दुनियाभर में मौसम का चक्र पूरी तरह से बदल गया है। इसका असर भारत में भी दिख रहा है। इसके कारण मानसून की रफ्तार इस बार धीमी चल रही है। अल-नीनो का असर भी साफ दिख रहा है। इसके चलते दिल्ली में जुलाई से सितंबर तक कम बारिश होने की आशंका है। स्काईमेट वेदर के महेश पलावत ने इस बारे में विस्तार से जानकारी दी।
इस साल मानसून की रफ्तार सुस्त क्यों है?
मानसून आगे बढ़ने के लिए बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र बनना बहुत जरूरी होता है। इस बार शुरुआत में वहां ऐसा सिस्टम नहीं बना। हिंद महासागर से आने वाली सोमालिया जेट स्ट्रीम हवाएं भी कमजोर रहीं। अब 28-29 जून के आसपास बंगाल की खाड़ी में कोई सिस्टम सक्रिय होने की उम्मीद है। इस वजह से दिल्ली में जुलाई के पहले सप्ताह से पहले मानसून पहुंचने की संभावना बहुत कम है। जून में दिल्ली में प्री-मानसून बारिश बहुत कम हुई है।
क्या जुलाई-अगस्त में इसकी भरपाई हो पाएगी?
इसकी उम्मीद ज्यादा नहीं है। इस बार का अल-नीनो काफी मजबूत है। इसका असर मानसून के पूरे सीजन पर पड़ेगा। जुलाई, अगस्त और सितंबर में भी बारिश सामान्य से कम रह सकती है। हालांकि बीच-बीच में अच्छी बारिश के दौर आएंगे। जुलाई-अगस्त में कुल बारिश सामान्य के करीब पहुंच सकती है, लेकिन जून की कमी पूरी तरह नहीं भरेगी।
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इसकी वजह क्या है?
यह सिर्फ दिल्ली की समस्या नहीं है। पूरी दुनिया में मौसम का पैटर्न बदल रहा है। दिल्ली में सर्दियां छोटी हो रही हैं और मानसून अनिश्चित होता जा रहा है। बड़ी वजह पश्चिमी विक्षोभ के पैटर्न में बदलाव है। पहले ये विक्षोभ अक्टूबर-नवंबर में आते थे, अब दिसंबर-जनवरी में आ रहे हैं और गर्मियों (अप्रैल-मई) तक खिंच जाते हैं। यह जलवायु परिवर्तन का सीधा असर है। कम समय में भारी बारिश होने पर दिल्ली का ड्रेनेज फेल हो जाता है।
अर्बन प्लानिंग या मौसम पूर्वानुमान में कहां कमी है?
दिल्ली में विकास काम बिना ठीक प्लानिंग के हुआ है। सीवेज लाइनें अक्सर ब्लॉक रहती हैं और उनमें प्लास्टिक कचरा भरा रहता है। सिर्फ 40 मिलीमीटर बारिश में भी पूरा शहर जलमग्न हो जाता है। ड्रेनेज की सफाई मई में ही हो जानी चाहिए। जब मौसम विभाग या स्काईमेट जैसे संगठन रेड अलर्ट जारी करते हैं, तो MCD को पहले से पानी निकालने वाले पंप तैयार रखने चाहिए। लेकिन प्रशासन और मौसम एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी के कारण यह नहीं हो पाता।
भारी जलभराव को लेकर स्काईमेट वेदर प्रशासन को क्या इनपुट देता है?
जब उत्तर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली हवाएं आपस में टकराती हैं, तो अचानक भारी बारिश का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे सिस्टम का पता 24 से 48 घंटे पहले चल जाता है। स्काईमेट इसकी चेतावनी तुरंत प्रशासन को दे देता है।
















