Explainer: समान नागरिक संहिता: पंथनिरपेक्ष भारत में अलग-अलग कानून क्यों?
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Explainer: समान नागरिक संहिता: पंथनिरपेक्ष भारत में अलग-अलग कानून क्यों?

भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) क्यों जरूरी है? सुप्रीम कोर्ट, मोदी सरकार, बाबा साहेब आंबेडकर और डॉ. राजेंद्र प्रसाद का UCC पर स्टैंड। नेहरू के हिंदू कोड बिल और मुस्लिम पर्सनल लॉ पर ऐतिहासिक तथ्य जानिए।

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
Jun 25, 2026, 12:07 pm IST
inविश्लेषण
UCC

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है अतएव यहां सभी नागरिक चाहे वो किसी भी धर्म या मजहब के हों बराबर हैं। लेकिन, फिर भी हैरानी की बात है कि हमारे धर्मनिरपेक्ष देश में हर धर्म के लिए एक अलग कानून है। अब इस असमानता को ख़त्म करने का समय आ गया है।

कुछ मुद्दे राजनीति से ऊपर उठकर होते हैं और समान नागरिक संहिता इसी तरह का एक मुद्दा है। असम, उत्तराखंड और गुजरात राज्यों में यह लागू किया जा चुका है। इन तीनों प्रदेशों में भाजपा की सरकार है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर देश की कई हाई कोर्ट पिछले कुछ सालों में कई बार यूसीसी का समर्थन कर चुका है। कोर्ट यह बार-बार कहता रहा है कि यूसीसी इस समय देश की जरूरत है। 10 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था। देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का समय आ गया है। कई नियम सभी समुदायों पर एक जैसा लागू नहीं होता है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि कोर्ट सीधे ऐसे मामलों को असंवैधानिक घोषित कर दें। याचिका में भेदभाव का मुद्दा गंभीर है और इस मुद्दे का स्थाई समाधान समान नागरिक संहिता ही है। यूसीसी कई विषमताओं को खत्म करेगा, लेकिन इसे लागू करने का फैसला संसद को ही लेना होगा।

प्रधानमंत्री ने पहले ही लाल किले से किया था ऐलान

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से पूर्व 15 अगस्त 2024 को पीएम मोदी लाल किले के प्राचीन से कह चुके हैं कि देश को भेदभाव वाले कानूनों से मुक्ति लेना ही पड़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 दिसंबर 2024 को लोकसभा में भारत के संविधान को अपनाने के 75 वर्ष पूरे होने पर आयोजित दो दिवसीय विशेष चर्चा का जवाब देते हुए समान नागरिक संहिता को लागू करने का अपना मजबूत संकल्प दोहराया था। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 अप्रैल 2026 को भाजपा के स्थापना दिवस के अवसर पर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए समान नागरिक संहिता को लागू करने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया था।

अंग्रेजों के दौर के सैकड़ों काले कानूनों का अंत

लोकतंत्र के लिए नए संसद भवन का निर्माण, सामान्य समाज के गरीबों के लिए 10% आरक्षण, तीन तलाक पर कानून बनाकर रोक, सीएए का कानून, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण ऐसे अनेक काम है जो भाजपा सरकार के ईमानदार प्रयासों का नतीजा है। यूनिफार्म सिविल कोड, वन नेशन वन इलेक्शन ऐसे सभी विषयों पर आज देश में एक गंभीर चर्चा हो रही है। जब हमारे महान देश का महान संविधान बनाया जा रहा था तब संविधान सभा में सभी के लिए एक समान कानून बनाने की बात कही गई थी।

पहले यूसीसी के पक्ष में थे पंडित नेहरू, देश आजाद होते ही पलटे

हमारे ज्यादातर संविधान निर्माता यूनिफॉर्म सिविल कोड के पक्ष में थे। यहां तक कि पंडित नेहरू भी शुरुआत में यूसीसी के पक्ष में थे। लेकिन देश के आजाद होते ही नेहरू जी के ख्यालात बदल गए और इसका कारण नेहरू को मुस्लिमों में वोट बैंक नजर आने लगा और उन्होंने अपना पैंतरा बदल दिया था। 1950-51 के आसपास नेहरू सरकार को यूसीसी को लाना चाहिए था। लेकिन, नेहरू सरकार हिंदू कोड बिल लेकर आ गई थी। तमाम विरोध और आम चुनाव नजदीक होने की वजह से नेहरू सरकार हिंदू कोड बिल को कुछ समय के लिए सकी समझी रणनीति के तहत टाल गई थी।

हिन्दू कोड बिल को टुकड़ों-टुकड़ों में पास करवाया नेहरू ने

1952 के चुनाव में नेहरू को पूर्ण बहुमत मिल गया तो उनके सामने मैदान पूरी तरह से खाली था। फिर भी उन्होंने समान नागरिक संहिता लाने के बजाय 1955 से लेकर 1958 के बीच हिंदू कोड बिल को टुकड़ों-टुकड़ों में पास करवाया था। लेकिन मुसलमानों के मध्ययुगीन शरिया कानूनों को उन्होंने छूने की भी कोशिश नहीं की और इसकी एकमात्र कारण मुस्लिम वोट बैंक था। इसका प्रकाशन नेहरू: कन्वर्सेशंस ऑन इंडिया एंड वर्ल्ड अफेयर्स नामक एक किताब के तौर पर हुआ है। इस इंटरव्यू में नेहरू ने कहा था कि हम हिंदुओं के पुरातन धार्मिक कानूनों को संसद के जरिए कानून बनाकर बदल रहे हैं। लेकिन, हम मुसलमानों को छूने की हिम्मत नहीं करते क्योंकि वो भारत में अल्पसंख्यक हैं। नेहरू आगे कहते हैं कि जब तक मुसलमान खुद बदलना नहीं चाहते, उनके व्यक्तिगत यानी इस्लामिक कानून बने रहेंगे। तुर्की जैसे देश के लिए मुस्लिम कानून बदलना आसान है क्योंकि वो मुस्लिम बाहुल्य देश हैं। लेकिन हम मुसलमानों को यानी भारत के मुसलमानों को यह नहीं दिखाना चाहते कि हम उनके व्यक्तिगत यानी इस्लामिक कानूनों के मामले में उन्हें किसी तरह से मजबूर कर रहे हैं।

इसे भी पढ़ें: Emergency 1975 : आपातकाल का सच, घोर यातना दी गई, हाथ कटवाना पड़ा

यूसीसी के प्रबल समर्थक थे बाबा साहब आंबेडकर

दूसरी तरफ संविधान के निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर यूसीसी के प्रबल समर्थक थे और यह बात उन्होंने संविधान सभा में चर्चा करते हुए 2 दिसंबर 1948 को कही थी। बाबा साहेब ने उस दिन यूसीसी के संदर्भ में कहा था कि मैं व्यक्तिगत रूप से नहीं मानता हूं कि धर्म को इतना विशाल अधिकार क्षेत्र क्यों दिया जाना चाहिए, जिससे वो पूरे जीवन को प्रभावित कर सके और विधायिका को उसके क्षेत्र में अतिक्रमण करने से रोक दे। आखिर हमें यह स्वतंत्रता किस लिए मिली है? हमें यह स्वतंत्रता हमारी सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए मिली है जो इतनी असमानताओं, भेदभावों और अन्य चीजों से भरी हुई है जो हमारे मौलिक अधिकारों के साथ टकराव करती है। इसलिए किसी के लिए यह कल्पना करना बिल्कुल असंभव है कि व्यक्तिगत कानून यानी धार्मिक कानून को राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा जाएगा।

कांग्रेस केवल बाबा साहब के नाम पर कर रही राजनीति

कांग्रेस और विपक्ष के नेता बार-बार बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान की दुहाई देते हैं। लेकिन हैरत की बात है कि यही नेता मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर या यूं कहें कि मुस्लिम वोट बैंक की वजह से यूनिफॉर्म सिविल कोड का चीख-चीख कर विरोध करने लगते हैं। इन नेताओं को यह मालूम होना चाहिए कि अंबेडकर यूसीसी के प्रबल समर्थक थे।

26 जनवरी 1950 को देश का संविधान बन गया, लेकिन इसमें समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी के मुद्दे को छोड़ दिया गया था। लेकिन, हैरत की बात है कि तत्कालीन नेहरू सरकार यूसीसी लेकर तो नहीं आई। लेकिन, 1951 में वह हिंदू कोड बिल लेकर आ गई। उस समय ज्यादातर लोगों को जिनमें कांग्रेस के कई बड़े नेता भी शामिल थे, उन्हें इस बात पर आपत्ति थी कि अगर सरकार हिंदू मान्यताओं में दखल दे रही है तो वो यही दखल मुस्लिम मान्यताओं में क्यों नहीं देती है?  इसी आधार पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी हिंदू कोड बिल के बजाय समान नागरिक संहिता पर यानी यूसीसी पर जोर दिया था।

उन्होंने 15 सितंबर 1951 को प्रधानमंत्री नेहरू के नाम एक कड़ा पत्र लिखा था जो डॉ. राजेंद्र प्रसाद करेस्पोंडेंस एंड सेलेक्ट डॉक्यूमेंट्स में  प्रकाशित हुआ है। इस पत्र में डॉ. राजेंद्र प्रसाद लिखते हैं कि हिंदू कोड बिल एक भेदभाव पैदा करने वाला बिल है, क्योंकि यह सिर्फ हिंदुओं पर ही लागू होता है। अगर इस बिल के प्रावधान इतने ही फायदेमंद और लाभकारी हैं तो सिर्फ एक समुदाय हिंदू के लिए ही क्यों लाया जा रहा है? बाकी के समुदाय यानी मुस्लिम इसके लाभ से क्यों वंचित रहें? डॉ. राजेंद्र प्रसाद आगे लिखते हैं कि हमें एक ही विवाह और संपत्ति कानून बनाना चाहिए जो सभी समुदायों पर लागू हो। अगर यह बिल संसद में पारित भी हो जाता है तो मैं इस पर अपनी सहमति देने से पहले सरकार को पुनर्विचार करने को कहूंगा।

लेकिन नेहरू को किसी और ही बात की चिंता थी, जिसे समझने के लिए यूसीसी पर एक ऐसी व्यक्ति का विचार जानना चाहिए जो पूरी तरह से निष्पक्ष थे। एक बड़े कानून विद एमसी छागला उस दौर में यूसीसी पर विचार कर रहे थे। एमसी छागला भारत के विदेश और शिक्षा मंत्री रहे थे। इसके अलावा वे ब्रिटेन और अमेरिका में भारत के हाई कमिश्नर और राजदूत भी रहे थे। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी की सरकार में काम किया था और 11 साल तक बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी रहे थे। एक न्यायविद होने के नाते एमसी छागला के विचार यूसीसी पर जरूर जानना चाहिए।

उनकी मशहूर पुस्तक रोजेज इन दिसंबर 1973 में प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक में जस्टिस एमसी छागला लिखते हैं कि बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक संविधान सभी के लिए बाध्यकारी है। अगर संविधान में कोई आदेश है तो उसे स्वीकार और लागू किया जाना चाहिए।  जवाहरलाल नेहरू ने हिंदू कोड बिल पारित करवाने में बहुत शक्ति और साहस दिखाया, लेकिन बात जब मुसलमानों की आई तो उन्होंने हस्तक्षेप न करने की नीति को अपना लिया। जस्टिस छागला आगे लिखते हैं कि मैं यह देखकर काफी डरा हुआ हूं कि एक तरफ तो हिंदुओं के लिए एक विवाह को कानून बना दिया गया है। लेकिन, मुसलमान अब भी बहु विवाह का फायदा उठा सकते हैं। यह नारी समाज का अपमान है। मुझे मालूम है मुस्लिम महिलाएं इस भेदभाव पर नाराज हैं।

Topics: नेहरू और UCCसमान नागरिक संहितायूसीसी भारतहिंदू कोड बिलUCC सुप्रीम कोर्ट
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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