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होम भारत

हौसले की उड़ान को हथियारों के पंख

भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने हाल ही में रक्षा क्षेत्र में विमर्श के बड़े मंच शंगारी-ला डॉयलाग में बताया कि भारत ने विएतनाम के साथ ब्रह्मोस के निर्यात के सौदे पर हस्ताक्षर किए हैं।

Written byप्रेरणा कुमारीप्रेरणा कुमारी — edited by Mahak Singh
Jun 15, 2026, 01:58 pm IST
in भारत
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने हाल ही में रक्षा क्षेत्र में विमर्श के बड़े मंच शंगारी-ला डॉयलाग में बताया कि भारत ने विएतनाम के साथ ब्रह्मोस के निर्यात के सौदे पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा भारत जल्द ही संभवतः इंडोनेशिया को भी ब्रह्मोस मिसाइल का निर्यात करेगा। इस तरह रूस के साथ विकसित की गई ब्रह्मोस मिसाइल से भारत ने रक्षा क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ा कदम बढ़ाया है। भारत द्वारा ब्रह्मोस की तगड़ी मार्केटिंग दरअसल रक्षा क्षेत्र में भारत की वर्षों से चली आ रही रणनीतिक गलती में बड़ा सुधार है। अब तक भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। स्टॉकहॉम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के आंकड़ों के अनुसार, अगर फिलहाल रूस से युद्ध में उलझे यूक्रेन को छोड़ दिया जाए तब भारत विश्व में रक्षा संसाधनों का सबसे बड़ा आयातक है। रक्षा जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भरता कई तरह से हमारा सामरिक झंझट बन गई है। हथियारों-रक्षा संसाधनों के विदेशों से आयात के कारण एकतरफ हमें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है, दूसरी तरफ सैन्य संघर्ष के मामले में हम हथियारों की आपूर्ति के लिए दूसरे देशों की प्राथमिकताओं और सनक पर निर्भर हो जाते हैं। अगर हम विदेशी मुद्रा खर्च करने को तैयार हों, दूसरा देश हथियारों की आपूर्ति के लिए तैयार हो तब भी युद्ध के दौरान दुश्मन देशों द्वारा रक्षा जरूरतों की आपूर्ति लाइन्स पर हमले करने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी है कि इस अड़चन का समाधान निकाला जाए?

लंबे युद्धों में आत्मनिर्भर रक्षा संसाधनों की जरूरत और भारत के लिए सीख

किसी भी युद्ध को जीतने के लिए सैनिकों और आम लोगों के हौसले, साहस और संघर्ष के साथ हथियारों और संसाधनों की जरूरत होती है। रूस-यूक्रेन युद्ध और इजरायल-हमास संघर्ष से यह बात साफ हो गई है कि अब सैन्य संघर्ष दिनों-हफ्तों नहीं बल्कि सालों तक लंबे खिंच सकते हैं। ऐसे में नए जमाने के सैन्य संघर्षों के मामले में किसी भी देश के लिए अब बड़ी चुनौती यह है कि सालोंसाल चलने वाले युद्ध के लिए हथियार-संसाधन कैसे जुटाए जाएं। रक्षा संसाधनों के उत्पादन के मामले में यूक्रेन आत्मनिर्भर नहीं है, ऐसे में यूक्रेन की सैन्य क्षमता अमेरिका और यूरोपीय देशों से मिलने वाली सहायता पर निर्भर है। यह निर्भरता यूक्रेन के लिए इस हद तक भारी पड़ रही है कि उनके जमीनी अधिकार पर ही खतरा पड़ गया है। राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व वाली अमेरिका की नई सरकार हथियारों की आपूर्ति रोकने की धमकी देकर उसे रूस से समझौता करने पर मजबूर कर रही है। अब भारत के लिए भी रास्ता बिल्कुल सीधा है कि अगर चीन-पाकिस्तान के साथ किसी संभावित संघर्ष के मामले में हम विदेशी ताकतों के अनुचित दबाव से बचना चाहते हैं, तब हमें रक्षा संसाधनों के मामले में भी उन पर निर्भरता से बचना होगा।

भारत में रक्षा उत्पादन और निर्यात में तेज़ी से बढ़ती आत्मनिर्भरता और निजी क्षेत्र की भूमिका

अगर पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नज़र दौडाई जाए तब भारत ने रक्षा संसाधनों के उत्पादन और निर्यात दोनों को बढ़ाने की तरफ खास ध्यान दिया है। वित्त वर्ष 2020-21 में भारत का 84,643 करोड़ का रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2024-25 में करीब दोगुणा होकर 1,50,590 करोड़ तक पहुंच चुका है। वर्ष 2025-26 के आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं। इसी तरह वित्त वर्ष 2020-21 में भारत का 8,435 करोड़ का रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2025-26 में करीब साढे चार गुणा होकर 38,424 करोड़ तक पहुंच चुका है। इन पांच वर्षों में भारत के रक्षा निर्यात में औसतन 35% की वृद्धि दर रही है। आज भारत 100 से अधिक देशों को रक्षा संसाधनों की आपूर्ति कर रहा है। यहां तक पहुंचने के लिए मोदी सरकार ने कई कदम उठाए हैं। सबसे पहले रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा दिया गया। आजादी के बाद दशकों तक भारत में अजीब नीति थी। हमने देश में निजी क्षेत्र को रक्षा संसाधनों के उत्पादन से बाहर रखा था वहीं हम विदेशी निजी कंपनियों से खरीदारी कर रहे थे। इसके अलावा केंद्र सरकार ने ऐसी रक्षा जरूरतें चिह्नित की जिनके लिए स्थानीय खरीदारियों को अनिवार्य किया गया। आज रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 22.6% है, वही रक्षा निर्यात में निजी क्षेत्र की भागीदारी 64% है। इस तरह वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बनने के मामले में भारत का निजी क्षेत्र सरकारी संस्थाओं से कहीं आगे है।

हमारे लिए आगे की डगर चुनौतियों से भरी है। भारत रोबोटिक्स, एआई-आधारित रक्षा प्रणालियों, स्टील्थ प्रौद्योगिकी या नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणालियों जैसी अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों के उत्पादन में अभी भी विश्व के विकसित देशों से मीलों पीछे है और अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में वैल्यू के हिसाब से हमारी हिस्सेदारी अभी भी नगण्य है लेकिन जैसे मीलों का सफर छोटे-छोटे कदमों से शुरू होता है, उसी तरह यह भारत की अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में यह सधी हुई शुरूआत है।

भारत को रक्षा उत्पादन में वैश्विक शक्ति बनाने की दिशा में आत्मनिर्भरता और स्थानीय उत्पादन पर जोर

अगर सरकार और उद्योग इस पर मिलकर कदम बढ़ाएं तब अपनी विशाल युवा जनसंख्या, औद्योगिक उत्पादन की बुनियादी संरचना की मौजूदगी और कूटनीतिक-राजनीतिक इच्छाशक्ति के बूते हम रक्षा उत्पादन के अग्रणी देशों की पंक्ति में पहुंच सकते हैं। रक्षा निर्यात के साथ भारत ने रक्षा जरूरतों के स्थानीय उत्पादन पर भी बल दिया है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि अगर हम कोई हथियार प्रणाली विदेश से आयात भी करते हैं तब भी इसके ज्यादातर हिस्सों का उत्पादन अथवा इसका मूल्य संवर्धन (Value Addition) भारत में ही हो। इससे भारत में रक्षा उद्योगों, आपूर्तिकर्ताओं, कुशल कार्मिकों, स्टार्ट अप्स और सेवा प्रदाताओं का इकोसिस्टम बन पाएगा।

रक्षा उत्पादन का अर्थव्यवस्था, तकनीक और आधुनिक विकास से गहरा जुड़ाव

दरअसल सरकारों और नीतियां बनाने वाले लोगों को यह समझना होगा कि रक्षा उत्पादन का रोजगार सृजन, औद्योगिक विकास, तकनीकी नवाचार और आर्थिक विकास से गहरा संबंध है। रक्षा जरूरतों के स्थानीय उत्पादन से रणनीतिक स्वायत्तता, विश्वसनीय आपूर्ति लाइन्स और रक्षा उत्पादों की गहन समझ के सामरिक फायदों के साथ-साथ देश के सकल औद्योगिक और आर्थिक विकास को भी तेजी मिलती है। रक्षा जरूरतों के लिए इस्तेमाल होने वाली आजकल की अत्याधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा, ड्रोन प्रणालियां, क्वांटम संचार, उन्नत सामग्री (Advanced Materials) और अंतरिक्ष एवं उपग्रह प्रौद्योगिकयों के रक्षा और व्यावसायिक दोनों क्षेत्रों में अनुप्रयोग हैं। अगर रक्षा जरूरतों के लिए कोई नई सामग्री, तकनीक या प्रौद्योगिकी विकसित की जाती है तब इसके आम लोगों के इस्तेमाल के क्षेत्र में भी स्पिलओवर होते हैं। जैसे रक्षा अनुसंधान से विकसित जीपीएस और नेविगेशन तकनीकें आज परिवहन और मोबाइल सेवाओं में इस्तेमाल होती हैं। ड्रोन का इस्तेमाल कृषि, सर्वेक्षण और आपदा प्रबंधन में होता है। साइबर सुरक्षा प्रौद्योगिकियों का बैंकिंग और वित्तीय लेन-देन की सुरक्षा में इस्तेमाल होता है। ऐसे में रक्षा उत्पादन और शोध पर खर्च की जाने वाली धनराशि असल में देश की सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक विकास में निवेश है।

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प्रेरणा कुमारी
प्रेरणा कुमारी
डीआरडीओ में कार्यरत रह चुकी हैं। पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता-अनुवाद में सक्रिय हैं। इस दौरान वन इंडिया, उदय इंडिया, स्वदेश, दैनिक जागरण, पांचजन्य और नई दुनिया जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर लेख प्रकाशित हो चुके हैं। फिल्म समीक्षा, पुस्तक समीक्षा, महिला विमर्श और साहित्यिक समीक्षा में भी गहरी पकड़ है। [Read more]
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