आइसबर्ग, यानी समुद्र में तैर रहे विशाल हिमखंड के उस छोटे से हिस्से को कहते हैं जो जल सतह से दिखाई देता है। असल में समुद्र के अंदर इसका आकार सैकड़ों मीटरों व वजन हजारों-लाखों टन में हो सकता है। 3-4 जून, 1989 को चीन के तियानमेन चौक में हुए नरसंहार को वामपंथियों के रक्तचरित्र का आइसबर्ग कहा जाना अनुचित नहीं होगा, क्योंकि तियानमेन चौक में मारे गए हजारों युवा तो केवल एक उदाहरण मात्र हैं, जबकि वामपंथ ने दुनिया में इतने नरमुंड गिराए हैं कि उन्हें एकत्रित कर एक और चीन की महान दीवार का निर्माण किया जा सकता है।
तियानमेन चौक की घटना के दौरान न केवल हजारों निर्दोष नागरिकों, विशेषकर छात्रों और श्रमिकों, का निर्मम दमन किया गया, बल्कि करोड़ों चीनी नागरिकों के मौलिक संवैधानिक अधिकारों को भी रौंद दिया गया।
तियानमेन चौक आंदोलन की पृष्ठभूमि
अप्रैल 1989 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सुधारवादी और जनप्रिय नेता हु याओबांग की रहस्यमयी मृत्यु ने देशभर के युवाओं, विशेषकर विश्वविद्यालयों के छात्रों, को गहरा आघात पहुँचाया। उनकी मृत्यु के विरोधस्वरूप और लोकतांत्रिक सुधारों की मांग को लेकर हजारों छात्रों ने बीजिंग के तियानमेन चौक पर धरना शुरू कर दिया।
उनकी मांगें थीं — पारदर्शी सरकार, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और मौलिक लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली। यह शांतिपूर्ण विरोध तीव्र होता गया और जैसे-जैसे इसमें आम नागरिक, श्रमिक और बुद्धिजीवी शामिल होने लगे, सरकार ने इसे राज्य-विरोधी गतिविधि करार दिया।
अंततः 3-4 जून 1989 की रात, चीन की जनमुक्ति सेना ने बख्तरबंद टैंकों और हथियारों से छात्रों पर हमला किया। हजारों की संख्या में निर्दोष लोगों की हत्या कर दी गई।
3-4 जून 1989 की भयावह रात
3 जून 1989 की रात बीजिंग की सड़कों पर वह भयावह मंजर शुरू हुआ, जिसने दुनिया को स्तब्ध कर दिया। चीनी सेना ने राजधानी में प्रवेश कर गोलीबारी शुरू कर दी, जिससे प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार 35-36 लोग मारे गए। लेकिन यह तो केवल शुरुआत थी।
4 जून की सुबह करीब 4 बजे, जब तियानमेन चौक पर हजारों की संख्या में निहत्थे छात्र, नागरिक, बच्चे और बुज़ुर्ग शांतिपूर्वक लोकतंत्र और पारदर्शिता की मांग को लेकर एकत्र थे, तब चीनी कम्युनिस्ट सरकार ने अपने सबसे क्रूर रूप का प्रदर्शन किया।
सरकार ने न सिर्फ टैंक और हथियारबंद जवानों को तियानमेन चौक पर भेजा, बल्कि लड़ाकू विमानों तक की तैनाती की गई। बिना किसी चेतावनी के गोलियाँ बरसाई गईं। निर्दोष लोगों को कुचला गया, दौड़ते बच्चों को निशाना बनाया गया और चौक को रक्तरंजित कर दिया गया।
यह कार्रवाई सिर्फ एक नरसंहार नहीं थी — यह लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की भावना पर एक संगठित, राज्य-प्रायोजित प्रहार था।
बीजिंग की सड़कों पर बहता रक्त
4 जून 1989 को बीजिंग की सड़कों पर मानव रक्त की नदियाँ बह रही थीं। यह कोई युद्ध का मैदान नहीं था, बल्कि एक शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रदर्शन के खिलाफ राज्य द्वारा चलाया गया सुनियोजित नरसंहार था।
चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने छात्रों और नागरिकों की शांतिपूर्ण मांगों का उत्तर टैंकों और गोलियों से दिया। रात के अंधेरे में बीजिंग की सड़कों पर टैंक गर्जना करने लगे और कुछ ही घंटों में लगभग 10,000 निर्दोष लोगों की जानें चली गईं — जिनमें छात्र, युवा, महिलाएँ, बुजुर्ग और राह चलते नागरिक तक शामिल थे।
सोवियत संघ: रेड टेरर और चेका का आतंक
कम्युनिस्ट शासन द्वारा अपने ही नागरिकों के संहार का पहला और सबसे बड़ा प्रयोग सोवियत संघ में व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में हुआ। 1918 में स्वयं लेनिन ने अपने एक टेलीग्राम में ‘रेड टेरर’ की आधिकारिक घोषणा की।
इस आतंक को धरातल पर उतारने का दायित्व ‘चेका’ (बोल्शेविक गुप्त पुलिस) को सौंपा गया, जिसे गिरफ्तारी, पूछताछ, मुकदमा और मृत्युदंड देने के असीमित और असाधारण अधिकार प्राप्त थे।
इसे इस बात से समझा जा सकता है कि लेनिन के सत्ता में आने के दो महीनों के भीतर ही चेका ने लगभग 15 हजार लोगों की हत्या की। ‘रेड टेरर’ के दौरान कम्युनिस्ट सत्ता ने बड़ी क्रूरता का परिचय दिया, जहाँ किसी भी सत्ता-विरोधी गतिविधि के प्रतिशोध में सैकड़ों निर्दोष नागरिकों को सरेआम गोलियों से भून दिया जाता था।
चेका के तहखानों में दी जाने वाली यातनाएँ मानवीय क्रूरता की सभी सीमाएँ पार कर गई थीं। खार्कोव चेका में सएंको नामक चेका कमांडर बंदियों की खोपड़ी की खाल नोचने और हाथों की खाल दस्ताने की तरह छीलने के लिए कुख्यात था।
स्टालिन युग का लाल आतंक और होलोडोमोर
वर्ष 1930 के दशक में जोसेफ स्टालिन ने इस दमन को चरम पर पहुँचा दिया। 1936 से 1938 के मध्य लाखों लोगों को ‘जनता का शत्रु’ घोषित कर मार दिया गया या ‘गुलाग’ (जबरन श्रम शिविरों) में अमानवीय परिस्थितियों में मरने के लिए भेज दिया गया।
गुलाग में भुखमरी, बीमारी और हाड़ कंपा देने वाली ठंड से लाखों कैदियों ने तड़प-तड़प कर जान दे दी।
इसके अलावा स्टालिन की क्रूर नीतियों का एक और भयावह उदाहरण यूक्रेन का ‘होलोडोमोर’ अर्थात मानव-निर्मित अकाल था। कम्युनिस्ट व्यवस्था और कृषि के जबरन सामूहिकीकरण का विरोध कर रहे स्वतंत्र यूक्रेनी किसानों और उनके राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के लिए सोवियत सरकार ने भुखमरी को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।
सरकार द्वारा किसानों का सारा अनाज और खाद्य सामग्री जबरन जब्त कर ली गई। अगस्त 1932 में लागू किए गए ‘लॉ ऑफ फाइव व्हीट इयर्स’ नामक क्रूर कानून के तहत खेतों से गिरे हुए अनाज के कुछ दाने उठाने पर भी लोगों को मृत्युदंड या 10 वर्ष की जेल की सजा दी जाने लगी।
लोगों को अकाल-ग्रस्त क्षेत्रों से बाहर भागने से रोकने के लिए यात्रा पर कठोर प्रतिबंध लगा दिए गए। इस कृत्रिम अकाल के कारण लगभग 70 लाख से 1 करोड़ लोगों ने तड़प-तड़प कर अपनी जान दे दी।
चीन में माओ का दमनचक्र
चीन में माओ जेदोंग द्वारा स्थापित कम्युनिस्ट शासन ने भी अपनी जनता पर भीषण अत्याचार किए। सत्ता में आते ही माओ ने ‘प्रतिक्रांतिकारियों के दमन’ के नाम पर लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ के बाद माओ ने अपनी सत्ता और वैचारिक पकड़ को मजबूत करने के लिए 1966 में ‘सांस्कृतिक क्रांति’ (कल्चरल रिवोल्यूशन) का आह्वान किया। इसका घोषित उद्देश्य चीनी समाज से पारंपरिक और ‘प्रतिक्रांतिकारी’ तत्वों को पूरी तरह जड़ से उखाड़ फेंकना था।
इस एक दशक लंबे वैचारिक उन्माद और राज्य-प्रायोजित अराजकता के परिणामस्वरूप चीन में करोड़ों लोगों की हत्या हुई।
पोल पॉट के ‘किलिंग फील्ड्स’
कंबोडिया में पोल पॉट और उसके संगठन ‘खमेर रूज’ का 1975 से 1979 तक का शासन कम्युनिस्ट वैचारिक कट्टरता का सबसे वीभत्स रूप था।
खमेर रूज ने सत्ता में आते ही पूरे कंबोडिया के शहरों को पूरी तरह खाली करा लिया और शहरी आबादी को बंदूक की नोक पर गाँवों में ‘युद्ध के गुलामों’ की तरह कृषि और नहरें खोदने के कठोर श्रम में झोंक दिया।
खमेर रूज ने ‘बुर्जुआ’ और पुराने समाज के हर निशान को मिटाने के लिए चुन-चुन कर बुद्धिजीवियों, डॉक्टरों, शिक्षकों और यहाँ तक कि चश्मा पहनने वालों की भी हत्या कर दी।
परिवारों को तोड़ दिया गया और धर्म व आस्था को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। बौद्ध भिक्षुओं को या तो मार डाला गया या उनसे जबरन साधारण मजदूरों की तरह श्रम करवाया गया।
जो लोग जरा सा भी विरोध करते, उन्हें तुओल स्लेंग जैसे गुप्त यातना केंद्रों में भयानक यातनाएँ देकर मार डाला जाता था। इन चार वर्षों में कंबोडिया की लगभग 20 लाख आबादी भुखमरी, बीमारी और सामूहिक हत्याओं की भेंट चढ़ गई।
बंगाल का मरीचझांपी नरसंहार
कम्युनिस्ट सत्ताओं का यह हिंसक और जनविरोधी चरित्र भारत में भी देखने को मिलता है। इसका एक क्रूर उदाहरण 1979 में पश्चिम बंगाल के मरीचझांपी जनसंहार के रूप में सामने आया।
वर्ष 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से आए हजारों ‘नामशूद्र’ शरणार्थियों को भारत सरकार ने दंडकारण्य (छत्तीसगढ़-ओडिशा-आंध्र प्रदेश-तेलंगाना का संयुक्त सीमावर्ती क्षेत्र) में बसाने की योजना बनाई।
किन्तु बंगाल में गंगा के डेल्टा में रहने वाले लोगों के लिए यह अर्ध-शुष्क क्षेत्र आवास के योग्य नहीं था। इस दौरान तब विपक्ष में रही सीपीआई (एम) ने इन नामशूद्रों को दंडकारण्य की बजाय बंगाल में बसाने हेतु जोरदार अभियान चलाया।
1977 में बंगाल में सीपीआई (एम) की सत्ता आते ही ये नामशूद्र समुदाय बंगाल के मरीचझांपी द्वीप पर अपना आत्मनिर्भर जीवन बसाने लगा। लेकिन बंगाल जनसंख्या-संसाधन की दृष्टि से संतृप्त था, और यही कारण था कि भारत सरकार शरणार्थियों को दंडकारण्य में बसाना चाह रही थी।
सरकार में आते ही सीपीआई (एम) पलट गई। कम्युनिस्ट सरकार ने वन संरक्षण का बहाना बनाकर शरणार्थियों को मरीचझांपी द्वीप से बलपूर्वक बेदखल करने का क्रूर आदेश दिया।
26 जनवरी 1979 को सरकार ने पुलिस स्टीमरों से द्वीप की पूरी तरह आर्थिक नाकेबंदी कर दी। शरणार्थियों को भोजन और पीने का पानी मिलने से रोक दिया गया और उनकी नौकाएँ डुबो दी गईं।
जब भूख और प्यास से भी शरणार्थी नहीं हटे, तो 14 से 16 मई 1979 के बीच सरकार ने पुलिस और गुंडों के माध्यम से द्वीप पर वीभत्स हमला किया। महिलाओं के साथ बलात्कार किए गए और निहत्थे नागरिकों पर पुलिस द्वारा अंधाधुंध गोलियाँ बरसाई गईं।
पीने के पानी के स्रोतों में जहर तक मिला दिया गया। विभिन्न अनुमानों के अनुसार, इस सरकारी नाकेबंदी और फायरिंग में लगभग 4,128 परिवारों (करीब 17 हजार लोगों) की बीमारी, भुखमरी और पुलिस की गोलियों से तड़प-तड़प कर मृत्यु हो गई या वे लापता हो गए।
सबूत मिटाने के लिए मारे गए लोगों के शवों को गुप्त रूप से सीधे नदी में फेंक दिया गया।











