देश का विपक्षी गठबंधन इंडी गठबंधन एक बार फिर से सक्रिय होकर बैठकों का सिलसिला शुरू कर दिया है। 8 जून को लंबे अंतराल के बाद दिल्ली में बैठक हुई, जिसमें ज्यादातर क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस पर गठबंधन की नाकामी का ठीकरा फोड़ने का प्रयास किया। समाजवादी पार्टी, जिसे अब कुछ महीने में ही उत्तर प्रदेश का विधानसभा का चुनाव कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन में लड़ना है। उसने कांग्रेस पार्टी पर सीटों की संख्या के लिए का दबाव बनाने का प्रयास किया है।
जबकि राहुल गांधी ने इसी बैठक में कहा था इसे एकदम गोपनीय रखना चाहिए और इसके लिए कोई मोबाइल फोन भी नहीं लाएगा। मगर बाद में राहुल गांधी ने खुद 585 सेकंड का ऑडियो संदेश जारी कर दिया। इसमें राहुल गांधी ने सबसे स्पष्ट शब्दों में कहा था कि मैं ही भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लड़ सकता हूं। राहुल गाँधी ने अपने सहयागियों की क्षमता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उनकी औकात भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लड़ने की नहीं है।
राहुल गांधी ने सहयोगियों के समक्ष दिखाई असली रंगत
राहुल गांधी ने इस बैठक में अपने सहयोगियों के समक्ष अपनी और अपनी पार्टी की असल रंगत दिखा दी है। राहुल गांधी ने केरल से लगातार दो बार 2016 और 2021 में निर्वाचित मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के संदर्भ में कहा कि वो उनके साथ हाथ नहीं मिला सकते हैं।पिनराई विजयन पर बयान जारी करके राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी जिन भी प्रदेशों में चुनाव जीतेगी, उनमें वो अपने सहयोगियों के साथ कोई भी संबंध नहीं रखेगी। विजयन पर राहुल गांधी का यह संदेश कांग्रेस पार्टी के वर्तमान सहयोगियों के लिए एक चेतावनी और खतरे की घंटी से कम नहीं है।
कांग्रेस पार्टी का अपने सहयोगी के साथ बर्ताव हमेशा प्रश्नों के घेरे में रहा है। बिहार में 2025 के विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस ने राजद और अन्य सहयोगियों के साथ गठबंधन पर अंतिम समय तक दुविधा बनाए रखी और अपनी ताकत से लगभग तीन गुना 61 सीट गठबंधन में झटक लिया था। कांग्रेस महज 6 सीट ही जीत सकी। वहीं राजद भी महज 25 सीट ही जीत सकी थी। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी ने अपने पूर्व के सहयोगियों तृणमूल कांग्रेस पार्टी या वाम दलों के साथ गठबंधन करने का कोई भी प्रयास नहीं किया था।
कांग्रेस की राजनीतिक धोखाधड़ी
कांग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी की असल राजनीतिक धोखाधड़ी तमिलनाडु में देखने को मिली, जहाँ चुनाव बाद द्रमुक को छोड़कर कांग्रेस जोसफ विजय की पार्टी टीवीके के साथ गठबंधन करके सरकार में शामिल हो गई। गठबंधन से पूर्व ही जानकारों के अनुसार, विजय ने कांग्रेस को राज्य मंत्रिमंडल में दो स्थान और एक राज्यसभा की सीट तय कर दिया था। इस कारण कांग्रेस पार्टी ने द्रमुक को छोड़ दिया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर राहुल और कांग्रेस पार्टी के इस कदम पर व्यंग्य भी किया था। राहुल गांधी के राजनीतिक तौर तरीकों से उनके महाराष्ट्र के सहयोगी शरद पवार और उद्धव ठाकरे भी सहज नहीं रहते हैं।
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राहुल गांधी का लक्ष्य ही सहयोगियों की हत्या करना रहा है
कांग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी का एक प्रयास होता है कि अपने सहयागियों को कमजोर किया जाए, जिससे कि उस दल को कांग्रेस पार्टी पर निर्भर होना पड़े। ममता बनर्जी और तेजस्वी यादव के साथ 2026 और 2025 में इसी प्रकार की राजनीति हुई है। आम आदमी पार्टी पहले ही कांग्रेस पार्टी की इस नीति के चलते किनारा कर चुकी है। राहुल गांधी ने ऑडियो संदेश के जरिए अपनी नीति और रणनीति को स्पष्ट कर दिया है, जिससे उनके सहयोगियों को बच कर रहने की जरूरत है। केरल में राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी के जीत का घमंड है क्योंकि अभी हाल ही में सम्पन्न हुए केरल विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने पी विजयन के नेतृत्व वाली माकपा नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट को चुनावी शिकस्त दी है।
इसका सीधा मतलब है कि राहुल गाँधी और कांग्रेस पार्टी जिन प्रदेशों में चुनाव जीत जाएगी, वहां इंडि गठबंधन के सहयागियों से भी पाला झाड़ लेगी जैसा कि उसने ने केरल के संदर्भ में किया है। कांग्रेस पार्टी राज्य दर राज्य जैसे मजबूत होगी वैसे-वैसे उस राज्य के सहयोगी दल से किनारा कर लेगी। यह राहुल गांधी की राजनीतिक नासमझी को दर्शाता है।
राहुल भाजपा से सीखें गठबंधन धर्म निभाना
राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को भाजपा से यह सीखना चाहिए कि अपने सहयोगियों के साथ किस प्रकार से संबंध स्थापित किया जाए। भाजपा किसी भी सहयोगी के साथ अपना संबंध नहीं तोड़ती है। भाजपा ने असम के 126 सदस्यीय विधानसभा में 82 सीट जीतकर स्पष्ट बहुमत के बहुत ही अधिक सीट जीता है। मगर इसके बावजूद भी भाजपा ने अपने सहयोगी असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ गठबंधन की सरकार चला रही है।
महाराष्ट्र का ही ले लीजिए, जहां भाजपा का स्पष्ट बहुमत से महज 13 सीट कम है। इसके बावजूद भी भाजपा अपने छह सहयोगियों जिसमें शिवसेना और एनसीपी शामिल हैं, के साथ ही निर्दलीय विधायकों के साथ गठबंधन की सरकार भली भांति चला रही है। त्रिपुरा में भी भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत से अधिक 33 सीटें हैं। मगर इसके बावजूद भी भाजपा अपने सहयोगियों टिप्रा मोथा और इंडिजेनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के साथ सरकार चला रही है।
बिहार में भाजपा लम्बे समय से जनता दल (यू), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तान एवं मोर्चा और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा के साथ सरकार चला रही है। भाजपा के लिए इतने दलों की आवश्यकता नहीं होने के बावजूद भी गठबंधन धर्म को निभाते हुए इन दलों को मंत्रिमंडल में सहयोगी के तौर पर शामिल किये हुए है। भाजपा ने महज चार विधायक होने के बावजूद भी उपेंद्र कुशवाहा को पूरे छह साल के कार्यकाल का राज्यसभा सीट देकर उनकी राजनीतिक लोकप्रियता का पूरा सम्मान किया है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में आवश्यक 202 विधायकों की अपेक्षा भाजपा के पास खुद के 258 विधायक हैं, मगर इसके बावजूद भी भाजपा ने अपना दल (सोनेलाल), राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, निषाद पार्टी के अलावा तीन निर्दलीय विधायकों को अपने गठबंधन में शामिल किया है।
भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में झारखण्ड में अपनी सबसे मजबूत सीटों में से एक गिरिडीह सीट को अपंने सहयोगी आल झारखण्ड स्टूडेंट्स यूनियन को दे दिया। तब जबकि 1996 से भाजपा यह सीट 2004 को छोड़कर आसानी से हरबार जीत रही थी। 2004 में भाजपा ने झारखंड में केवल एक सीट कोडरमा ही जीत सकी थी। 2019 के लोकसभा के चुनाव में भाजपा ने बिहार में अपनी पांच जीती सीट अपने सहयोगी जनता दल यूनाइटेड को दे दिया था। 2014 के लोकसभा के चुनाव में जेडीयू जहाँ महज दो सीट और भाजपा 22 सीट जीती थी। इसके बावजूद भी 2019 में भाजपा और जेडीयू ने गठबंधन में बराबरी पर 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था।















