चर्च-नक्सल गठजोड़: देश के जनजातीय क्षेत्रों में सक्रिय नेटवर्क की परतें खोलती रिपोर्ट
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चर्च-नक्सल गठजोड़: देश के जनजातीय क्षेत्रों में सक्रिय नेटवर्क की परतें खोलती रिपोर्ट

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया है। इसमें अमेरिका स्थित मिशनरी संगठन ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ (टीटीआई) पर गंभीर आरोप लगे हैं।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Jun 20, 2026, 06:40 pm IST
inभारत
चर्च नक्सल गठजोड़। ईसाई मिशनरियों के निशाने पर जनजातीय समाज। (चित्र - एआई निर्मित)

चर्च नक्सल गठजोड़। ईसाई मिशनरियों के निशाने पर जनजातीय समाज। (चित्र - एआई निर्मित)

भारत में मतांतरण, मिशनरी गतिविधियों, विदेशी फंडिंग और वामपंथी उग्रवाद के बीच संबंधों को लेकर बहस नयी नहीं है। पिछले दो दशकों में देश के कई राज्यों से ऐसी घटनाएं सामने आई हैं। अब बेंगलुरु में दर्ज एक एफआईआर ने इस बहस को फिर से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शिकायत पर यह मामला दर्ज किया गया है। इसमें अमेरिका स्थित मिशनरी संगठन ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ (टीटीआई) पर गंभीर आरोप लगे हैं। इस रिपोर्ट में ऐसे प्रकरणों का जिक्र है जो भारत को उसकी मूल जड़ों से दूर करने के लिए काम करते हुए पकड़े गए।

मतांतरण का प्रश्न और भारत की सांस्कृतिक पहचान

भारत की जनजातीय परंपराएं, स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा, ग्राम-आधारित सामाजिक संरचनाएं और आध्यात्मिक जीवनशैली देश की मूल पहचान का हिस्सा रही हैं, लेकिन कई विदेशी मिशनरी संगठन भारत में ईसाइयत के माध्‍यम से स्थानीय संस्कृतियों और पारंपरिक आस्थाओं को ‘पिछड़ा’ या ‘अंधविश्वास’ बताकर उन्हें बदलने का प्रयास करते हुए दिखी हैं। वर्षों से चर्चित रहा जोशुआ प्रोजेक्ट भी चर्चा में है। यह एक वैश्विक मिशनरी डेटाबेस है, जिसमें दुनिया भर के उन समुदायों की सूची तैयार की जाती है, जिन्हें मिशनरी दृष्टि से ‘अनरीच्ड पीपुल ग्रुप्स’ यानी ऐसे समूह माना जाता है जहां ईसाई प्रचार की संभावनाएं हैं। भारत के अनेक जनजातीय और ग्रामीण समुदाय इस प्रकार की सूचियों में शामिल रहे हैं, जिससे मतांतरण को लेकर आशंकाएं और गहरी हुई हैं।

टीटीआई : विदेशी फंडिंग और उग्रवाद

11 जून, 2026 को बेंगलुरु पुलिस ने ईडी की शिकायत के आधार पर अमेरिका स्थित ईसाई प्रचारक संस्था द टिमोथी इनिशिएटिव (टीटीआई) और छह व्यक्तियों- जोनाथन एस राजन, मीका मार्क, अजीत वर्गीस मथाई, वर्गीस चाको, बबलू कुर्मी और सुप्रीम जॉय के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। आरोप गया है कि ₹92.55 करोड़ (USD 9.99 मिलियन) विदेशी डेबिट कार्डों के माध्यम से भारत में भेजे गए और टीटीआई की गतिविधियों में इस्तेमाल किए गए, जिनमें प्रशिक्षण, उपदेश और “गरीब लोगों का ब्रेन वॉश करना शामिल है, जिससे वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) की ओर प्रेरित किया जा सके।”

जांच एजेंसियों के अनुसार लगभग एक हजार विदेशी डेबिट कार्डों का उपयोग धन के हस्तांतरण और निकासी के लिए किया गया। इसमें छत्तीसगढ़ के नक्सलवादी/लोकतंत्र विरोधी आंदोलन से प्रभावित क्षेत्रों में ₹6.34 करोड़ की राशि शामिल है। इसमें मीका मार्क, अजीत वर्गीस मथाई और जोनाथन एस राजन को मुख्य आरोपियों में नामजद किया गया है।

मिशनरी प्रशिक्षण सामग्री और सांस्कृतिक संघर्ष का प्रश्न

टीटीआई से जुड़ी जांच के दौरान जो तथ्‍य सामने आए, उनमें हिंदू देवी-देवताओं और पारंपरिक आस्था को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। टीटीआई मैनुअल में हिंदू गांवों को “बुरी आत्माओं” के प्रभाव में बताया गया और हिंदू देवताओं को राक्षसी शक्तियों के रूप में चित्रित किया गया। हिंदू देवताओं को ‘दुष्ट आत्माओं’ के रूप में वर्णित किया गया।

इस मैनुअल में मिशनरियों को यीशु को अवतार के रूप में प्रस्तुत करने और कर्म और पुनर्जन्म जैसी हिंदू मान्यताओं को चुनौती देने का प्रशिक्षण दिया गया है। जबकि मां काली और भगवान शिव को प्रचार संबंधी कथाओं में नकारात्मक रूप से दर्शाया गया। प्रशिक्षण सामग्री हिंदू-बहुसंख्यक गांवों में प्रवेश करने, संदेह से बचने, कहानियों, गीतों, प्रार्थनाओं और व्यक्तिगत बातचीत के माध्यम से विश्वास बनाने और धीरे-धीरे ईसाई शिक्षाओं को पेश करने के लिए एक चरण-दर-चरण रणनीति प्रदान करती है और हिंदू गांवों के लिए धर्मांतरण रणनीति की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है।

जांच एजेंसियों का दावा है कि इन सामग्रियों के माध्‍यम से गांवों में प्रवेश करने, स्थानीय लोगों का विश्वास जीतने और धीरे-धीरे धार्मिक परिवर्तन की दिशा में काम करने की रणनीतियां बताई गई थीं और अपने लोगों को प्रशिक्षण देकर जनजाति समुदाय एवं अन्‍य जिन्‍हें भी संभव था, उन्‍हें उनके मूल धर्म से अलग कर ईसाई बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा था।

जनजाति क्षेत्र क्यों बनते हैं मतांतरण के केंद्र?

छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के जनजातीय इलाके लंबे समय से नक्सली हिंसा और मिशनरी गतिविधियों के निशाने पर रहे हैं। इन क्षेत्रों ने गरीबी, शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और प्रशासनिक उपेक्षा वर्षों तक झेली। समस्याएं अभी भी हैं। अब यही परिस्थितियां बाहरी वैचारिक समूहों के लिए प्रभाव स्थापित करने का अवसर बनती रही हैं। कई बार ये नेटवर्क धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक स्वरूप में सामने आते हैं, लेकिन उनके प्रभाव क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़ते हुए दिखाई देते हैं।

भीमा कोरेगांव मामला और पादरी स्टेन स्वामी

यह एक अन्‍य प्रकरण भी इस चर्च-नक्‍सल गठजोड़ की ओर इशारा कर रहा है। दरअसल, 8 अक्टूबर, 2020 को, एनआईए ने भीमा कोरेगांव हिंसा मामले के संबंध में जेसुइट पादरी स्टेन स्वामी को गिरफ्तार किया। एजेंसी ने उन्हें प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) से जुड़े एक प्रमुख साजिशकर्ता के रूप में वर्णित किया। जांचकर्ताओं ने कहा कि बरामद इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों और पत्राचार ने उन्हें भीमा कोरेगांव-एलगर परिषद मामले के पीछे व्यापक माओवादी नेटवर्क से जोड़ा।

एनआईए ने आरोप लगाया कि स्टेन स्वामी ने भूमिगत माओवादी कैडरों से जमीनी अभियानों के लिए 8,00,000 रुपये प्राप्त किए, सक्रिय विद्रोहियों के साथ नियमित संपर्क बनाए रखा और सीपीआई के एक फ्रंट संगठन के रूप में सताए गए कैदियों एकजुटता समिति की सह-स्थापना की। एनआईए और विशेष अदालत द्वारा उद्धृत निष्कर्षों के अनुसार, स्वामी और अन्य आरोपी सरकार को अस्थिर करने के माओवादी प्रयासों से जुड़ी साजिश में शामिल थे। बाद में, एनआईए की विशेष अदालत ने सह-आरोपियों के साथ संचार और माओवादी गतिविधियों से कथित रूप से जुड़े वित्तीय लेनदेन सहित प्रथम दृष्टया साक्ष्यों का हवाला देते हुए स्वामी की जमानत याचिका खारिज कर दी। स्वामी 5 जुलाई, 2021 को अपनी मृत्यु तक न्यायिक हिरासत में रहे, जबकि मामला अभी भी विचाराधीन है।

पथलगड़ी आंदोलन में चर्च-नक्सल गठजोड़

झारखंड के खूंटी जिले में पथलगड़ी प्रभावित गांवों में 9 जून, 2018 को नुक्कड़ नाटक करने के बाद पांच मानव तस्करी विरोधी कार्यकर्ताओं का अपहरण कर सामूहिक बलात्कार किया गया। पीड़ित महिलाएं पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएलएफआई) और पथलगड़ी नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गई थीं, जहां बाहरी लोगों और सरकारी अधिकारियों के प्रवेश का विरोध किया जाता रहा है। बाद में एक अदालत ने छह आरोपियों को दोषी ठहराया और कहा कि यह अपराध उन महिलाओं से बदला लेने के लिए किया गया था जो पथलगड़ी गांव में गई थीं।

कार्यकर्ताओं को आशा किरण नामक एक चर्च से संबद्ध गैर सरकारी संगठन द्वारा फादर अल्फोंस ऐंद द्वारा संचालित एक मिशनरी स्कूल में प्रस्तुति देने के लिए आमंत्रित किया गया था। उनके साथ सिस्टर रंजीता और सिस्टर विनीता भी थीं । इस मामले ने जनजातीय क्षेत्रों में सक्रिय मिशनरी समूहों, गैर सरकारी संगठनों, पथलगड़ी नेताओं और नक्सल-संबद्ध संगठनों के बीच संबंधों की ओर ध्यान आकर्षित किया और पथलगड़ी और पीएलएफआई के प्रभाव को जांच का मुख्य केंद्र बिंदु बनाया गया।

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्याकांड

इससे पहले ओडिशा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या भारतीय समाज को झकझोर देने वाली घटना थी। स्वामी लक्ष्मणानंद लंबे समय से वनवासी क्षेत्रों में धर्मांतरण विरोधी अभियान चला रहे थे। इस हमले के लिए सब्यसाची पांडा के नेतृत्व वाली पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के माओवादी विद्रोहियों को जिम्मेदार ठहराया गया । जांचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि पेंटेकोस्टल चर्च के नेता भास्कर सुनामझी सहित स्थानीय ईसाई हस्तियों ने माओवादी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर हत्या को अंजाम दिया था।

अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि यह हमला ओडिशा के वनवासी क्षेत्र में स्वामी द्वारा धर्मांतरण विरोधी कार्यों को रोकने के उद्देश्य से किया गया था। अक्टूबर 2013 में, फूलबानी की एक अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने सात स्थानीय ईसाई आरोपियों- बिजय कुमार सुनसेठ, गोरनाथ चालनसेठ, बुधदेव नायक, भास्कर सुनामझी, दुर्जो सुनामझी, मुंडा बदमझी और सनातना बदमझी को माओवादी नेता पुलारी राम राव के साथ हत्या और आपराधिक साजिश के आरोप में दोषी ठहराया। सभी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। दिसंबर 2019 में, सर्वोच्च न्यायालय ने अपील की अंतिम सुनवाई तक सातों दोषियों को जमानत दे दी, जबकि दोषसिद्धि को ओडिशा उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। अब यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसमें पहली बार चर्च, मतांतरण और माओवादी नेटवर्क के संभावित संबंधों को लेकर व्यापक राष्ट्रीय बहस हुई।

विदेशी फंडिंग और पारदर्शिता की चुनौती

भारत में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) का उद्देश्य यही है कि विदेशी धन का उपयोग पारदर्शी तरीके से हो और उसका इस्तेमाल किसी राजनीतिक, राष्ट्र-विरोधी या अवैध गतिविधि में न किया जा सके। पिछले कुछ वर्षों में हजारों संस्थाओं के एफसीआरए लाइसेंस रद्द किए गए या उनकी जांच की गई है। सरकार का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता के लिए यह आवश्यक है।

कन्‍वर्जन के कई मामले उजागर

बेंगलुरु से सामने आया टीटीआई मामला, कंधमाल हत्याकांड, पथलगड़ी विवाद और भीमा कोरेगांव जैसे प्रकरण यह संकेत देते हैं कि संवेदनशील क्षेत्रों में धर्म, राजनीति, विदेशी फंडिंग और वैचारिक आंदोलनों के बीच जटिल संबंधों की जांच आवश्यक है। इन जैसे तमाम मामलों ने सुरक्षा एजेंसियों की उन चिंताओं को बल दिया है कि सामाजिक और धार्मिक मंचों का दुरुपयोग राष्ट्र-विरोधी तत्वों द्वारा किया जा सकता है।

भारत की सांस्कृतिक जड़ें उसकी विविधता, परंपराओं और स्थानीय पहचान में निहित हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की गतिविधि, फिर वह चाहे धर्मांतरण (कन्‍वर्जन) के नाम पर हो, विदेशी फंडिंग के माध्यम से हो या वैचारिक उग्रवाद के जरिए, यदि समाज को उसकी मूल पहचान से दूर ले जाने का प्रयास करती है, तो उस पर लोकतांत्रिक और कानूनी ढांचे के भीतर गंभीरता से विचार किया जाना आवश्यक है। यही राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त है, लेकिन इसके बाद भी लगातार देश भर से आज भी इस तरह के कन्‍वर्जन से जुड़े प्रकरण हर रोज सामने आ रहे हैं, जोकि भारत के भविष्‍य में भारत बने रहने को लेकर बेहद गंभीर चिंता पैदा करते हैं!

 

Topics: प्रवर्तन निदेशालयईसाई कन्वर्जनभारत में मतांतरणमिशनरी गतिविधियांटीटीआई मामला
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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