पश्चिम बंगाल में 2011 से 2026 तक लगातार तीन बार बड़े बहुमत के साथ सरकार बनाने वाली तृणमूल कांग्रेस पार्टी खात्मे की ओर अग्रसर है। ममता बनर्जी के लिए अपनी पार्टी के सभी 80 विधायकों को एकजुट रखना मुश्किल होता जा रहा है। चुनाव परिणामों की घोषणा होने के बाद लगातार तीसरी बार ऐसा हो रहा है कि ममता बनर्जी के बुलाने पर उनकी पार्टी के विधायक ही उनकी बैठक में शामिल नहीं हो रहे हैं। जब तक ममता बनर्जी की सत्ता थी, तब तक यही विधायकगण उनके इशारों पर उनके फरमान पूरे करते थे।
बैठकों में विधायकों की घटती उपस्थिति बनी चिंता का विषय
मगर ममता बनर्जी के हाथों से सत्ता की बागडोर जाते ही उनकी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जीते 80 विधायकों की संख्या बैठक दर बैठक कमतर होती जा रही है। चुनावों में बुरी हार के बाद ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई 6 मई की पहली बैठक में कुल 80 में से 70 विधायक ही पहुंचे और 10 विधायक अनुपस्थित रहे थे।
यह बैठक काफी महत्वपूर्ण थी क्योंकि ममता बनर्जी की भवानीपुर में बुरी हार के बाद इस बैठक में नेता प्रतिपक्ष और अन्य महत्वपूर्ण पदों के लिए पार्टी में चर्चा होनी थी। मगर ऐसी महत्वपूर्ण बैठक से भी पार्टी विधायकों का दूरी बनाना यह दर्शाता है कि पार्टी में अब टूट केवल समय की बात रह गई है। इसके साथ ही यह भी तथ्य परिलक्षित होता है कि विधायकों को अब ममता बनर्जी की लोकप्रियता पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है और वे अपनी विधायकी की भी परवाह नहीं कर रहे हैं।
दूसरी और तीसरी बैठक में और बढ़ी गैरहाजिरी
6 मई के बाद ममता बनर्जी ने 19 मई को दूसरी बैठक बुलाई, जिससे आगे की रणनीति तय की जा सके। इस दूसरे महत्वपूर्ण बैठक में 80 विधायकों में से 35 विधायक नदारद थे। पहली बैठक में 10 और दूसरी बैठक में 35 विधायकों का गायब होना बड़ा संदेश देता है।
इसके बाद ममता बनर्जी ने 31 मई को विधायकों की एक और बैठक बुलाई, लेकिन इस बैठक में पार्टी के केवल एक चौथाई यानी 20 विधायकों ने ही भाग लिया।
पार्टी में गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर असंतोष
ममता बनर्जी को उम्मीद थी कि हार के बाद उनके सभी विधायक उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे, लेकिन स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। दावों के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस पार्टी में फूट पड़ चुकी है और अब धीरे-धीरे नेता और विधायकगण ममता बनर्जी से दूरी बनाना शुरू कर चुके हैं।
ममता बनर्जी द्वारा आहूत बैठकों में विधायकों के न पहुंचने की एक बड़ी वजह पार्टी के अंदर मौजूद गुटबाजी भी है। पार्टी में हमेशा ममता और अभिषेक बनर्जी के करीबियों को मुख्य पदों पर नामित कर दिया जाता है। इस बार विधायकों के गुस्से का एक बड़ा कारण नेता प्रतिपक्ष के चयन में उनकी नजरअंदाजी भी है।
नेता प्रतिपक्ष चयन विवाद और समर्थन पत्र का मामला
2026 के राज्य चुनाव परिणामों से पूर्व पार्टी में ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का वीटो होता था और उनकी बात सभी को मानने की मजबूरी होती थी। लेकिन इस चुनाव में पार्टी की बुरी हार के बाद विधायकों को अपनी बात रखने का मौका मिल गया है।
यह प्रक्रिया 6 मई को पार्टी की पहली बैठक से शुरू हुई, जब विधानसभा सचिवालय को एक चिट्ठी भेजकर शोभन देव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष और फिरहाद हकीम को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) नियुक्त कर दिया गया था।
विधानसभा अध्यक्ष ने विधायकों के समर्थन वाला आधिकारिक पत्र मांगा तो 13 मई को सांसद और तृणमूल कांग्रेस महासचिव अभिषेक बनर्जी ने स्वयं के हस्ताक्षर वाली एक चिट्ठी भेजी। लेकिन इसके बाद फिर से विधायकों की सहमति वाली चिट्ठी मांगी गई।
फर्जी हस्ताक्षर विवाद और सीआईडी जांच
इसी समर्थन को हासिल करने के लिए 19 मई को जो बैठक हुई, उसमें 70 विधायकों के हस्ताक्षर वाली एक चिट्ठी तैयार की गई, जबकि इस बैठक में केवल 45 विधायक पहुंचे थे। इस बैठक में 35 विधायक नहीं आए थे।
विधायकों ने आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी ने उनके नाम पर जाली हस्ताक्षर करके पत्र भेजे थे। विधानसभा अध्यक्ष के निर्देश पर अब इस मामले में एक एफआईआर दर्ज की गई है, जिसकी जांच सीआईडी को सौंपी गई है।
सीआईडी ने अभिषेक बनर्जी को जांच में शामिल होने तथा विधायकों के समर्थन वाले पत्र की मूल प्रति प्रस्तुत करने को कहा है। इस मामले की जांच के लिए सीआईडी की टीम आज ही अभिषेक बनर्जी के घर भी पहुंच गई है। पार्टी विधायकों में ममता और अभिषेक बनर्जी की इसी मनमानी को लेकर गुस्सा है।
नेताओं के इस्तीफे और बढ़ती राजनीतिक दूरी
दूसरी ओर ममता बनर्जी कह रही हैं कि उनके नेताओं को भाजपा डरा रही है। ममता बनर्जी अभी तक पार्टी को अपने हिसाब से चला रही थीं। अब उनके लिए मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।
24 मई को बारासात जिले की अध्यक्ष और लोकसभा सांसद डॉ. काकोली घोष दस्तीदार ने पार्टी के अंदर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
26 मई को पार्टी के राज्यसभा सदस्य सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी के खिलाफ बयान देते हुए कहा कि बंगाल की जनता ने अराजकता का अंत कर दिया है।
इसके बाद 27 मई को सांसद डॉ. काकोली घोष दस्तीदार पार्टी के छह विधायकों के साथ मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के सरकारी कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंच गई थीं। इसे इन नेताओं की भाजपा के साथ बढ़ती नजदीकी के रूप में देखा गया।
विधायकों की शिकायत और निष्कासन की कार्रवाई
27 मई को ही पार्टी के दो विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा ने विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस से एक बंद कमरे में मुलाकात कर फर्जी हस्ताक्षर वाले समर्थन पत्र की शिकायत की थी।
इसके बाद ममता बनर्जी ने इन दोनों विधायकों को पार्टी से निकाल दिया। 28 मई को तृणमूल कांग्रेस नेता और पूर्व राज्यसभा सदस्य शांतनु सेन ने भी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया।
आम आदमी पार्टी और शिवसेना जैसी स्थिति की आशंका
तृणमूल कांग्रेस पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों को आम आदमी पार्टी के हश्र का आभास है। अरविंद केजरीवाल ने भी ममता बनर्जी के तरीके से ही अपनी पार्टी का संचालन किया था और केजरीवाल की मनमानी से विचलित होकर पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों ने भाजपा की सदस्यता हासिल कर ली थी।
उद्धव ठाकरे की मनमानी से परेशान होकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में पार्टी के विधायकों और सांसदों ने उद्धव ठाकरे को ही पार्टी से अलग कर दिया और उन्हें शिवसेना (यूबीटी) बनानी पड़ी।
आने वाले दिनों में शिवसेना और आम आदमी पार्टी जैसी स्थिति में तृणमूल कांग्रेस भी आती दिख रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती असंतुष्टि, विधायकों की बैठकों से दूरी, नेतृत्व को लेकर नाराजगी और फर्जी हस्ताक्षर विवाद जैसे घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन चुका है।














