ऐसा महान योद्धा जिसे इतिहास में दुर्भावना के चलते उचित स्थान नहीं दिया गया। भरतपुर रियासत के महाराजा सूरजमल कभी भी युद्ध नहीं हारे थे । उन्होंने 12 जून 1761 को मुगलों (शाहआलम द्वितीय के सेनापति नजीब) को परास्त करने के बाद आगरा और लालकिला पर कब्जा कर लिया था। वीर जाटों का यह कब्जा दस साल से ज्यादा समय तक सूरजमल के पुत्र जवाहर सिंह की मृत्यु तक बना रहा ।
महाराजा के पिता बदन सिंह ने अपने जीवित रहते ही सूरजमल को शासन की बागडोर सौंप दी थी। बदन सिंह बेहद धार्मिक प्रवत्ति के थे उन्होंने अपना अंतिम समय अपने द्वारा बनवाये गए डीग किले में भगवान कृष्ण की भक्ति में गुजारा। सूरजमल लंबी काठी के थे। युद्ध तो उनके लिये जैसे खेल ही हो। बदन सिंह के कुछ प्रारंभिक युद्धों को छोड़कर लगभग सभी युद्धों को उन्होंने ही लड़ा था। ज्यादातर उनके युद्ध मुगलों के खिलाफ ही लड़े गए थे। राज्य का विस्तार राजस्थान के भरतपुर, अलवर, मेवात सहित काफी इलाके में किया था। दिल्ली और उसके आसपास के कुछ इलाके छोड़ दें तो लगभग पूरा हरियाणा, आगरा से अलीगढ़,खुर्जा , बुलंदशहर , मेरठ तक सूरजमल ने अपनी विजय पताका फहराई थी। पूर्व में फर्रुखाबाद, मैनपुरी, फिरोजाबाद, एटा , इटावा तक सूरजमल का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष नियंत्रण था।
मुस्लिम और वामपंथी इतिहासकारों की दुर्भावना
सूरजमल के विजय अभियान में उनके संबंधी बलराम सिंह, जिनके नाम पर वल्लभगढ़ बसाया गया है, ने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। महाराजा ने मुगल सल्तनत को दिल्ली शहर औऱ उसके आसपास के थोड़े से इलाके में ही समेट दिया था। मशहूर इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने ‘डिक्लाइन ऑफ मुगल एम्पायर’ और प्रोफेसर कानूनगो ने अपनी किताब ‘द हिस्ट्री आफ जाट’ में विस्तार से वर्णन किया है। कांग्रेस के दिग्गज और पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने भी ‘महाराजा सूरजमल’ किताब में भी महाराजा सूरजमल द्वारा मुगलों की दूसरी राजधानी आगरा और किले पर कब्जे करने का वर्णन विस्तार से किया है।
जब मराठा सरदार मल्हार होल्कर ने भरतपुर राज्य के कुम्हेर किले की घेराबंदी की तो किले पर तैनात जाट सैनिकों ने गोलियां बरसाईं। इसी गोलीबारी में मल्हार होल्कर के पुत्र और लोकमाता अहिल्याबाई के पति खांडेराव होल्कर की मृत्यु हुई। इस घटना से सूरजमल दुखी हुए और उन्होंने गोलीबारी करने वाले जाट सैनिकों को खरी-खोटी सुनाई तथा खांडेराव की मौत पर अफसोस जताया। उन्होंने राजा मल्हार होल्कर को शोकवस्त्र और पत्र भेजा। बड़े अचरज की बात है कि इतिहास की इतनी बड़ी जाटों से सम्बंधित सत्य घटनाओं को किसी भी मुस्लिम और वामपंथी इतिहासकार ने नहीं लिखा । जबकि न जाने कितने मुस्लिम और वामपंथी इतिहासकारों जैसे इरफान हबीब ,लईक अहमद,हरिश्चन्द्र वर्मा, सतीश चंद्र ने मुगल इतिहास पर भरपूर कलम चलाई है।
दिल्ली के नागरिकों को दिया अभय
अब बात करते हैं महाराजा सूरजमल के शौर्य और पराक्रम की । 1739 में नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण कर भारी लूटमार कर तबाही मचा दी। भरतपुर के राजा बदन सिंह ने एक छोटी सैनिक टुकड़ी को लेकर अपने पुत्र राजकुमार सूरजमल को दिल्ली के नागरिकों की रक्षा करने और राहत कार्य के लिए भेजा । भूख से परेशान दिल्ली के नागरिकों को सूरजमल ने शिविर लगाकर अन्न और दवा मुहैया कराया। जनवरी 1757 में अब्दाली ने दिल्ली पर आक्रमण किया तब भी दिल्ली के नागरिकों की रक्षा के लिये सूरजमल के बेटे जवाहर सिंह ने अब्दाली की टुकड़ी पर घात लगाकर हमला कर अब्दाली के सैकड़ो सैनिकों को दिल्ली और हरियाणा की सीमा पर मौत के घाट उतार दिया । चूंकि अब्दाली की विपुल हथियारों से लैस सेना के आगे हमला करने वाले जाट सैनिक बहुत कम संख्या में थे फिर भी जवाहर सिंह ने यह जोखिम इसलिए उठाया और अब्दाली को दिल्ली से आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की । फिर भी अब्दाली दिल्ली को रौंदते हुए मथुरा की ओर बढ़ा।
मराठों की सुरक्षा और सहायता की
सूरजमल ने डीग के अभेद्य किले में रहकर अब्दाली के आक्रमण की आशंका से युद्ध की तैयारी करने में जुट गए साथ ही जाट राजकुमार जवाहर सिंह को दस हजार की सैनिक टुकड़ी के साथ मथुरा भेज दिया। मथुरा में जवाहर ने जान पर खेलकर अब्दाली के सैनिकों से भारी संघर्ष कर लूटमार करने से रोकना चाहा । इस संघर्ष में अब्दाली के लगभग 7,000 सैनिक मारे गए जबकि जाट योद्धा 5,000 की संख्या में मारे गए। अब्दाली मथुरा को तबाह करने के बाद भरतपुर राज्य पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहा था लेकिन अब्दाली के सैनिकों ने युद्ध लंबा खिंचने की संभावना के चलते जाट राजा से युद्ध करने से इंकार कर दिया। यहां चौकाने वाली बात यह थी कि राजस्थान का कोई भी राजा मथुरा को बचाने नही पहुंचा। पानीपत का युद्ध जनवरी 1761 में मराठों से हुआ था, इस युद्ध में 75 हजार मराठे वीरगति को प्राप्त हुए , हजारों घायल हुए थे। तब महाराजा सूरजमल ने जोखिम लेकर अब्दाली की मौजूदगी की परवाह न करते हुए हजारों घायल मराठों तथा मराठों के साथ आई महिलाओं की न केवल सुरक्षा और दवा की बल्कि सूरजमल की धार्मिक प्रवत्ति की रानी किशोरी ने प्रत्येक मराठा को 5 किलो अनाज और दो चांदी के रुपये दिए । अब्दाली के खौफ के चलते किसी भी राजस्थान के दूसरे राजा ने यह मानवीय कार्य करने की हिम्मत नही जुटाई।
अब्दाली की मौजूदगी में लाल किला पर कब्जा
मराठों की पराजय के बाद अब्दाली लंबे समय तक लगभग 5 महीने दिल्ली में धन इकट्ठा करने के लिये रुका रहा। सूरजमल ने अब्दाली की मौजूदगी में ही मई में 1761 में आगरा पर आक्रमण कर दिया। लगभग एक माह तक कड़े संघर्ष में सूरजमल ने आगरा और किले पर 12 जून 1761 में कब्जा कर लिया। अब्दाली को आगरा पर आक्रमण की सूचना दिल्ली में रहते ही मिली ,अब्दाली इस सूचना के बाद 5 दिन तक दिल्ली बना रहा परन्तु आगरा आने की हिम्मत नही कर सका उसने अपने लश्कर के साथ अपने वतन अफगानिस्तान जाना ही मुनासिब समझा । जबकि मुगल सेनापति नजीब अब्दाली को जाटों के खिलाफ युद्ध के लिये भड़काता रहा। जाटों का सफल संघर्ष मुगलों के अत्याचारों के खिलाफ लगभग 100 सालों तक अनवरत चलता रहा। औरंगजेब के समय मथुरा के गोकुल सिंह ने जो चिंगारी जगाई थी वह मशाल के रूप में सूरजमल औऱ जवाहर के समय प्रगट हुई जिसने मजबूत मुगल साम्राज्य को जर्जर ही नहीं किया बल्कि मुगलों की राजधानी दिल्ली शहर पर भी जाटों ने आक्रमण कर मुगलों के इज्जत के प्रतीक शाही स्नानागार के दरवाजे भी तोड़कर भरतपुर ले आये । दिल्ली पर जवाहर की लंबी घेरेबंदी के कारण भूख से तड़प रहे दिल्ली के नागरिकों ने घर से निकल कर जवाहर के आगे आत्मसमर्पण कर दिया । जवाहर ने भी विशाल हृदय का परिचय देते हुए न केवल अभय प्रदान किया बल्कि अन्न और भोजन भी दिया।
राजा सूरजमल

















