पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं है, बल्कि यह मनुष्य और प्रकृति के बीच उस गहरे संबंध को स्मरण करने का दिन है, जिसके बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है। आज जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, जैव विविधता का ह्रास, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन जैसी समस्याएँ पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़ी हैं, तब इतिहास के उन व्यक्तित्वों का स्मरण करना आवश्यक हो जाता है, जिन्होंने प्रकृति की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
भारत की ऐसी ही एक महान प्रकृति प्रेमी थीं अमृता देवी बिश्नोई, जिनका नाम पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्होंने केवल वृक्षों को बचाने का प्रयास नहीं किया, बल्कि यह सिद्ध कर दिया कि प्रकृति की रक्षा मानव जीवन से भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। उनका बलिदान आज भी पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में प्रेरणा का एक अद्वितीय उदाहरण है।
1730 का खेजड़ली आंदोलन: जब वृक्षों की रक्षा के लिए कटे 363 सिर
राजस्थान की मरुभूमि में स्थित खेजड़ली गाँव में सन् 1730 में घटित घटना विश्व पर्यावरण इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है। उस समय राजस्थान में महाराजा अभयसिंह का शासन था। जोधपुर में एक नए महल के निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता थी। राजा के आदेश पर सैनिकों और कर्मचारियों को आसपास के क्षेत्रों से वृक्ष काटने के लिए भेजा गया।
जब राजा के कर्मचारियों ने खेजड़ी के वृक्षों को काटना शुरू किया, तो गुरु जंभेश्वर की शिक्षाओं से प्रेरित और वृक्षों व जीवों को जीवन का अभिन्न अंग मानने वाली अमृता देवी ने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जीवित वृक्षों को काटना पाप है, वे किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं होने देंगी। किंतु सैनिक राजा का आदेश बताते हुए वृक्ष काटने पर अड़े रहे।
तब अमृता देवी ने वह ऐतिहासिक निर्णय लिया, जिसने उन्हें अमर बना दिया। उन्होंने खेजड़ी के एक वृक्ष को अपनी बाहों में जकड़ लिया और घोषणा की कि वृक्ष को काटने से पहले उन्हें काटना होगा। इसी संदर्भ में उनसे जुड़ा एक अत्यंत प्रसिद्ध वाक्य आज भी लोक-स्मृति में जीवित है:
“सर साटे रुंख रहे तो भी सस्तो जाण”
(अर्थात: यदि वृक्ष बचाने के लिए सिर भी कट जाए, तो यह सौदा सस्ता है।)
सैनिकों ने चेतावनी को अनसुना कर दिया और अमृता देवी का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन यह बलिदान यहीं समाप्त नहीं हुआ। उनकी तीनों पुत्रियाँ – आसू, रत्नी और भागू – भी वृक्षों से लिपट गईं और उन्होंने भी अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।
इस घटना की सूचना पूरे क्षेत्र में दावानल की तरह फैल गई और बड़ी संख्या में लोग खेजड़ली पहुँचने लगे। एक-एक व्यक्ति वृक्षों से चिपकता गया और निर्दयी सैनिक उन्हें काटते गए। अंततः 363 स्त्री-पुरुषों ने वृक्षों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यह विश्व इतिहास का एक बड़ा और संगठित वृक्ष-रक्षा आंदोलन था।
बलिदान का प्रभाव और आधुनिक विज्ञान से जुड़ाव
इस घटना का प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि अंततः महाराजा अभयसिंह को वृक्ष कटाई रुकवानी पड़ी। उन्होंने क्षेत्र में वृक्षों और वन्यजीवों की रक्षा के लिए विशेष आदेश जारी किए। यह इस बात का प्रमाण है कि जब समाज अपने मूल्यों के प्रति दृढ़ संकल्पित होता है तो सत्ता को भी उसकी आवाज सुननी पड़ती है।
आधुनिक पर्यावरण विज्ञान और खेजड़ी का महत्व
अमृता देवी का दृष्टिकोण आधुनिक पर्यावरण विज्ञान की मूल अवधारणाओं से पूरी तरह मेल खाता है। आज वैज्ञानिक भी यही बताते हैं कि वृक्ष क्यों आवश्यक हैं:
- जलवायु संतुलन: वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ग्लोबल वार्मिंग को रोकते हैं।
- भूजल और मृदा संरक्षण: ये मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और जलस्तर बनाए रखते हैं।
- मरुस्थलीय वरदान (खेजड़ी): शुष्क क्षेत्रों में खेजड़ी का वृक्ष अत्यंत उपयोगी है। यह कम पानी में जीवित रहता है, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है और पशुओं को चारा प्रदान करता है।
जनभागीदारी: पर्यावरण संरक्षण का सबसे मजबूत आधार
आज जब पर्यावरण दिवस मनाया जाता है तो अक्सर पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह एक सकारात्मक पहल है, लेकिन अमृता देवी का संदेश वृक्ष लगाने से आगे बढ़कर वृक्ष बचाने का संदेश देता है। अक्सर लाखों पौधे लगा दिए जाते हैं किंतु उनकी देखभाल नहीं होती, वहीं पुराने और विकसित वृक्ष विकास परियोजनाओं के नाम पर काट दिए जाते हैं। एक परिपक्व वृक्ष को विकसित होने में दशकों लगते हैं, जबकि उसे काटने में कुछ मिनट।
खेजड़ली का इतिहास सिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों या विशेषज्ञों का कार्य नहीं है। उस समय न कोई बड़ा संगठन था, न मीडिया और न ही राजनीतिक समर्थन। फिर भी साधारण नागरिकों ने असाधारण साहस का परिचय दिया। पर्यावरणीय चेतना का सबसे मजबूत आधार जनभागीदारी ही होती है।
हमारी साझा विरासत और ‘अमृता देवी बिश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार’
भारतीय परंपरा में पृथ्वी को माता, नदियों को देवी, वृक्षों को पूजनीय और पशु-पक्षियों को सह-अस्तित्व का साथी माना गया है। अमृता देवी ने सिद्ध किया कि प्रकृति के प्रति श्रद्धा केवल पूजा-पाठ का विषय नहीं, बल्कि जीवन व्यवहार का हिस्सा है।
राष्ट्र उनके योगदान का आदरपूर्वक स्मरण करता है। इसी कड़ी में भारत सरकार द्वारा वन्यजीवों और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों को “अमृता देवी बिश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार” प्रदान किया जाता है। किंतु उनका सच्चा सम्मान तब होगा जब हम उनके आदर्शों को अपने दैनिक जीवन में अपनाएँगे।
प्रकृति की रक्षा के लिए हमारे संकल्प:
- वृक्षों की रक्षा और नए पौधों की उचित देखभाल।
- जल संरक्षण और ऊर्जा की बचत।
- सिंगल यूज प्लास्टिक का कम से कम उपयोग।
- जैव विविधता का संरक्षण और संयमित जीवनशैली।
अमृता देवी ने लगभग तीन सौ वर्ष पहले जो संदेश दिया था, वह आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। पर्यावरण दिवस पर अमृता देवी का स्मरण केवल एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का पुनः संकल्प है। पृथ्वी केवल हमारी संपत्ति नहीं, बल्कि हमारी साझा विरासत है, जिसकी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का नैतिक कर्तव्य है।

















