
भारत की सात बहनें कहे जाने वाले पूर्वोत्तर राज्यों में ईसाई मतांतरण तेजी से हुआ है। इसे रोकने के लिए कानून भी बने लेकिन पूर्व की सरकारों ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था। हालांकि, अब अरुणाचल प्रदेश में आखिरकार 48 साल बाद धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (अरुणाचल प्रदेश फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट – APAFRA) लागू हो गया है। यह कानून 1978 में पारित हुआ था, लेकिन तब से अब तक लागू नहीं हो पाया। इसका मुख्य मकसद लालच, धोखे या जबरदस्ती से होने वाले धर्म परिवर्तन को रोकना है।
बीजेपी सरकार के समय में यह कदम उठाया गया है। पहले जनता पार्टी के शासन में कानून बना था, लेकिन सरकार गिरने के बाद यह ठंडे बस्ते में चला गया। कांग्रेस और पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (PPA) के समय में भी इसे लागू नहीं किया गया। इसका असर ये हुआ है कि जिस राज्य में हिन्दू कभी सबसे बड़ी आबादी थी, अब वे वहां दूसरे नंबर पर आ गए हैं।
8 जून को सेवानिवृत्त न्यायाधीश बी.पी. कटके की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने सरकार को नियमों का मसौदा सौंपा। इसके बाद यह कानून अमल में आया। कानून में साफ है कि कोई भी व्यक्ति बल, धोखाधड़ी या प्रलोभन देकर दूसरे को धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। लेकिन नियमों के अभाव में इतने सालों तक यह सिर्फ कागजों में ही रहा। इन पांच दशकों में राज्य की धार्मिक स्थिति काफी बदल गई है। ईसाई मिशनरियों के प्रभाव से ईसाई आबादी में तेजी से बढ़ोतरी हुई।
इसे भी पढ़ें: मौसम अपडेट: सुपर एल नीनो ने बिगाड़ा मानसून का चक्र, भारत में 28% कम बारिश
1981 की जनगणना के अनुसार:
कुल आबादी: 6,31,839
हिंदू: 1,84,732 (29.24%)
बौद्ध: 86,483 (13.69%)
ईसाई: 27,306 (4.32%)
मुस्लिम: 5,073 (0.80%)
ईसाई: 4,18,732 (30.26%) – सबसे ज्यादा
हिंदू: 4,01,876 (29.04%)
अन्य धर्म (मुख्यतः प्रकृति पूजा करने वाले मूल वनवासी): 3,62,569 (26.20%)
मुस्लिम: 27,045 (1.95%)
इस तरह हिंदू आबादी पहले नंबर से दूसरे पर आ गई और ईसाई सबसे ऊपर पहुंच गए।
पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (PPA) ने इस कानून का कड़ा विरोध किया है। PPA के अध्यक्ष नबाम विवेक ने कहा कि पार्टी ने 11 जून को बैठक की और इसके खिलाफ प्रस्ताव पास किया। उन्होंने राज्य सरकार से मांग की है कि इस मुद्दे पर तुरंत विशेष विधानसभा सत्र बुलाया जाए। विवेक ने सवाल उठाया कि सरकार धार्मिक जनसांख्यिकी डेटा इकट्ठा करके क्या करेगी। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति अपना धर्म चुनने के लिए स्वतंत्र है – सिख, बौद्ध, ईसाई या हिंदू। ऐसे में सरकार को व्यक्ति के धर्म का रिकॉर्ड रखने की जरूरत नहीं है। मानवाधिकार संगठन अरुणाचल (HRA) ने भी सरकार और बीजेपी से अपील की है कि समिति की सिफारिशों पर दोबारा विचार करें और इस कानून को लागू न करें।