छत्तीसगढ़: जनजातीय अंचलों में ऐतिहासिक संकल्प, 26 ग्राम सभाओं ने की चर्च, प्रार्थना सभाओं और मतांतरण पर रोक की घोषणा
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छत्तीसगढ़: जनजातीय अंचलों में ऐतिहासिक संकल्प, 26 ग्राम सभाओं ने की चर्च, प्रार्थना सभाओं और मतांतरण पर रोक की घोषणा

मुरागांव में आयोजित पारंपरिक संयुक्त ग्राम सभा में कथित ईसाई कन्‍वर्जन से जुड़ी गतिविधियों पर चिंता व्यक्त करने के साथ ही चर्चों, प्रार्थना सभाओं और पादरियों की गतिविधियों पर रोक लगाने का प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया । अब ग्राम सभाओं का यह सामूहिक निर्णय संकेत दे रहा है कि मतांतरण का मुद्दा यहां सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श का भी केंद्र बन चुका है।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Jun 17, 2026, 08:00 pm IST
inभारत, छत्तीसगढ़
छ्त्तीसगढ़ में ईसाई कन्वर्जन के खिलाफ एकजुट हुईं ग्राम सभाएं

छ्त्तीसगढ़ में ईसाई कन्वर्जन के खिलाफ एकजुट हुईं ग्राम सभाएं

छत्तीसगढ़ के जनजाति क्षेत्रों में मतांतरण को लेकर लंबे समय से चल रही बहस अब सामाजिक आंदोलन का रूप लेती दिखाई दे रही है। कांकेर जिले के पीढ़ापाल अनुसूचित क्षेत्र में 26 ग्राम सभाओं द्वारा एकजुट होकर मतांतरण के खिलाफ लिए गए निर्णय को इसी क्रम में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

मुरागांव में आयोजित पारंपरिक संयुक्त ग्राम सभा में कथित ईसाई कन्‍वर्जन से जुड़ी गतिविधियों पर चिंता व्यक्त करने के साथ ही चर्चों, प्रार्थना सभाओं और पादरियों की गतिविधियों पर रोक लगाने का प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया । अब ग्राम सभाओं का यह सामूहिक निर्णय संकेत दे रहा है कि मतांतरण का मुद्दा यहां सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श का भी केंद्र बन चुका है।

26 ग्राम सभाएं एक मंच पर, पारंपरिक व्यवस्था की रक्षा का संकल्प

हाल ही में मुरागांव में आयोजित संयुक्त ग्राम सभा में पीढ़ापाल क्षेत्र के कई गांवों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इनमें ग्राम सभा अध्यक्ष, सरपंच, पंच, गायता, पटेल, ठाकुर, भूमियार, मांझी, सिरहा, भगत, पेनो पुजारी सहित विभिन्न सामाजिक और पारंपरिक पदाधिकारियों की भागीदारी रही। बैठक में कुरिष्टीकुर, मांदरी, मोदे, किरंगापाटी, धनतुलसी, तुलतुली, पीढ़ापाल, कानागांव, कलमुच्चे, टोन्डामरका, मुंजालगोंदी, बुधियारमारी, ईमलीडिही, भैंसगांव, मुरागांव, खसगांव, तरांदूल, धनेली, कठोली, पुसाझार, कमकाकुडुम, सिलीबहार, मर्रापी, दोबेहिरी और तेलावट सहित कुल 26 गांवों ने भाग लिया।

ग्राम सभाओं ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में सेवा, स्वास्थ्य और सामाजिक सहायता के नाम पर लोगों को प्रभावित कर कथित ईसाई कन्वर्जन (मतान्‍तरण) कराया जा रहा है। प्रतिनिधियों का कहना था कि इससे उनकी पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं, देवी-देवताओं और सामाजिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

‘आस्था और अस्मिता पर हमला’ का आरोप

संयुक्त ग्राम सभा में वक्ताओं ने कहा कि वनवासी समाज की पहचान उसकी परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामुदायिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है। ग्राम सभा के प्रस्ताव में उल्लेख किया गया कि ग्राम शीतला माता, 18 पाट-32 बहनी व्यवस्था, बानी बिरादरी परंपरा और स्थानीय आस्था केंद्रों पर बाहरी धार्मिक प्रभावों का दबाव बढ़ रहा है। यदि यह स्थिति जारी रही तो सामाजिक एकता प्रभावित हो सकती है और गांवों में तनाव बढ़ सकता है। ऐसे में ग्राम सभाओं ने प्रशासन से मांग की कि कथित अवैध धर्मांतरण गतिविधियों की जांच कर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

पेसा कानून और पांचवीं अनुसूची का हवाला

बैठक के दौरान संविधान के अनुच्छेद 244(1) के अंतर्गत पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून 1996, संशोधित छत्तीसगढ़ पेसा कानून 2022 तथा धर्म स्वतंत्रता संबंधी प्रावधानों का उल्लेख किया गया। ग्राम सभा के प्रतिनिधियों का तर्क था कि अनुसूचित क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों को अपनी परंपराओं और संसाधनों की रक्षा का अधिकार प्राप्त है।

इसी आधार पर संयुक्त ग्राम सभा ने प्रस्ताव पारित करते हुए क्षेत्र में चर्चों और प्रार्थना सभाओं पर रोक लगाने, मतांतरित व्यक्तियों को भूमि न देने तथा प्रशासन को संबंधित सूचनाएं उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। इन प्रस्तावों को कलेक्टर, एसडीएम और संबंधित विभागों को भेजने की तैयारी भी की जा रही है।

डी-लिस्टिंग की मांग तेज हुई

बैठक में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्तावों में से एक डी-लिस्टिंग का संकल्प रहा। ग्राम सभाओं ने मांग की कि जो लोग धर्म परिवर्तन कर चुके हैं, यदि वे अनुसूचित जनजाति आरक्षण का लाभ ले रहे हैं तो उनके मामलों की समीक्षा की जाए। इसके साथ ही ऐसे व्यक्तियों के जाति प्रमाण-पत्रों की जांच की मांग भी उठाई गई।

इसके साथ ही यहां एकत्र हुए जनजाति नेताओं ने एक सुर में कहा कि धर्मांतरण के कारण उनकी पारंपरिक संस्कृति, भाषा, देवी-देवताओं और सामुदायिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ रहा है। अब इसे आदिवासी समाज में उभर रही एक व्यापक सामाजिक चेतना के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यदि प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत प्रस्तावों पर आगे कार्रवाई होती है, तो इसका प्रभाव अन्य अनुसूचित क्षेत्रों में भी दिखाई दे सकता है।

 

Topics: डी-लिस्टिंग
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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