यं हि नं व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।।
हिन्दी अर्थ-
हे पुरुषश्रेठ! जिस पुरुष को ये इन्द्रियजन्य विकार व्यथित नहीं कर पाते, जो सुख तथा दुःख की अवस्था में स्थिर रहता है, वही पुरुष अमृतत्व को प्राप्त कर सकता है।

















