लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर : सुशासन की प्रेरणा और नारी शक्ति की अमर ज्योति
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लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर : सुशासन की प्रेरणा और नारी शक्ति की अमर ज्योति

31 मई 1725 को महाराष्ट्र के चौड़ी ग्राम में जन्मी बालिका, सामान्य ग्रामीण परिवेश से निकलकर भारतीय इतिहास की सबसे आदर्श शासिका बनीं। जिन्होंने शासन को प्रभुत्व से नहीं, सेवा से चलाया। इसलिए इतिहास उन्हें लोकमाता के रूप में स्मरण करता है, ब्रिटिश इतिहासकार जॉन की ने उन्हें द फिलॉसफर क्वीन अर्थात् दार्शनिक रानी कहा। उन्हें पुण्यश्लोक भी कहा गया, जिसका अर्थ है वह व्यक्तित्व जिसका जीवन स्वयं एक पवित्र स्तुति बन जाए

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
May 31, 2026, 08:57 am IST
inभारत
लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर

लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर

जब तलवारें साम्राज्य बनाती हैं, तब वे केवल सीमाएं बदलती हैं; किंतु जब करुणा, न्याय और धर्म शासन करते हैं, तब वे इतिहास की आत्मा को बदल देते हैं। अठारहवीं शताब्दी में भारत में राजनीतिक संक्रमण का युग था, मुगल सत्त्ता का पतन और मराठा शक्ति में पेशवा की अगुवाई में एक नवीन ऊर्जा का संचार हो रहा था। ऐसे समय में जब भारत ने लंबे समय तक आक्रमण झेले, संघर्ष किया और सांस्कृतिक आघात से अब केवल एक राज्य के नेतृत्वकर्ता की आवश्यकता नहीं थी, आवश्यकता थी जो राष्ट्र की आत्मा का पुनर्निर्माण और भारत की संस्कृति को पुनर्जीवित कर सके। ऐसे क्षण में मालवा की धरती पर एक महिला शासिका का उदय हुआ, जिन्होंने बिना किसी रक्तपात के संपूर्ण भारत के सांस्कृतिक मानचित्र पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।

31 मई 1725 को महाराष्ट्र के चौड़ी ग्राम में जन्मी बालिका, सामान्य ग्रामीण परिवेश से निकलकर भारतीय इतिहास की सबसे आदर्श शासिका बनीं। जिन्होंने शासन को प्रभुत्व से नहीं, सेवा से चलाया। इसलिए इतिहास उन्हें लोकमाता के रूप में स्मरण करता है, ब्रिटिश इतिहासकार जॉन की ने उन्हें द फिलॉसफर क्वीन अर्थात् दार्शनिक रानी कहा। उन्हें पुण्यश्लोक भी कहा गया, जिसका अर्थ है वह व्यक्तित्व जिसका जीवन स्वयं एक पवित्र स्तुति बन जाए।

परिवार साधारण, संस्कार असाधारण

अहिल्या बाई के पिता मानकोजी शिंदे गांव के पटेल थे और माता सुशीला बाई धार्मिक संस्कारवान महिला थीं। परिवार साधारण किंतु संस्कार असाधारण थे। मानकोंजी शिंदे ने अपनी पुत्री को पढ़ना-लिखना सिखाया। उनमें गहन धार्मिकता, विनम्रता, करुणा, अनुशासन तीव्र बुद्धिमत्ता और लोकहित की भावना थी। गांव के लोग अक्सर कहते थे, बालिका में दिव्यता है। एक दिन मालवा के मल्हार राव होल्कर चौड़ी गांव पहुंचे और छोटी बालिका को मंदिर में श्रद्धा के साथ पूजा करते देखा। तब उन्होंने अपने पुत्र खंडेराव होल्कर के लिए विवाह का प्रस्ताव रखा। 1733 अहिल्याबाई का खांडेराव के साथ विवाह हुआ। यहीं से एक साधारण ग्रामीण बालिका का प्रवेश भारतीय इतिहास के मंच पर हुआ। मल्हार राव ने अहिल्याबाई को शासन, राजनीति, सैन्य -रणनीति आदि का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया था।

जीवन के दुखों से नहीं मानी हार

उनके जीवन की बड़ी परीक्षा 1754 में आई, जब कुम्भेर के युद्ध में खांडेराव होल्कर की मृत्यु हो गई। यह समाचार सुनकर अहिल्याबाई ने सती होने का निश्चय किया। लेकिन मल्हार राव होल्कर ने उन्हें रोक दिया, कहा कि यदि तुम भी चली जाओगी इस बुजुर्ग का सहारा कौन बनेगा ? यह केवल ससुर का आग्रह नहीं था, यह भारत के भविष्य की पुकार थी। लेकिन दुखों की श्रृंखला अभी आना शेष थी । 1761 में उनकी सास गौतमा बाई का निधन हो गया, 1766 उनके मार्गदर्शक , संरक्षक ससुर मल्हार राव का भी निधन हो गया, तब अहिल्या के पुत्र मालेराव गद्दी पर बैठे, किन्तु कुछ ही महीनों बाद उनका भी निधन हो गया। विचार कीजिये एक महिला जिसने पति, सास, ससुर और पुत्र सभी को खो दिया हो, ऐसी परिस्थितियों में अधिकांश लोग जीवन से हार मान लेते। लेकिन अहिल्याबाई ने अपने निजी दुःख को सार्वजनिक सेवा में रूपांतरित कर दिया। यही महान नेतृत्व की पहचान होती है।

अहिल्याबाई होल्कर का नेतृत्व

होल्कर राज्य नेतृत्व विहीन लगने लगा, सामंतों को लगा कि एक विधवा स्त्री राज्य का संचालन कैसे करेगी, लेकिन वह अहिल्याबाई को नहीं जानते थे। पेशवा ने उन्हें मालवा के शासन की अनुमति दी और दिसंबर 1767 को विधिवत राज्य का संचालन का दायित्व ग्रहण किया। लेकिन गंगाधर राव ने अहिल्याबाई के विरुद्ध षड़यंत्र रचा और रघुनाथ राव से संपर्क कर मालवा पर अधिकार करने की योजना बनाई। दोनों का अनुमान था कि एक महिला इतनी बड़ी सेना के सामने टिक नहीं पाएगी, लेकिन अहिल्याबाई को अपने गुप्तचर के माध्यम से यह सूचना मिल गई।

उन्होंने घबराने की बजाय अपनी सेना को संगठित किया और तुकोजी राव को सेना का नेतृत्व सौंपा, मित्र राज्यों से सहायता प्राप्त की और पेशवा माधवराव को पत्र लिखकर संपूर्ण स्थिति से परिचित कराया। पेशवा को अत्यंत प्रभावशाली पत्र लिखा जिसमें उन्होंने याद दिलाया कि उनके ससुर ने मराठा साम्राज्य की सेवा में अपना जीवन समर्पित किया है, यदि उन्हें सत्ता से हटाना तो केवल पेशवा ही ऐसा कर सकते हैं, कोई अन्य व्यक्ति नहीं। पत्र पढ़कर पेशवा माधव क्रोधित हो गए, उन्होंने अहिल्याबाई का समर्थन किया। जब रघुनाथ राव की सेना महेश्वर पहुंची, तब अहिल्याबाई स्वयं रणभूमि पहुंच गईं। उनके साथ महिला सैनिकों की टुकड़ी भी थी, उन्होंने रघुनाथ राव को संदेश पहुंचाया कि मेरी महिला सेना अंतिम सांस तक युद्ध करेगी, यदि तुम पराजित हुए तो इतिहास तुम्हें एक स्त्री से हारने वाले व्यक्ति के रूप में याद करेगा। वास्तव में यह चेतावनी के रूप में एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक युद्ध था। रघुनाथ राव समझ गए कि इससे उनकी राजनीतिक और नैतिक क्षति होगी और उन्होंने तुरंत अपना रूप बदला और कहा कि वह तो केवल शोक संवेदना व्यक्त करने आए थे। इस प्रकार बिना युद्ध के ही अहिल्याबाई ने विजय प्राप्त कर ली। अहिल्याबाई ने अपनी सेना को आधुनिक बनाने के लिए 1792 फ्रांसीसी अधिकारी शेवेलियर डुड्रेनेक की सहायता से सेवा का पुनर्गठन किया।

राज्य का उद्देश्य प्रजा का कल्याण

राज्य के भीतर शांति स्थापित होते ही उन्होंने शासन सुधार की तरफ ध्यान लगाया क्योंकि उनका मानना था राज्य का अस्तित्व प्रजा के कल्याण के लिए है। लोकमाता की सबसे बड़ी पहचान उनकी न्यायप्रियता थी। वह किसी व्यक्ति का मूल्य उनके पद, धन प्रभाव से नहीं सत्य और न्याय के आधार पर करती थीं। लोक कथा और ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर जब उनके पुत्र पर गंभीर आरोप सिद्ध हुआ, उन्होंने न्याय के लिए सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

18वीं शताब्दी का भारत अनेक रूढ़ियों से ग्रस्त था, ऐसे समय अहिल्याबाई ने अनेक ऐतिहासिक सुधार किये। नि:संतान विधवा की संपत्ति जप्त करने की प्रथा समाप्त कर दी,विधवा को पुत्र ग्रहण करने का अधिकार दिया। उन्होंने पर्दा प्रथा को चुनौती दी और खुले दरबार में जनता से संवाद करती थीं। इस दृष्टि से वह आधुनिक महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत कही जाती हैं।

मालवा का स्वर्ण काल

उन्होंने धीरे-धीरे मालवा में स्वर्ण काल की शुरुआत कर दी, महेश्वर उनकी राजधानी बना जो शीघ्र ही कला साहित्य संगीत व्यापार संस्कृति का केंद्र बन गया। उनके दरबार में मराठी कभी मोरोपंत, अनंत गांधी और संस्कृत विद्वान खुशीराम जैसे विद्वान सम्मानित हुए थे। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया, शिक्षण संस्थानों और गुरुकुलों को संरक्षण दिया। उन्होंने कुएं, तालाब, धर्मशाला के साथ-साथ स्वच्छ जल की व्यवस्था भी कार्रवाई। एक प्रकार से उन्होंने जन स्वास्थ्य के लिए आधारभूत संरचना स्थापित करने का काम किया।

महेश्वर में वस्त्र उद्योग की स्थापना

उन्होंने आर्थिक सशक्तिकरण के लिए महेश्वर में वस्त्र उद्योग की स्थापना को प्रोत्साहित किया, देश के विभिन्न भागों से कुशल बुनकरों को बुलाया,वहां बसाया। धीरे-धीरे महेश्वर अपनी महेश्वरी साड़ी के लिए प्रसिद्ध हो गया। आज विश्वप्रसिद्ध महेश्वरी साड़ी उसी दूरदर्शी नीति का परिणाम है। उन्होंने कर व्यवस्था को जनहितकारी बनाया, सड़कों सराय यातायात की व्यवस्था की। स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहित किया। उनका मानना था कि जनता समृद्ध होगी तो राज्य भी समृद्ध होगा। आज भी यह सिद्धांत किसी भी सफल अर्थव्यवस्था की आधारशिला माना जाता है।

जनता ने इसलिए लोकमाता माना

जनता ने उन्हें लोकमाता माना, क्योंकि उन्होंने जनता को प्रजा नहीं, परिवार माना। उनका दरबार सबके लिए खुला था, वह लोगों के जीवन में सहभागी थीं और जनता के प्रति उनका प्रेम असाधारण था। आज संयुक्त राष्ट्रसंघ का सतत विकास का लक्ष्य है, जैसे समावेशी विकास, महिला सशक्तिकरण,सामाजिक न्याय, स्थानीय अर्थव्यवस्था, जन भागीदारी सांस्कृतिक संरक्षण आदि। ये अनेक तत्व अहिल्याबाई के शासन में दिखाई दे रहे थे तो वास्तव में अपने समय से दो शताब्दी आगे की शासिका थीं।

विदेशी विद्वानों ने लोकमाता के बारे में लिखा

स्कॉटलैंड की कवयित्री जोआना बैली ने लिखा 30 वर्षों तक उसके उनके शासन में भूमि समृद्ध होती रही और सभी लोग उन्हें आशीर्वाद देते रहे। उन्होंने संपूर्ण भारत की सांस्कृतिक चेतना को स्पर्श करने का काम किया। सर जॉन मेंलकम ने लिखा कि उनकी दानशीलता और निर्माण कार्य के प्रमाण भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक दिखाई देते हैं। सदियों से आक्रमण और संघर्ष के कारण काशी विश्वनाथ मंदिर को अनेक क्षति पहुंची थी, ऐसे समय अहिल्याबाई ने 1780 में काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। यह पुनर्निर्माण भारतीयों के आत्मविश्वास का पुनर्निर्माण था, भारतीय संस्कृति के उत्थान का काल था।

शिवभक्त थीं अहिल्याबाई होल्कर

अहिल्याबाई शिव भक्त थीं, उनके रुपयों पर बेलपत्र और शिवलिंग एवं सिक्कों पर नंदी का चित्र अंकित था। उन्होंने सोमनाथ, विश्वनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ, उज्जैन, द्वारिका, कांची, अयोध्या, हरिद्वार, नासिक आदि स्थानों पर मंदिर बनवाये। भारत भर के अधिकांश तीर्थ स्थलों पर घाट बनवाना, कुआं, बावड़ी, प्याऊ ,तालाब आदि का निर्माण करवाया। महेश्वर के निकट नर्मदा के तट पर सुंदर घाटों का निर्माण करवाया। बनारस में मणिकर्णिका घाट का निर्माण करवाया। गया में विष्णुपद मंदिर का निर्माण करवाया, महेश्वर के किले का निर्माण करवाया।

महेश्वर में निकाली जाती है मां साहब की पालकी

अहिल्याबाई ने किसी देश पर न तो आक्रमण हेतु सेना भेजी और न किसी राज्य पर अधिकार किया, फिर भी उन्होंने सारे भारत को जोड़ लिया। यह जुड़ाव संस्कृति के माध्यम से, धर्म के माध्यम से, जन कल्याण के माध्यम से और संपूर्ण भारत के सांस्कृतिक चेतना को जोड़कर। उन्होंने भारत को एक आध्यात्मिक परिवार बना दिया। हालांकि वे सत्ता और वैभव से दूरी रखती थी, उनकी संपत्ति और आय का बड़ा भाग लोक कल्याण और धार्मिक पुनर्निर्माण में व्यय हुआ। आज भी महेश्वर में उनकी स्मृति जीवित है,आज भी मां साहब की पालकी निकाली जाती है।

भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण की सम्राज्ञी

यदि छत्रपति शिवाजी महाराज को स्वराज का शिल्पकार कहा जाए, बाजीराव को मराठा विस्तार का निर्माता कहा जाए तो अहिल्याबाई को भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण की सम्राज्ञी कहा जा सकता।

सर जॉन मेलकॉम ने खुद कहा जितना अधिक उनके विषय में अध्ययन किया जाता है उतना ही अधिक सम्मान और प्रशंसा उत्पन्न होती है। मराठा इतिहासकार कर्नल जेम्स ग्रांट डफ़ ने उन्हें साधारण बुद्धिमत्ता, निष्पक्षता प्रशासनिक क्षमता वाली शासिका बताया। डॉक्टर राधाकृष्णनन अहिल्याबाई को मूल्य आधारित शासन का आदर्श बताया। आज की प्रत्येक महिला प्रशासक राजनीतिक, शिक्षिका, सामाजिक कार्यकर्ता एवं उद्यमी के लिए अहिल्याबाई प्रेरणास्रोत हैं। आज जब संसार युद्ध, सामाजिक विभाजन, पर्यावरण संकट, नैतिक पतन से जूझ रहा है, तब लोकमाता अहिल्याबाई सिखाती हैं कि शक्ति का सर्वोच्च रूप सेवा होता है, धर्म का सर्वोच्च रूप लोकमंगल है, राजनीति का सर्वोच्च रूप नैतिकता है और नेतृत्व का सर्वोच्च रूप करुणा है।

नर्मदा आज भी उनकी कथा सुनाती है

13 अगस्त 1795 को नर्मदा की तट पर महान तपस्विनी इस संसार से विदा हुई। कुछ व्यक्तित्व मरते नहीं हैं, इतिहास से निकलकर संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं। अहिल्याबाई ऐसी चेतना थीं, महेश्वर घाटों पर बहती नर्मदा आज भी उनकी कथा कहती है, काशी विश्वनाथ के शिखर आज भी उनके संकल्प के साक्षी हैं, सोमनाथ की गरिमा आज उनके पुनर्निर्माण की स्मृति को जीवित करती है, माहेश्वरी साड़ी उनकी दूरदर्शिता के गुणगान करते हैं और करोड़ों भारतीय के हृदय में लोकमाता की छवि आज भी इसी श्रद्धा से विराजमान है जैसे दो शताब्दी पूर्व थी।

 

Topics: अहिल्याबाई होलकरपाञ्चजन्य विशेषलोकमाता अहिल्याबाई होलकरअहिल्याबाई होलकर का जीवनअहिल्याबाई होलकर के योगदान
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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