
चमोली (उत्तराखंड)। उत्तराखंड के चमोली जिले की नीती घाटी में छिपा एक ऐसा विस्मयकारी रहस्य अब दुनिया के सामने आ रहा है, जो करोड़ों वर्षों पुराने भूगर्भीय इतिहास, आधुनिक विज्ञान और सनातनी आस्था को एक सूत्र में पिरोता है। चीन सीमा से बिल्कुल सटे लपथल (Lapthal) क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में मिले दुर्लभ शालिग्राम जीवाश्मों (Shaligram Fossils) ने इस पूरे दुर्गम इलाके को वैश्विक चर्चा का केंद्र बना दिया है। इस अभूतपूर्व प्रागैतिहासिक खजाने के सामने आने के बाद अब इस पूरे क्षेत्र को ‘जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान’ (Fossil National Park) घोषित करने की मांग बेहद तेज हो गई है।
आज जहां गगनचुंबी बर्फीली चोटियां खड़ी हैं, वहां कभी लहरें मारता हुआ एक अनंत समंदर हुआ करता था। इस भूवैज्ञानिक खोज के मुख्य वैज्ञानिक और भौगोलिक आंकड़ों का पूरा विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट है:
| खोज और भूगोल का आयाम | वैज्ञानिक एवं प्रामाणिक विवरण |
|---|---|
| मुख्य खोज स्थल (Location) | लपथल क्षेत्र, नीती घाटी, चमोली (चीन सीमा के समीप) |
| समुद्र तल से ऊंचाई (Altitude) | लगभग 4,700 मीटर (VIP कोर जोन, नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क) |
| जीवाश्मों की अनुमानित आयु | 15 से 16 करोड़ वर्ष पुराने समुद्री अवसाद (Marine Sediments) |
| पुष्टि करने वाली शीर्ष संस्था | बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP) के वरिष्ठ वैज्ञानिक |
| प्राचीन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि | हजारों-करोड़ों वर्ष पूर्व यह संपूर्ण क्षेत्र ‘टेथिस सागर’ (Tethys Sea) का हिस्सा था। |
सनातन धर्म और हिंदू मान्यताओं में शालिग्राम शिला को साक्षात भगवान विष्णु का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। यही कारण है कि बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस आधिकारिक सर्वेक्षण के परिणामों को केवल वैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि वैश्विक धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी बेहद पवित्र और खास माना जा रहा है। यह खोज प्रमाणित करती है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों में वर्णित शालिग्राम का संबंध किस प्रकार पृथ्वी के क्रमिक विकास और प्राचीन महासागरों के इतिहास से जुड़ा हुआ है।
“लपथल क्षेत्र वर्तमान में नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के बफर नहीं बल्कि अति-संवेदनशील ‘कोर जोन’ में स्थित है। पहले यहाँ तक पहुँचना अत्यंत दुरूह था, लेकिन सीमा सुरक्षा के मद्देनजर हुए हालिया सड़क निर्माण के बाद अब यहाँ तक की राह सुगम हो गई है। सामरिक महत्व का क्षेत्र होने के बावजूद प्रशासन अब विशेष नियमों के तहत स्थानीय निवासियों और पर्यटकों को यहाँ जाने की सशर्त अनुमति दे रहा है।”
इस क्षेत्र का भूगोल जितना ऐतिहासिक है, उतना ही विस्मयकारी भी है। लपथल और रिमखिम के बीच स्थित गगनचुंबी पर्वतों के मध्य बने विशाल प्राकृतिक खड्डों (Gorges) को भूगोलविद और पर्यटक “भारत का ग्रैंड कैन्यन” (Grand Canyon of India) कहकर पुकारते हैं।
भूगर्भशास्त्रियों और पर्यावरण विशेषज्ञों का दृढ़ता से मानना है कि यदि उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार मिलकर इस अद्वितीय क्षेत्र को आधिकारिक तौर पर ‘जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान’ (Fossil National Park) घोषित करती हैं, तो यह सूबे के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
इससे न केवल अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान (Scientific Research) और उच्च-स्तरीय जियो-टूरिज्म (Geo-Tourism) को नई उड़ान मिलेगी, बल्कि सीमांत क्षेत्रों से होने वाले पलायन को रोकने तथा स्थानीय गाइडों, होमस्टे संचालकों और संपूर्ण उत्तराखंड की आर्थिकी को मजबूत करने में एक युगांतकारी परिवर्तन आएगा।