भारत-अमेरिका संबंध और शीतयुद्धकालीन मानसिकता का संकट, मोदी विरोध में राष्ट्रीय संप्रभुता पर सवाल क्यों?
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भारत-अमेरिका संबंध और शीतयुद्धकालीन मानसिकता का संकट, मोदी विरोध में राष्ट्रीय संप्रभुता पर सवाल क्यों?

भारत-अमेरिका संबंधों के बीच स्वयं को प्रगतिशील बताने वाले एक वर्ग के अंतर्विरोधों का विशेष विश्लेषण। मोदी सरकार के विरोध में राष्ट्रीय हित और संप्रभुता को ताक पर रखने वाली शीतयुद्धकालीन मानसिकता की सभी बड़ी बातें यहाँ पढ़ें।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Jun 5, 2026, 11:42 pm IST
inभारत, विश्व, विश्लेषण, मत अभिमत
India US Relations Cold War Mindset PM Modi Foreign Policy

भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिलता है। स्वयं को उदारवादी और प्रगतिशील बताने वाला एक वर्ग अमेरिका के प्रति अपना दृष्टिकोण भारत के राष्ट्रीय हित के आधार पर नहीं, बल्कि वर्तमान मोदी सरकार के प्रति अपनी राजनीतिक विरोध भावना के आधार पर तय करता प्रतीत होता है।

जब अमेरिका भारत की आलोचना करता है, तब यही लोग उस आलोचना को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं। लेकिन जब अमेरिका भारत के साथ रणनीतिक, आर्थिक या तकनीकी सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो वही लोग अचानक “राष्ट्रीय संप्रभुता के समर्पण” का शोर मचाने लगते हैं।

स्वाभाविक प्रश्न यह है कि उनकी चिंता वास्तव में भारत के हित की है या केवल मोदी सरकार के विरोध की?

शीतयुद्ध की मानसिकता का बोझ

इस वर्ग का एक हिस्सा आज भी शीतयुद्ध के दौर की मानसिकता में जी रहा है। उस समय अमेरिका-विरोध को बौद्धिकता का प्रतीक माना जाता था। सोवियत संघ को विकासशील देशों का स्वाभाविक मित्र और अमेरिका को वैश्विक राजनीति का खलनायक बताया जाता था। लेकिन दुनिया बदल चुकी है। सोवियत संघ इतिहास बन चुका है। वैश्वीकरण ने विश्व अर्थव्यवस्था की संरचना बदल दी है। तकनीक, निवेश, नवाचार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं ने देशों को अभूतपूर्व रूप से जोड़ दिया है। दुर्भाग्य से कुछ लोग अब भी 1991 से पहले की दुनिया में मानसिक रूप से अटके हुए दिखाई देते हैं।

भारत-अमेरिका संबंध: परस्पर हितों पर आधारित

आज भारत और अमेरिका का संबंध किसी आश्रित और संरक्षक का नहीं, बल्कि साझेदारी का है। अमेरिका भारत को एक विशाल बाजार, तकनीकी शक्ति और एशिया में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक भागीदार के रूप में देखता है। वहीं भारत को निवेश, उन्नत तकनीक, शिक्षा, रक्षा सहयोग और वैश्विक बाजारों तक पहुंच का लाभ मिलता है।

सिलिकॉन वैली से लेकर चिकित्सा, शिक्षा, वित्त और उद्यमिता तक भारतीय मूल के लोगों की सफलता इस साझेदारी की प्रभावशीलता का प्रमाण है।

क्या विदेश जाने वाले भारतीय देश का नुकसान हैं?

कुछ आलोचक विदेश जाने वाले प्रतिभाशाली भारतीयों को “ब्रेन ड्रेन” बताते हैं। यह तर्क आज के युग की वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ करता है। विदेशों में रहने वाले भारतीय हर वर्ष अरबों डॉलर की धनराशि भारत भेजते हैं। वे भारतीय स्टार्टअप, शेयर बाजार, उद्योग और रियल एस्टेट में निवेश करते हैं। अनेक लोग विश्वस्तरीय शिक्षा और अनुभव प्राप्त कर वापस लौटते हैं और देश के विकास में योगदान देते हैं।

हाल ही में प्रकाशित रिपोर्टों में बताया गया कि अमेरिका के अरबों डॉलर मूल्य वाले स्टार्टअप्स के संस्थापकों में भारतीय मूल के लोगों की संख्या सबसे अधिक समूहों में शामिल है। यह भारत के लिए गर्व का विषय होना चाहिए, न कि आलोचना का।

दोहरे मानदंडों की राजनीति

जब डोनाल्ड ट्रंप ने व्यापारिक मतभेदों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था पर तीखी टिप्पणी की थी, तब विपक्षी वर्ग ने उसे मोदी सरकार के विरुद्ध प्रमाणपत्र की तरह प्रस्तुत किया। लेकिन जब बाद में अमेरिका ने भारत के साथ संबंध मजबूत करने के लिए उच्चस्तरीय कूटनीतिक पहल की, तो वही लोग सरकार पर अमेरिका के सामने झुकने का आरोप लगाने लगे। अर्थात् अमेरिका तब सही है जब वह भारत की आलोचना करे, लेकिन गलत है जब वह भारत के साथ सहयोग करे। यह दृष्टिकोण सिद्धांत नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा का परिचायक है।

आम भारतीय क्या चाहता है?

सबसे अधिक शोर मचाने वाले लोग हमेशा बहुसंख्यक जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते। अधिकांश भारतीय बेहतर रोजगार, आर्थिक विकास, उच्च शिक्षा, तकनीकी प्रगति और जीवन स्तर में सुधार चाहते हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय सहयोग इन उद्देश्यों को आगे बढ़ाता है, तो वे उसका समर्थन करते हैं। यही कारण है कि लाखों भारतीय विदेशों, विशेषकर अमेरिका, में शिक्षा और रोजगार के अवसर तलाशते हैं। लोग उन देशों की ओर नहीं भागते जिन्हें वे वास्तव में अपना शत्रु मानते हों।

यथार्थवादी विदेश नीति की आवश्यकता

भारत की विदेश नीति न तो अंध-अमेरिका विरोध पर आधारित होनी चाहिए और न ही अंध-अमेरिका समर्थन पर।

अमेरिका न तो भारत का मालिक है और न ही शत्रु। वह एक महत्वपूर्ण साझेदार है, जिसके साथ भारत कुछ मुद्दों पर सहमत होगा और कुछ पर असहमत।

एक परिपक्व राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेता है, न कि पुरानी वैचारिक कट्टरताओं के आधार पर।

निष्कर्ष

इक्कीसवीं सदी का भारत आत्मविश्वास, उद्यमिता, नवाचार और वैश्विक सहभागिता के आधार पर आगे बढ़ रहा है। अमेरिका सहित विश्वभर में भारतीयों की सफलता उसी कहानी का विस्तार है। लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, लेकिन ऐसी आलोचना जो केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार अपना स्वर बदलती रहे, वह राष्ट्रीय विमर्श को समृद्ध नहीं करती। शीतयुद्ध की दुनिया समाप्त हो चुकी है। समय की मांग है कि भारत का सार्वजनिक विमर्श भी उस मानसिकता से आगे बढ़े और बदलती वैश्विक वास्तविकताओं को स्वीकार करे।

Topics: PM Modi foreign policyNational Sovereignty India
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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