता रिपोर्ट पर जताई चिंता
स्मृति न्यास के एक प्रतिनिधिमंडल ने ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी से मुलाकात की और एक ज्ञापन सौंपते हुए उस रिपोर्ट के लापता होने पर चिंता व्यक्त की, जो स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या और उसके बाद हुई हिंसा की जांच से संबंधित थी। भुवनेश्वर में मंगलवार को को आयोजित एक प्रेस वार्ता में न्यास के अध्यक्ष स्वामी जीवनमुक्तानंद पुरी और न्यासी रूपेंद्र कहार ने कहा कि इस मामले ने पूरे ओडिशा में व्यापक चिंता उत्पन्न की है। उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट के लंबे समय से प्रतीक्षित होने के बावजूद उसके गायब होने से नागरिकों में असंतोष, अनिश्चितता और संदेह बढ़ा है।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं है, बल्कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के अनुयायियों और व्यापक जनमानस की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एक पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच आवश्यक है ताकि जनता का विश्वास बहाल किया जा सके।
जवाबदेही और समयबद्ध कार्रवाई की मांग
न्यास ने मुख्यमंत्री से मांग की कि लापता रिपोर्ट को शीघ्रता से खोजा जाए और संवेदनशील न्यायिक अभिलेखों के रखरखाव में लापरवाही के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले अधिकारियों या व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। संगठन ने यह भी मांग की कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की कथित साजिश में शामिल सभी लोगों की पहचान कर उन्हें कानून के अनुसार सजा दी जाए। न्यास ने कहा कि पूर्ण पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना इस मामले में न्याय अधूरा रहेगा।

न्यास ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने जनजातीय समुदायों के कल्याण और सांस्कृतिक व धार्मिक परंपराओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संगठन के अनुसार, वे अपने जीवनकाल में कथित अवैध धर्मांतरण के विरोध के लिए भी जाने जाते थे।
शताब्दी वर्ष ने बढ़ाई भावनात्मक संवेदनशीलता
संगठन ने बताया कि वर्ष 2026 स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती का जन्म शताब्दी वर्ष है, जिनका जन्म 1926 में वर्तमान ओडिशा के अनुगोल जिले में हुआ था। इस अवसर पर पूरे वर्ष स्मृति कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि, न्यास ने यह भी कहा कि श्रद्धांजलि कार्यक्रमों की तैयारियों के बीच जांच आयोग की रिपोर्ट के लापता होने को लेकर उठे विवाद ने इस मुद्दे को और अधिक संवेदनशील और भावनात्मक बना दिया है।
न्यास ने यह भी मांग की कि न्यायमूर्ति शरत चंद्र महापात्र द्वारा प्रस्तुत अंतरिम रिपोर्ट तथा न्यायमूर्ति बसुदेव पाणिग्रही आयोग की रिपोर्ट को भी सार्वजनिक किया जाए। संगठन का कहना है कि इन रिपोर्टों के सार्वजनिक होने से जनता को जांच के निष्कर्षों को समझने में मदद मिलेगी और मामले से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे संदेह और विवादों का समाधान हो सकेगा।
सरकारी शिकायत और पुलिस मामला दर्ज
इस मामले में हाल ही में गृह विभाग ने भुवनेश्वर स्थित कैपिटल पुलिस स्टेशन में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। यह शिकायत गृह विभाग के संयुक्त सचिव शरत चंद्र मरांडी द्वारा दर्ज कराई गई, जिसमें मामले की विस्तृत आपराधिक जांच की मांग की गई है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है, जिनमें धारा 305, 316(2), 238(c), 241 और 61(2)(b) शामिल हैं। यह मामले की गंभीरता और संभावित आपराधिक कदाचार को दर्शाता है।ये धाराएं मुख्य रूप से आपराधिक विश्वासघात, सरकारी दस्तावेजों को छिपाने, नष्ट करने या अनधिकृत तरीके से संभालने जैसे अपराधों से संबंधित हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि प्रशासन इस मामले को गंभीर अनियमितता के रूप में देख रहा है।
रिपोर्टों की आधिकारिक प्रक्रिया और लापता होने की कड़ी
शिकायत के अनुसार, विभिन्न आयोगों द्वारा तैयार जांच रिपोर्टें पहले गृह विभाग को सौंपी गई थीं और बाद में इन्हें औपचारिक प्रक्रिया के तहत मुख्य सचिव कार्यालय के माध्यम से मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजा गया था। न्यायमूर्ति ए.एस. नायडू आयोग की रिपोर्ट 16 सितंबर 2016 को मुख्य सचिव कार्यालय को भेजी गई थी और 19 सितंबर 2016 को मुख्यमंत्री कार्यालय को अग्रेषित की गई। इसी प्रकार, आरडीसी जांच आयोग की रिपोर्ट 23 मई 2018 को मुख्य सचिव कार्यालय को भेजी गई और 24 मई 2018 को मुख्यमंत्री कार्यालय को प्रेषित की गई।
गृह विभाग के अनुसार, संबंधित अधिकारियों द्वारा कई बार खोजबीन के बावजूद दोनों रिपोर्टें वर्तमान में मुख्यमंत्री कार्यालय में उपलब्ध नहीं हैं और उनका कोई पता नहीं चल रहा है। शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि उसी अवधि में भेजी गई कई अन्य फाइलें 4 जून 2024 को गृह विभाग को वापस कर दी गईं। यह वही दिन था जब ओडिशा विधानसभा चुनावों की मतगणना हुई थी और सत्ता परिवर्तन स्पष्ट हुआ था। हालांकि, इन अन्य दस्तावेजों के साथ न्यायिक जांच रिपोर्टें वापस नहीं की गईं। इस असंगति ने प्रशासनिक हलकों में गंभीर चिंता पैदा की है और उनके वर्तमान स्थिति एवं प्रबंधन को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ है। इन परिस्थितियों से यह “उचित संदेह” उत्पन्न होता है कि दस्तावेजों को जानबूझकर हटाया गया, छिपाया गया, नष्ट किया गया या अवैध रूप से उनका निपटान किया गया हो सकता है। चूंकि ये न्यायिक और अर्ध-न्यायिक रिकॉर्ड हैं, इसलिए इनका गायब होना गंभीर सार्वजनिक चिंता का विषय माना जा रहा है।
विहिप ने सीबीआई जांच की मांग की
इस मामले ने अब व्यापक ध्यान आकर्षित किया है और एक स्वतंत्र व गहन जांच की मांग तेज हो गई है। विश्व हिंदू परिषद ने पहले ही केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच की मांग की है, यह कहते हुए कि इतने महत्वपूर्ण न्यायिक रिकॉर्ड के गायब होने की जांच केवल केंद्रीय एजेंसी ही निष्पक्ष रूप से कर सकती है।
वीएचपी ओडिशा (पूर्व) के सचिव महेश कुमार साहू ने कहा कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या कोई साधारण घटना नहीं थी और जांच रिपोर्ट को बहुत पहले सार्वजनिक किया जाना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा स्थिति राज्य के संवेदनशील दस्तावेजों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है।











