
कोलकाता(हि.स.)। विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर पश्चिम बंगाल के लिए वायु प्रदूषण को लेकर एक गंभीर चेतावनी सामने आई है। गुरुवार दोपहर जारी रीयल-टाइम आंकड़ों के अनुसार देश के 10 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से आठ पश्चिम बंगाल के हैं। यह स्थिति राज्य में पर्यावरणीय चुनौतियों और वायु गुणवत्ता को लेकर बढ़ती चिंताओं को उजागर करती है।
स्विस वायु गुणवत्ता निगरानी संस्था आईक्यूएयर की रीयल-टाइम “मोस्ट पॉल्यूटेड सिटी रैंकिंग” के अनुसार पश्चिम बंगाल का कूचबिहार 176 वायु गुणवत्ता सूचकांक के साथ देश का सर्वाधिक प्रदूषित शहर दर्ज किया गया। सूची में दूसरे स्थान पर इस्लामपुर (172 वायु गुणवत्ता सूचकांक), चौथे स्थान पर उला (167), पांचवें स्थान पर रायगंज (166), छठे स्थान पर रिषड़ा(165), सातवें स्थान पर टिटागढ़ (165), आठवें स्थान पर मसिला (163), नौवें स्थान पर कांदी (159) और दसवें स्थान पर कटवा (158) शामिल हैं। सूची में तीसरे स्थान पर बिहार का किशनगंज (172) रहा।
वायु गुणवत्ता सूचकांक के मानकों के अनुसार 151 से 200 के बीच का स्तर “अस्वास्थ्यकर” श्रेणी में आता है। इस स्तर की हवा बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं तथा दमा और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए विशेष रूप से हानिकारक मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक ऐसी हवा के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। चिंता की बात यह है कि देश के सबसे प्रदूषित 10 शहरों में पश्चिम बंगाल के आठ शहरों का शामिल होना राज्य में पर्यावरणीय चुनौतियों की गंभीरता को दर्शाता है। उत्तर बंगाल से लेकर दक्षिण बंगाल तक कई शहरों में वायु गुणवत्ता का स्तर खराब श्रेणी में पहुंच गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण, वाहनों की संख्या में लगातार वृद्धि, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और पर्यावरणीय नियमों के प्रभावी अनुपालन की कमी के कारण वायु प्रदूषण की समस्या गंभीर होती जा रही है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। विश्व पर्यावरण दिवस पर जहां सरकारें और विभिन्न सामाजिक संगठन पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं पश्चिम बंगाल के शहरों की यह स्थिति कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल जागरूकता अभियान चलाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए प्रशासन, स्थानीय निकायों, उद्योगों और आम नागरिकों को मिलकर ठोस तथा दीर्घकालिक कदम उठाने होंगे। पर्यावरण दिवस से ठीक पहले सामने आए ये आंकड़े इस बात की याद दिलाते हैं कि स्वच्छ हवा केवल पर्यावरण का ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी सबसे बड़ा मुद्दा बन चुकी है। पश्चिम बंगाल के शहरों की यह स्थिति सरकार, प्रशासन और समाज सभी के लिए गंभीर चिंता का विषय है।