पीओजेके : दमन से भी नहीं दबा हाैसला
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पीओजेके : दमन से भी नहीं दबा हाैसला

पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के लोग अपनी आजादी के लिए सड़कों पर उतरे हैं।वे अशिक्षा और भुखमरी से मुक्त होने के लिए भारत से संबंध बढ़ाना चाहते हैं। इसलिए नारा लगा रहे हैं-’मुजफ्फराबाद-श्रीनगर व्यापार बहाल करो’

Written byअरविंदअरविंद
Jun 16, 2026, 08:38 pm IST
inविश्लेषण, जम्‍मू एवं कश्‍मीर
सेना के खिलाफ प्रदर्शन करते पीओजेके के लोग

सेना के खिलाफ प्रदर्शन करते पीओजेके के लोग

पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) की बेचैनी क्या है? वहां क्यों बार-बार पाकिस्तान से आजाद होने के नारे लग रहे हैं? इसका जवाब पाकिस्तान की नीतियों में है। क्योंकि बेशक यह इलाका अभिन्न रूप से भारत का अंग है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका नियंत्रण तो पाकिस्तान के ही हाथ में है और यहां के लोग कैसे रहेंगे, कैसे जीएंगे, यह वही तय कर रहा है। आखिर पाकिस्तान की वह नीति कौन सी है? वह है, जमीन चाहिए, लोग नहीं। इसी कारण पूर्वी पाकिस्तान की जगह बांग्लादेश का जन्म हुआ, बलूचिस्तान टूटने को बेताब है, खैबर पख्तूनख्वा सुलग रहा है और पीओजेके में पाकिस्तानी बेड़ियों को तोड़ने की इच्छा हर बीतते दिन के साथ मजबूत होती जा रही है।

हाल ही में पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर की वादियों में भड़का विरोध इस्लामाबाद के हुक्मरानों और रावलपिंडी के सैन्य जनरलों के खिलाफ खुली बगावत है, जो इस क्षेत्र को केवल एक ‘भौगोलिक जागीर’ समझती आई है। आज पीओजेके के लोगों ने पाकिस्तान के प्रशासनिक नियंत्रण और उसकी संप्रभुता दोनों को सिरे से खारिज करना शुरू कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान अक्सर यह नैरेटिव बेचने की कोशिश करता है कि पीओजेके में होने वाले विद्रोह महज ‘स्थानीय करों और प्रशासनिक मुद्दों’ तक सीमित हैं। लेकिन जून 2026 का आंदोलन उस निरंतरता की पुष्टि करता है जो जमीनी स्तर पर पीओजेके में पाकिस्तान से आजाद होने और भारत से जुड़ने के आधार को हर बीतते दिन के साथ दृढ़ करता जा रहा है।

लोगों में उबाल

10 जून को अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में पुंछ और रावलाकोट संभाग में निकाली गई विशाल रैली में हजारों कश्मीरी युवाओं ने नियंत्रण रेखा की तरफ बढ़ने का प्रयास किया। उनके हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर नारे थे-“आरपार जोड़ो, नियंत्रण रेखा तोड़ो”, “मुजफ्फराबाद-श्रीनगर व्यापार बहाल करो”, “पाकिस्तान से आजादी”, “लूट-खसोट की यह सरकार, नहीं चलेगी, नहीं चलेगी”, “यह मुल्क हमारा है, तुम्हारी जागीर नहीं”। इस तरह के नारे क्या लगे, हमेशा की तरह पाकिस्तान के हाथ-पैर फूल गए। फौरन इंटरनेट बंद कर दिया गया।

कड़े पहरे और इंटरनेट पर पाबंदी के बावजूद छिटपुट वीडियो बाहर आए, जिनसे पता चलता है कि पीओजेके का यह उबाल कैसा था। मुजफ्फराबाद के बीचों-बीच प्रदर्शनकारी युवा पाकिस्तानी रेंजर्स के सामने खड़े होकर पाकिस्तान से आजादी के नारे लगा रहे हैं। स्थानीय छात्र संगठनों और नागरिक समितियों द्वारा जारी साझा घोषणापत्रों में अब खुलकर यह मांग जोड़ी जा रही है कि कश्मीर के दोनों हिस्सों के बीच की कृत्रिम सीमाओं को हमेशा के लिए खत्म किया जाए। साफ है, ये नारे किसी एक समूह का तात्कालिक गुस्सा नहीं, बल्कि पूरे पीओजेके की सोची-समझी आवाज बन चुके हैं।

वादों की मियाद और समझौतों का विश्वासघात

इस अभूतपूर्व बगावत को समझने के लिए हमें 2025 की उन कड़ियों को जोड़ना होगा, जिनकी मियाद खत्म होने के बाद यह ज्वालामुखी फटा है। पिछले साल जब इसी तरह के भारी जन-आंदोलन ने इस्लामाबाद की चूलें हिला दी थीं, तब सरकार ने अवामी एक्शन कमेटी के साथ एक ‘लिखित समझौता’ किया था। वादा था कि स्थानीय जलविद्युत परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली स्थानीय नागरिकों को बिना किसी अतिरिक्त कर या अधिभार के बेहद रियायती दरों (3 से 5 रुपये प्रति यूनिट) पर दी जाएगी। साथ ही, आटे पर स्थायी सब्सिडी बहाल करने और वीआईपी संस्कृति को खत्म करने की बात भी लिखित रूप में स्वीकार की गई थी।

लेकिन, हमेशा की तरह सरकार और उसकी फौज ने इस समझौते का केवल आधा-अधूरा पालन किया। जैसे ही सड़कों से भीड़ हटी, वादों को फाइलों में दबा दिया गया। समझौतों की शर्तों को लागू करने की जो समय-सीमा थी, उसके बीतते ही लोगों का सब्र टूट गया। लोगों ने देखा कि उनके हिस्से के पानी से बनने वाली सस्ती बिजली आज भी पंजाब (पाकिस्तान) के वीआईपी इलाकों को रोशन कर रही है, जबकि खुद पीओजेके के लोग 18-18 घंटे की लोडशेडिंग और भारी-भरकम बिलों का सामना कर रहे हैं।

फौजी दमन

जब लोग सड़क पर उतरे तो रावलपिंडी ने अर्धसैनिक बल को जगह-जगह तैनात कर दिया। शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ रहे निहत्थे नागरिकों पर रेंजर्स ने आंसू गैस के गोले दागे, लाठीचार्ज किया गया और ऐसे में जो होता है, वही हुआ- भीड़ बेकाबू हो गई। और उसके बाद पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने भी वही किया जो वे अच्छी तरह जानते हैं- बूटों के तले जनविरोध को कुचलने की कोशिश। सुरक्षा बलों ने सीधे लोगों को निशाना बनाकर फायरिंग शुरू कर दी। दोनों ओर से हिंसा हुई और इसमें सरकारी आंकड़ों के अनुसार सुरक्षाबलों के चार जवानों समेत कुल 11 लोग मारे गए। लेकिन स्वतंत्र रिपोर्टों के अनुसार 30 से अधिक लोग मारे गए और 200 से अधिक घायल हुए, जिनमें कई की हालत गंभीर है। सेना ने ईदगाह मैदान में किफायती आटा, चावल, बिजली और बुनियादी अधिकारों की मांग को लेकर हो रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलीबारी की।

दरअसल, फौज यह समझ नहीं सकी कि वजूद की लड़ाई लड़ रही जनता को बंदूकों के डर से चुप नहीं कराया जा सकता। असंतोष को दबाने की इस सैन्य जिद ने पाकिस्तानी बेड़ियों को तोड़ने की उत्कंठा को और मजबूत कर दिया है। पीओजेके में आंदोलन का नेतृत्व कर रही ‘जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ का साफ कहना है कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं, वे आंदोलन नहीं रोकेंगे। संगठन ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी रणनीति केवल बिजली और आटे की सब्सिडी तक सीमित नहीं, बल्कि वे जुलाई 2026 में होने वाले चुनावों से पहले विधानसभा की उन 12 विवादित ‘रिफ्यूजी सीटों’ को खत्म करने की मांग पर अड़े हैं, जिनका इस्तेमाल इस्लामाबाद वहां अपनी पसंद की कठपुतली सरकार बनाने के लिए करता है। व्यापारी और युवा ही नहीं, बल्कि स्थानीय ‘बार काउंसिल’ के आह्वान पर वकीलों ने भी अदालतों का पूर्ण बहिष्कार कर दिया है। कर न देने की नागरिक अवज्ञा को और तेज करने की रणनीति बनाई गई है।

सच हो रही अमित शाह की बात

पीओजेके की सड़कों पर लग रहे आजादी समर्थक नारों के बीच, भारत का रणनीतिक नजरिया प्रासंगिक साबित हो रहा है। भारत का हमेशा से यह आधिकारिक रुख रहा है कि 1947 के विलय-पत्र के बाद से पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और 1994 के संसदीय प्रस्ताव के तहत पाकिस्तान को यह अवैध कब्जा खाली करना ही होगा। इस सिलसिले में, भारत के गृहमंत्री अमित शाह का दिसंबर 2023 में लोकसभा में जम्मू-कश्मीर से जुड़े विधेयकों पर चर्चा के दौरान दिया गया जवाब उल्लेखनीय हैः “पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर हमारा है, इसे हमसे कोई नहीं छीन सकता। हमें पीओजेके को वापस लेने के लिए किसी सैन्य कार्रवाई या कुछ और करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी; वहां की जनता पर जो जुल्म हो रहा है, वहां जो भुखमरी और अंधेरा है, उसके कारण वहां के लोग खुद-ब-खुद उठ खड़े होंगे और भारत में शामिल होने की मांग करेंगे। क्योंकि वे देखेंगे कि नियंत्रण रेखा के इस पार भारत के कश्मीर में कितनी खुशहाली, विकास और नागरिक सम्मान है।”

गहरी टीस

मुजफ्फराबाद के युवाओं के मन में नियंत्रण रेखा को तोड़कर भारत की तरफ देखने की यह जो टीस है, उसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और आर्थिक कारण है। सोशल मीडिया के इस युग में सूचनाओं पर पहरा देना मुमकिन नहीं रहा। अधिकृत कश्मीर का आम नागरिक जब सीमा पार भारत के जम्मू-कश्मीर की ओर देखता है, तो उसे अपनी बदहाली और वहां की खुशहाली का अंतर साफ दिखता है। वह देखता है कि भारत के जम्मू-कश्मीर में आज चिनाब नदी पर दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल खड़ा है, वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेनें घाटी को देश के कोने-कोने से जोड़ रही हैं, और एम्स, आईआईटी व आईआईएम जैसे वैश्विक स्तर के संस्थान वहां के युवाओं का भविष्य संवार रहे हैं। भारत सरकार ने जहां अपने कश्मीर के प्रत्येक नागरिक को स्वास्थ्य सुरक्षा दी है और वहां का पर्यटन उद्योग नए रिकॉर्ड बना रहा है, वहीं दूसरी ओर पीओजेके की त्रासदी यह है कि वहां के लोग जब आटा मांगते हैं तो उन्हें गोलियां खानी पड़ती हैं। यही अंतर है जो वहां के लोगों में यह मलाल पैदा कर रहा है कि काश, वे भी भारत का अंग होते!

इतिहास का यह क्रूर और अटल नियम है कि आप बंदूकों और संगीनों के साये में किसी जमीन के टुकड़े पर लंबे समय तक अवैध कब्जा तो रख सकते हैं, लेकिन वहां रहने वाले इंसानों की अस्मिता और उनके आत्मसम्मान को कभी गुलाम नहीं बना सकते। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में भी पाकिस्तानी शासकों को वहां की उपजाऊ जमीन और संसाधन तो चाहिए थे, लेकिन वहां के बंगाली समाज के अधिकारों से उन्हें कोई सरोकार नहीं था; नतीजा 1971 में पाकिस्तान का भूगोल बदल गया। यही कहानी आज बलूचिस्तान में दोहराई जा रही। मुद्दे की बात यह है कि यदि आप फौजी बूट से राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजने की जिद पर अड़े रहेंगे, तो अंततः आप अपना नियंत्रण और अपनी जमीन दोनों ही खो देंगे।

एक देश में सरकार के पास सेना होती है, लेकिन पाकिस्तान की ‘खासियत’ है कि वहां सेना के हाथ सरकार है। इसी कारण फौजी बूट से राजनीतिक समाधान निकालने की नीति उसके डीएनए में बैठ गई है और लगता नहीं कि पाकिस्तान की व्यवस्था में वह क्षमता है कि जीन थेरेपी कर अपने डीएनए को बदल सके। भारत के कूटनीतिक लक्ष्यों की दृष्टि से तो यह अच्छी ही बात है क्योंकि पाकिस्तान ने जिस रास्ते पर पीओजेके को डाल दिया है, उसी में आगे एक मील का पत्थर दिख रहा है, जिस पर भारत लिखा है। आपको दिख रहा है क्या?

 

Topics: पाञ्चजन्य विशेषभारतीय दृष्टिकोणपीओजेके आंदोलनअवामी एक्शन कमेटीनियंत्रण रेखा तोड़ोजम्मू-कश्मीररिफ्यूजी सीटें विवादमानवाधिकारपीओजेके बिजली संकअमित शाहआटे पर सब्सिडीपाकिस्तानी सेनानागरिक अवज्ञा आंदोलनअखंड भारतभारत-पीओजेकेमुजफ्फराबादविकास तुलना
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