लखनऊ। राजधानी लखनऊ के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) के ट्रांसप्लांट प्रोग्राम ने चिकित्सा और इंसानियत के इतिहास में एक बेहद भावुक और बड़ी कामयाबी हासिल की है। संस्थान के डॉक्टरों ने एक मृत डोनर के शरीर से कई अंगों को सफलतापूर्वक निकालकर गंभीर रूप से बीमार मरीजों में प्रत्यारोपित (Transplant) किया है।
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे खास और भावुक बात यह रही कि अंगदान करने वाले डोनर कोई और नहीं, बल्कि बरसों तक दूसरों का इलाज करने वाले एसजीपीजीआई परिवार के ही एक प्रिय सदस्य और रिटायर्ड कर्मचारी थे। मृत्यु के बाद भी मरीजों को जीवन देने का उनका मिशन उनके अपने ही संस्थान में पूरा हुआ।
SGPGI में पांचवां और दूसरा ‘कैडेवरिक’ लिवर ट्रांसप्लांट
लिवर ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ प्रो. सुप्रिया शर्मा और उनकी विशेषज्ञ टीम ने इस बेहद जटिल और संवेदनशील ट्रांसप्लांट को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।

पीजीआई में लिवर प्रत्यारोपण से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े इस प्रकार हैं-
- कुल ट्रांसप्लांट: एसजीपीजीआई में अभी तक कुल पांच लिवर ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक संपन्न हो चुके हैं।
- जीवित डोनर: इन पांच में से तीन मामलों में जीवित परिजनों (Living Donors) ने अपने लिवर का हिस्सा डोनेट किया था।
- कैडेवरिक ट्रांसप्लांट: यह संस्थान का दूसरा ऐसा मामला है जब किसी मृत व्यक्ति के शरीर से प्राप्त लिवर (Cadaveric Liver) का सफल प्रत्यारोपण किया गया है।
- मरीज की स्थिति: प्राप्त लिवर को गैस्ट्रो सर्जरी विभाग में एक 45 वर्षीय गंभीर रूप से बीमार पुरुष मरीज में ट्रांसप्लांट किया गया है, जिन्हें अब एक नया जीवन मिला है।
सड़क हादसे के बाद ब्रेन डेड घोषित हुए थे फनीश मणि त्रिपाठी
संस्थान के रिटायर्ड कर्मचारी फनीश मणि त्रिपाठी एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए थे। गंभीर स्थिति में उन्हें अस्पताल लाया गया, जहां डॉक्टरों ने अथक प्रयासों के बाद अंततः उन्हें ‘ब्रेन डेड’ (Brain Dead) घोषित कर दिया। इस अकल्पनीय दुख की घड़ी में भी उनके परिवार ने हौसला दिखाया और मानवता की एक महान मिसाल पेश की।
परिजनों ने अंगदान (Organ Donation) के लिए अपनी लिखित सहमति दी, जिसके बाद एसजीपीजीआई में कैडेवरिक रिट्रीवल प्रक्रिया के द्वारा फनीश मणि के शरीर से कुल पांच बहुमूल्य अंग प्राप्त किए गए।
“यह संस्थान के प्रति अटूट भरोसे की मिसाल है” – डॉ. सुप्रिया शर्मा
इस ऐतिहासिक और भावुक सर्जरी का नेतृत्व करने वालीं डॉ. सुप्रिया शर्मा ने डोनर और उनके परिवार के प्रति गहरी संवेदना और कृतज्ञता व्यक्त की।
“दुर्घटना के बाद समर्पित हेल्थकेयर वर्कर का परिवार अकल्पनीय दुख से गुज़र रहा था। इसके बावजूद उन्होंने अपने प्रियजन के अंग उसी संस्थान को दान करने का फ़ैसला किया, जहाँ उन्होंने बरसों तक निष्ठापूर्वक सेवा की थी। यह फ़ैसला उस अटूट और गहरे भरोसे को दिखाता है जो एसजीपीजीआई की मूल भावना है। कई अंगों को एक साथ निकालने और उनके एक साथ ट्रांसप्लांटेशन की यह सफल प्रक्रिया, मेडिकल लॉजिस्टिक्स और हमारी सर्जिकल कुशलता की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।”
– डॉ. सुप्रिया शर्मा, लिवर ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ
दिन-रात बिना थके जुटी रही डॉक्टरों और स्टाफ की टीम
डॉ. शर्मा ने बताया कि इस पूरे अभियान को सफल बनाने के लिए संस्थान के डॉक्टरों, रेजिडेंट डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ ने दिन-रात बिना थके काम किया। पूरी टीम को अपने कर्तव्य के गहरे अहसास के साथ-साथ अपने एक पुराने साथी के प्रति भावनात्मक लगाव से भी काम करने की प्रेरणा मिल रही थी।
नर्सिंग स्टाफ़ ने बेहद सावधानी से मरीजों की देखभाल की, ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर्स ने शोक में डूबे परिवार का संवेदनशीलता के साथ मार्गदर्शन किया, जबकि तकनीशियनों, वॉर्ड बॉय और सफ़ाई कर्मचारियों ने भी इस महायज्ञ में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस साहसी और पुनीत कार्य के ज़रिए, एक समर्पित हेल्थकेयर वर्कर हमेशा के लिए SGPGI के जीवन बचाने वाले इतिहास का अमर हिस्सा बन गया है। लोगों को जीवन देने की उनकी यह महान विरासत उन मरीज़ों के दिलों में धड़कती रहेगी और उनकी साँसों में ज़िंदा रहेगी, जिन्हें इस अंगदान से जीवन का दूसरा मौका मिला है।











