क्या है जोजिला सुरंग परियोजना और क्यों है यह भारत के लिए रणनीतिक रूप से इतनी महत्वपूर्ण?
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क्या है जोजिला सुरंग परियोजना और क्यों है यह भारत के लिए रणनीतिक रूप से इतनी महत्वपूर्ण?

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की मौजूदगी में इस सुरंग के भीतर अंतिम ब्लास्टिंग (विस्फोट) की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया।

Written byजय प्रकाश गुप्ताजय प्रकाश गुप्ता
Jun 9, 2026, 09:23 pm IST
inभारत

भारत के इतिहास में आज यानी 9 जून 2026 का दिन इतिहास में दर्ज हो गया। समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर बन रही देश की सबसे महत्वाकांक्षी ‘जोजिला सुरंग परियोजना’ (Zojila Tunnel Project) में एक बहुत बड़ी कामयाबी हमारे इंजीनियर्स ने हासिल की। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की मौजूदगी में इस सुरंग के भीतर अंतिम ब्लास्टिंग (विस्फोट) की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया।

कारगिल की तरफ खुलने वाले इस सुरंग के मुहाने से जैसे ही आखिरी चट्टानी ब्लॉक हटा, पूरी सुरंग के आर-पार जाने का रास्ता साफ हो गया। इस बड़ी सफलता के बाद अब कश्मीर घाटी से लद्दाख के बीच हर मौसम में खुली रहने वाली कनेक्टिविटी का सपना अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। चलिए आपको विस्तार से बताते हैं क्या है जोजिला सुरंग का पूरा भूगोल, इतिहास और क्यों है ये हमारे लिए इतनी महत्वपूर्ण।

जोजिला सुरंग का भूगोल

भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो जोजिला सुरंग जम्मू-कश्मीर को लद्दाख से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-1 (NH-1) पर जोजिला दर्रे (Zojila Pass) के ठीक नीचे बनाई जा रही है। यह सुरंग जम्मू-कश्मीर में सोनमर्ग के पास खूबसूरत वादी बालटाल से शुरू होती है और लद्दाख के द्रास क्षेत्र में स्थित मीनमर्ग पर जाकर समाप्त होती है। इस मुख्य सुरंग की कुल लंबाई 13.15 किलोमीटर है। यह सीधे तौर पर कश्मीर घाटी को लद्दाख के सुदूर और ठंडे रेगिस्तानी इलाकों से हर मौसम के लिए जोड़ देगी।

क्यों बनाई जा रही है यह सुरंग?

इस सुरंग का निर्माण केवल यात्रा को सुगम बनाने के लिए नहीं बल्कि इस क्षेत्र की भौगोलिक मजबूरियों और आपातकालीन जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। इसके मुख्य कारण हैं:

1. सर्दियों के महीनों में जोजिला दर्रे पर भीषण बर्फबारी, बर्फीले तूफान और हिमस्खलन का प्रकोप रहता है। इस कारण यह पहाड़ी मार्ग साल में लगभग 6 से 7 महीने (160 से 180 दिनों तक) पूरी तरह बंद हो जाता है। इस दौरान लद्दाख का संपर्क पूरे भारत से कट जाता है।

2. सड़क मार्ग बंद होने के कारण लद्दाख जाने या वहां से आने के लिए हवाई यात्रा ही एकमात्र सहारा बचती है। भारी मांग के चलते सर्दियों में हवाई जहाज की टिकटों का किराया 40000 रुपये तक पहुंच जाता है, जो एक आम नागरिक के बजट से पूरी तरह बाहर है। सुरंग बनने के बाद लोगों को इस आर्थिक शोषण से मुक्ति मिलेगी।

3. वर्तमान में बालटाल से मीनमर्ग के बीच के खतरनाक और संकरे पहाड़ी दर्रे को पार करने में वाहनों को कई घंटों का समय लगता है, जिसमें भारी ट्रैफिक जाम भी शामिल है। सुरंग चालू होने के बाद यह दूरी महज 15 से 40 मिनट में तय की जा सकेगी।

4. मौजूदा जोजिला दर्रे का रास्ता दुनिया के सबसे खतरनाक मार्गों में गिना जाता है। खराब विजिबिलिटी और भूस्खलन के कारण यहां अक्सर वाहन दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। अत्याधुनिक सुरक्षा उपकरणों से लैस यह सुरंग यात्रियों को एक बेहद सुरक्षित और निर्बाध सफर देगी।

जोजिला सुरंग का इतिहास

इस सुरंग को बनाने की कहानी करीब एक दशक पुरानी है। इसके निर्माण कार्य में तेजी हाल के वर्षों में आई है। इस परियोजना को साल 2013 में मनमोहन सिंह सरकार के समय कैबिनेट से मंजूरी मिली थी। उस वक्त इसके लिए 6809 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। साल 2017 में पहली बार टेंडर जारी होने पर इसका काम आईएल एंड एफएस (IL&FS) कंपनी को दिया गया था, लेकिन वह कंपनी वित्तीय संकट के कारण दिवालिया हो गई जिससे प्रोजेक्ट अधर में लटक गया।

इसके बाद साल 2020 में दोबारा टेंडर मंगवाए गए। हैदराबाद की कंपनी मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (MEIL) ने सबसे कम 4509 करोड़ रुपये की बोली लगाकर इसका काम अपने हाथ में लिया। कंपनी ने 1 अक्टूबर 2020 से काम शुरू किया और 14 अक्टूबर 2020 को पहली ब्लास्टिंग की गई थी।

कितनी है जोजिला सुरंग की लागत?

मार्च 2025 में संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस परियोजना पर करीब 3934.42 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे और 64 फीसदी से अधिक काम पूरा हो चुका था। बताया जा रहा है कि अब इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह चालू करने का अंतिम लक्ष्य साल 2028 तय किया गया है।

क्यों खास है यह ‘स्मार्ट टनल’?

जोजिला सुरंग केवल एक कंक्रीट का ढांचा नहीं है बल्कि समुद्र तल से 11578 फीट की ऊंचाई पर बनाई जा रही यह दुनिया की सबसे लंबी सिंगल-ट्यूब, दो-तरफा सड़क सुरंग है। इसकी विशेषताएं इसे दुनिया भर में खास बनाती हैं। जैसे:

-यह घोड़े की नाल के आकार वाली यह सुरंग 9.5 मीटर चौड़ी और 7.57 मीटर ऊंची है, जिसमें दो लेन की बेहतरीन सड़क होगी। जानकारों के मुताबिक, हिमालय का भूविज्ञान बेहद नाजुक और परिवर्तनशील है इसलिए यहां पारंपरिक खुदाई काम नहीं आ सकती थी। इंजीनियरों ने इसके लिए नई तकनीक ‘न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड’ का उपयोग किया जो खुदाई के तुरंत बाद चट्टानों को शॉट्रीट और रॉक बोल्टिंग के जरिए मजबूत सहारा प्रदान करती है।

-इसे एक ‘स्मार्ट टनल’ के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसमें पूरी तरह से वर्टिकल और ट्रांसवर्स वेंटिलेशन सिस्टम (हवा के निकास की व्यवस्था), निर्बाध बिजली आपूर्ति (UPS), हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरे, वैरिएबल मैसेज साइन बोर्ड और एक विशेष टनल रेडियो सिस्टम लगाया गया है।

-किसी भी हादसे या गाड़ी खराब होने की स्थिति से निपटने के लिए सुरंग के भीतर हर 125 मीटर पर इमरजेंसी टेलीफोन और अग्निशमन सुविधाएं हैं। हर 250 मीटर पर पैदल यात्रियों के लिए और हर 750 मीटर पर वाहनों को मोड़ने या पार्क करने के लिए ‘क्रॉस-पैसेज’ और ‘ले-बाय’ (पार्किंग स्लॉट) बनाए गए हैं।

-यह मुख्य सुरंग असल में 30.89 किलोमीटर लंबे एक विशाल एक्सप्रेसवे कॉरिडोर का हिस्सा है। इसमें अप्रोच रोड, हिमस्खलन को रोकने वाली स्नो गैलरी, 3 बड़े पुल और नीलग्रार की जुड़वां सुरंगें भी शामिल हैं।

कारगिल युद्ध में महसूस हुई थी इस सुरंग को बनाने की जरूरत

जोजिला सुरंग का महत्व केवल आर्थिक या सामाजिक विकास तक सीमित नहीं है। यह भारत की संप्रभुता और सैन्य सुरक्षा के लिए रीढ़ की हड्डी के समान है। साल 1999 में जब पाकिस्तान के साथ कारगिल युद्ध छिड़ा था, तब पाकिस्तानी घुसपैठियों ने रणनीतिक चाल चलते हुए श्रीनगर-लेह राजमार्ग (NH-1) को निशाना बनाया था। वे जोजिला दर्रे के ऊपर की ऊंची चोटियों पर बैठे थे और भारतीय सेना की रसद और हथियारों की आपूर्ति को पूरी तरह काटने के लिए लगातार गोलीबारी कर रहे थे। उस समय भारतीय सेना को बेहद कठिन परिस्थितियों में सैनिकों और तोपों को आगे भेजना पड़ा था।

कारगिल युद्ध के इसी कड़वे अनुभव ने भारत के रक्षा योजनाकारों को यह सोचने पर मजबूर किया कि सियाचिन ग्लेशियर, द्रास और चीन से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तैनात भारतीय सैनिकों की सुरक्षा के लिए जोजिला पर एक ऑल वेदर यानी बारहमासी और सुरक्षित मार्ग का होना अनिवार्य है।

इस सुरंग का पूर्वी छोर द्रास के मीनमर्ग के पास खुलता है, जो कारगिल युद्ध स्मारक के बेहद नजदीक है। अब इस सुरंग के ब्रेकथ्रू के बाद, भविष्य में यदि चीन या पाकिस्तान की तरफ से कोई भी हिमाकत होती है, तो भारतीय सेना बिना किसी मौसमी रुकावट के भारी टैंक, तोपें, मिसाइलें और सैनिक पलक झपकते ही बॉर्डर पर तैनात कर सकेगी। यह सुरंग वास्तव में भारतीय सेना के लिए दुश्मन के खिलाफ एक अभेद्य और अजेय ढाल साबित होने वाली है।

 

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जय प्रकाश गुप्ता
जय प्रकाश गुप्ता
लेखक करीब एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। अभी स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहरी पकड़ है। [Read more]
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