प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन अंसार गजवत-उल-हिंद (एजीएच) से जुड़े वर्ष 2018 के चर्चित आतंकी षड्यंत्र मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत ने तीन दोषियों को कठोर कारावास की सजा सुनाई है। पंजाब के मोहाली स्थित एनआईए की विशेष अदालत ने जाहिद गुलजार, यासिर रफीक भट और मोहम्मद इदरीस शाह को विभिन्न धाराओं के तहत दोषी पाते हुए पांच, सात और दस वर्ष तक की कठोर कारावास (आरआई) की सजा सुनाई। अदालत का यह फैसला देश की सुरक्षा के खिलाफ रची गई एक गंभीर साजिश के मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एनआईए द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, अदालत ने इससे पहले 1 जून को तीनों आरोपियों को दोषी करार दिया था, जबकि 4 जून को सजा का ऐलान किया गया। इस मामले में एक अन्य आरोपी सुहैल अहमद भट को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण बरी कर दिया गया।
3 accused have been convicted & sentenced by a NIA special court to 10 years of RI in a 2018 terror conspiracy case linked with the banned AGH terrorist outfit, involving the seizure of weapons & explosive materials from an institute hostel room in Jalandhar, Punjab. pic.twitter.com/xIVkkBXPi9
— NIA India (@NIA_India) June 5, 2026
छात्रावास के कमरे से मिला था हथियारों का जखीरा
उल्लेखनीय है कि यह मामला अक्टूबर 2018 में उस समय सामने आया था जब पंजाब पुलिस ने जालंधर के शाहपुर स्थित सीटी इंस्टीट्यूट के छात्रावास में तलाशी अभियान चलाया था। तलाशी के दौरान आरोपियों के कब्जे वाले एक कमरे से हथियार, गोला-बारूद और विस्फोटक सामग्री बरामद की गई थी। बरामदगी ने सुरक्षा एजेंसियों को चौंका दिया था, क्योंकि शिक्षण संस्थान के छात्रावास में इतनी बड़ी मात्रा में घातक सामग्री का मिलना किसी बड़े आतंकी नेटवर्क की ओर संकेत कर रहा था। पुलिस और बाद में एनआईए की जांच में सामने आया कि कमरे से एके-56 राइफल, मैगजीन, जिंदा कारतूस तथा विस्फोटक सामग्री बरामद हुई थी। प्रारंभिक जांच में ही यह स्पष्ट हो गया था कि मामला हथियार रखने से भी अधिक गंभीर है, इसके पीछे संगठित आतंकी गतिविधियों की योजना छिपी हुई है।
पंजाब पुलिस से एनआईए तक पहुंचा मामला
घटना के बाद पंजाब पुलिस ने अक्टूबर 2018 में मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। चूंकि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवादी संगठन से जुड़ा था, इसलिए भारत सरकार के निर्देश पर नवंबर 2018 में इसे राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया गया। इसके बाद एनआईए ने विस्तृत जांच करते हुए मामले की हर कड़ी को खंगाला। एनआईए अधिकारियों ने विभिन्न राज्यों में छापेमारी की, डिजिटल उपकरणों की जांच की और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड जुटाए। जांच एजेंसी ने कई वर्षों तक लगातार साक्ष्य एकत्र कर अदालत में मजबूत अभियोजन प्रस्तुत किया।
अंसार गजवत-उल-हिंद की गतिविधियों को बढ़ावा देने की साजिश
एनआईए की जांच में खुलासा हुआ कि आरोपी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन अंसार गजवत-उल-हिंद की विचारधारा और गतिविधियों से प्रभावित थे तथा संगठन के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहे थे। जांच में यह भी सामने आया कि उन्होंने भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने और देश में अस्थिरता फैलाने के उद्देश्य से आपराधिक षड्यंत्र रचा था। एजेंसी के अनुसार, आरोपियों ने हथियारों और विस्फोटक सामग्री को एकत्र कर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की तैयारी की थी। जांच के दौरान उनके बीच हुए संपर्क, डिजिटल संचार और अन्य गतिविधियों के कई प्रमाण सामने आए, जिन्होंने अदालत के समक्ष अभियोजन पक्ष के मामले को मजबूत किया।
व्यापक साक्ष्यों के आधार पर हुई दोषसिद्धि
एनआईए ने इस मामले में मौखिक, दस्तावेजी, इलेक्ट्रॉनिक और फोरेंसिक साक्ष्यों का विस्तृत विश्लेषण किया। जांच एजेंसी ने आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत जुटाने के लिए तकनीकी और वैज्ञानिक जांच पद्धतियों का भी सहारा लिया। एजेंसी के बयान के अनुसार, मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 64 गवाहों के बयान दर्ज कराए। इन गवाहों में जांच अधिकारियों, फोरेंसिक विशेषज्ञों और अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों को शामिल किया गया। अदालत ने सभी साक्ष्यों और गवाहियों का परीक्षण करने के बाद तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया। एनआईए ने कहा कि यह फैसला पंजाब पुलिस और एनआईए के बीच प्रभावी समन्वय तथा पेशेवर जांच का परिणाम है। एजेंसी ने इसे आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
विभिन्न कानूनों के तहत सुनाई गई सजा
विशेष अदालत ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम [यूएपीए], शस्त्र अधिनियम और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी पाया। अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए पांच वर्ष से लेकर दस वर्ष तक की कठोर कारावास की सजा सुनाई। कानूनी विशेषज्ञ एडवोकेट अशुतोष कुमार झा एवं धनन्जय सिंह का संयुक्त रूप से मानना है कि “यूएपीए और अन्य विशेष कानूनों के तहत दोषसिद्धि होना इस बात का संकेत है कि अदालत को अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त और विश्वसनीय लगे। आतंकवाद से जुड़े मामलों में दोषसिद्धि हासिल करना अक्सर चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि इसमें तकनीकी और फोरेंसिक साक्ष्यों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।”
सुहैल अहमद भट को मिली राहत
मामले में आरोपी बनाए गए सुहैल अहमद भट को अदालत ने बरी कर दिया। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि उसके खिलाफ आरोप साबित नहीं हो सके। भारतीय न्याय प्रणाली के अनुसार किसी भी आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जाता जब तक उसके खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित न हो जाएं। इसी सिद्धांत के तहत अदालत ने उसे राहत प्रदान की।
आतंकवाद के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है
इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ. राजेश शर्मा का कहना है कि “शैक्षणिक संस्थानों और युवाओं को कट्टरपंथी विचारधाराओं से बचाने के लिए जागरूकता बढ़ाने की भी आवश्यकता है। यह मामला इस बात की भी याद दिलाता है कि आतंकवादी संगठन सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों के जरिए युवाओं को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, जिसके प्रति सतर्क रहना जरूरी है।” इसके साथ ही मनोवैज्ञानिक डॉ. शर्मा ने कहा, “इस बात की भी गहराई से पड़ताल करना चाहिए कि आखिर भारत के मुसलमान युवाओं को आतंकवादी गतिविधियों में आसान शिकार कैसे बना लिया जाता है। यदि कहीं उनकी शिक्षा में या मदरसा मजहबी शिक्षा में अथवा परिवेश में कोई कमी है तो उसे चिन्हित करके ऐसे सभी बिन्दुओं को दूर करने का प्रयास किया जाना आज की बड़ी जरूरत है, जिस पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को गहराई से ध्यान देना चाहिए। अन्यथा यह क्रम कभी रुकनेवाला नहीं है!”
















