21वीं सदी का समय युद्धों और भू राजनीतिक तनाव का रहा है। इनके कारण यह खाद्य, ऊर्जा, जल और कृषि संकट का भी युग बनता जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ईरान-अमेरिका- इजरायल संघर्ष ने विश्व की आर्थिक प्रणाली की कमजोरी को उजागर किया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य जहां से विश्व के बड़े हिस्से का तेल, गैस, उर्वरक और व्यापार गुजरता है, आज वैश्विक चिंता का केंद्र बना हुआ है। इस मार्ग के बाधित होने से केवल ईंधन नहीं बल्कि उर्वरक, खाद्य उत्पादन और वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है।
भारत जैसे देश जिनकी कृषि आज यूरिया, डीएपी, पोटाश जैसे उर्वरको तथा उन्नत बीज और आयातित ऊर्जा पर निर्भर हो चुकी है। भारत सरकार ने 2025-26 में लगभग 1.68 लाख करोड़ उर्वरक सब्सिडी पर खर्च किया है, डीएपी की लगभग 60% तो पोटाश की 100% आवश्यकता आयात से पूरी होती है। प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा भी आयात पर निर्भर है। कृषि उत्पादन के साधनों में वैश्विक निर्भरता कम करनी है।
हरित क्रांति की मजबूरी
1960 के दशक में भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से गुजर रहा था, तब विदेशी सहायता पर निर्भरता और तेजी से बढ़ती जनसंख्या ने देश को कठिन परिस्थितियों में खड़ा कर दिया। ऐसे समय में हरित क्रांति भारत के अनिवार्य आवश्यकता बन गई। हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि की, अकाल से मुक्ति दिलाई और भारत भी खाद्यान्न आत्मनिर्भर हो गया। हरित क्रांति ने भोजन ते दिया, लेकिन खेती के साधन पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हो सके।
पर्यावरणीय कृषि की ओर कदम
इसलिए आज पूरी दुनिया एग्रोइकोलॉजी की ओर बढ़ रही है। खाद्य एवं कृषि संगठन संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम जैसी संस्थाएँ अब कृषि पारिस्थितिकी, पुनर्योजी कृषि और प्राकृतिक खेती को भविष्य की टिकाऊ कृषि व्यवस्था मान रही हैं। विशेष रूप से अफ्रीका के अनेक देश वर्तमान उर्वरक संकट के बीच स्थानीय खाद्य प्रणाली, जैविक खेती और जैवविविधता आधारित मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने समझ लिया है कि रासायनिक कृषि किसानों को आत्मनिर्भर नहीं, बल्कि बाजार और कॉर्पोरेट नियंत्रण पर निर्भर बनाती है।
कृषि पारिस्थितिकी – भारतीय कृषि की चेतना
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि एग्रो इकोलॉजी भारत के लिए नया विचार नहीं है, भारत की प्राचीन कृषि पंचमहाभूत सिद्धांत, गौ आधारित कृषि, मिश्रित खेती, जैविक पुनर्चक्रण, कृषि वानिकी, तालाब आधारित सिंचाई, तथा सामुदायिक कृषि व्यवस्था पर आधारित थी। पंचगव्य भारतीय एग्रो इकोलॉजी का हृदय था। पंचगव्य में दूध, दही, घी, गोमूत्र, गोबर धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ जैविक कृषि प्रणाली का हिस्सा था। पंचगव्य से मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरता है, सूक्ष्म जीव सक्रिय होते हैं, पौधों को पोषण मिलता है, रासायनिक कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होती है और मिट्टी में कार्बन संरक्षण होता है। यह भारत की पारंपरिक कृषि एक बंद पारिस्थितिकी तंत्र थी, इसमें पशु, गोबर, खाद, मिट्टी, फसल, सबका उपयोग होता था, कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता था। आज जो एग्रो इकोलॉजी के सिद्धांत दुनिया के सामने रखे जा रहे हैं वह भारतीय ग्राम जीवन में सदियों तक जीवित रहे।
भारतीय परंपरा में खेती को भूमि दोहन नहीं, भूमि पालन माना गया है। धरती को भू माता कहा गया, धरती माता थी, अन्न पूर्णब्रह्म था, वृक्ष देवता थे, और खेती प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का विज्ञान थी। अथर्ववेद में लिखा है कि पृथ्वी मेरी माता है मैं उसका पुत्र हूँ।
पंच महाभूत की दृष्टि
पंच महाभूत आधारित कृषि दृष्टि रखी गई है, जिसमें वह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश के संतुलन पर आधारित थी। कृषि पाराशर और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्षा बीज मिट्टी और कृषि प्रबंधन का विस्तृत वर्णन मिलता है।
जैव विविधता
एग्रोइकोलॉजी का महत्वपूर्ण सिद्धांत जैव विविधता है, जो भारत में सदियों तक रही है। भारतीय किसान एक ही खेत में अनेक फसल उगाते थे। दलहन-अनाज साथ होते थे। पशुपालन और वृक्ष को खेती से जोड़ते थे। आज दुनिया इसे पॉली कल्चर या इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम कहती है।
कृषि का केंद्रबिन्दु -गाय
भारतीय कृषि का केंद्र गाय रही है, जिससे गोबर, गोमूत्र, दूध और पोषण मिला है। एग्रो इकोलॉजी में फसल चक्र की परंपरा है जिसे अनाज के बाद दलहन, दलहन के बाद तिलहन बोया जाता था जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन का संतुलन बना रहता था।
प्राचीन जल तकनीक
भारत की परंपरागत कृषि जल संरक्षण पर आधारित थी तालाब, बावड़ी , नहरें-जोहड़ आदि सामुदायिक व्यवस्था का हिस्सा थीं। आज जब भू-जल संकट बढ़ रहा है तो दुनिया वाटर स्मार्ट एग्रीकल्चर की बात कर रही है जबकि भारत जैसे सदियों से जानता था।
बीज स्वतंत्रता
भारतीय किसान अपने बीज स्वयं संरक्षित करते थे जो प्रत्येक क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी आदि के अनुसार विकसित थे, जिनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता जलवायु अनुकूलता और पोषण विविधता होती थी। आज हाइब्रिड सीड और पेटेंट सीड के दौर में दुनिया बीज संप्रभुता की बात कर रही है, जबकि भारत की परंपरा पहले से ही बीज स्वतंत्रता पर आधारित थी।
भारतीय कृषि कोई आर्थिक गतिविधि नहीं, वह संस्कृति और जीवन का हिस्सा थी। इसलिए हमारे त्योहार जैसे पोंगल ओणम मकर संक्रांति आदि कृषि चक्र से जुड़े हुए थे।
कृषि एवं वृक्षों का संबंध
भारत में एग्रोफोरेस्ट्री अर्थात वृक्ष-कृषि का संबंध हमेशा रहा है। हमारे खेतों के किनारे नीम, पीपल, बरगद, इमली, शीशम, नारियल आदि लगाए जाते थे, जो मिट्टी संरक्षण, जल संरक्षण, पशु चारा और जैव विविधता को बढ़ाते थे। आज दुनिया उसी दिशा में लौट रही है। इसलिए यह संकट का समय नहीं है बल्कि भारत के लिए अपनी कृषि चेतना को पुनर्जीवित करने का समय है और आज हमें अपने आधुनिक विज्ञान एवं प्राचीन कृषि ज्ञान को संतुलित करने की आवश्यकता है।
कृषि पारिस्थितिकी के 13 सिद्धांत एवं भारत
संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं विशेष रूप से खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ़.ए.ओ.) तथा खाद्य सुरक्षा एवं पोषण पर उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह ने कृषि पारिस्थितिकी के सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। वर्ष 2019 में उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह ने कृषि पारिस्थितिकी के 13 सिद्धांत बताए, जबकि एफ़.ए.ओ. ने वर्ष 2018 में इसके 10 प्रमुख तत्व प्रस्तुत किए। इन सिद्धांतों का उद्देश्य ऐसी कृषि व्यवस्था विकसित करना है जो प्रकृति के साथ संतुलित हो, मिट्टी और जल की रक्षा करे, किसानों को आत्मनिर्भर बनाए, जैव विविधता को बचाए, तथा जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर सके।
- कृषि पारिस्थितिकी का पहला सिद्धांत है पुनर्चक्रण। भारतीय कृषि में गोबर, पत्तियाँ, फसल अवशेष और जैविक कचरा पुनः मिट्टी में लौटाया जाता था। कुछ भी व्यर्थ नहीं होता था। आज दुनिया इसे चक्रीय अर्थव्यवस्था कहती है।
- दूसरा सिद्धांत है बाहरी संसाधनों पर निर्भरता में कमी। भारतीय किसान सदियों तक गोबर खाद, पंचगव्य, जीवामृत और हरी खाद का उपयोग करते रहे।
- तीसरा सिद्धांत है मिट्टी स्वास्थ्य। कृषि पारिस्थितिकी मिट्टी को जीवित तंत्र मानती है। भारतीय कृषि भी मिट्टी को जीवित मानती थी। फसल चक्र, जैविक पदार्थ और मिश्रित खेती मिट्टी की उर्वरता बनाए रखते थे।
- चौथा सिद्धांत है पशु आधारित कृषि। भारतीय कृषि का केंद्र पशुधन, विशेषकर गाय थी। गोबर खाद बनता था, गोमूत्र प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में उपयोग होता था और पशु शक्ति खेती का आधार थी। यह एक पूर्ण पारिस्थितिक चक्र था।
- पाँचवाँ सिद्धांत है जैव विविधता। भारत सदियों तक मिश्रित खेती और बहुफसली प्रणाली अपनाता रहा। बाजरा, ज्वार, रागी, दलहन और तिलहन मिलकर कृषि को स्थिर बनाते थे।
- छठा सिद्धांत है सहक्रिया अर्थात् मिट्टी, जल, वृक्ष, पशु और फसल का परस्पर सहयोग। भारतीय कृषि में खेत किनारे वृक्ष, तालाब, पशुपालन और कृषि वानिकी इसी समन्वित व्यवस्था का हिस्सा थे।
- सातवाँ सिद्धांत है आर्थिक विविधता। भारतीय ग्राम अर्थव्यवस्था केवल खेती पर नहीं, बल्कि दुग्ध उत्पादन, मधुमक्खी पालन, बागवानी और हस्तशिल्प पर भी आधारित थी।
- आठवाँ सिद्धांत है ज्ञान का सह-निर्माण। कृषि पारिस्थितिकी मानती है कि किसान भी ज्ञान निर्माता हैं। भारत में लोक कृषि ज्ञान, ऋतु विज्ञान, बीज परंपरा और खेती के अनुभव पीढ़ियों तक चलते रहे।
- नौवाँ सिद्धांत है सामाजिक मूल्य और भोजन व्यवस्था। भारतीय भोजन प्रणाली स्थानीय और जलवायु आधारित थी। बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाज आज श्रेष्ठ पोषण अन्न माने जा रहे हैं।
- दसवाँ सिद्धांत है न्यायपूर्ण व्यवस्था। भारतीय ग्राम व्यवस्था सामुदायिक सहयोग पर आधारित थी।
- ग्यारहवाँ सिद्धांत है संपर्क व्यवस्था, अर्थात् स्थानीय हाट-बाजार और उत्पादक-उपभोक्ता का सीधा संबंध।
- बारहवाँ सिद्धांत है भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों का सामुदायिक प्रबंधन। भारत में सामुदायिक तालाब, चरागाह और ग्राम वन होते थे।
- तेरहवाँ सिद्धांत है सहभागिता। ग्राम सभा आधारित निर्णय व्यवस्था भारतीय समाज का हिस्सा थी।
आज अनेक लोगों को यही अनुभूति होती है कि दुनिया जिन अवधारणाओं को नए शब्दों एग्रोइकोलॉजी, रीजेनेरेटिव एग्रीकल्चर, सर्कुलर इकोनॉमी, सस्टेनेबल फूड सिस्टम, नेचुरल फार्मिंग के रूप में प्रस्तुत कर रही है, उनका मूल तत्व भारतीय ज्ञान परंपरा में सदियों से विद्यमान रहा है। ऐसा लगता है मानो भारतीय सभ्यता की पुरानी बुद्धि को नए वैज्ञानिक शब्दों और आकर्षक वैश्विक आवरण में पुनः दुनिया के सामने रखा जा रहा है।
भारत के लिए अवसर
आज का उर्वरक संकट, जलवायु संकट और मिट्टी संकट भारत को यह अवसर दे रहे हैं कि वह अपनी जड़ों को पुनः पहचाने। शायद अब समय आ गया है कि भारत स्वयं अपने ज्ञान को केवल परंपरा नहीं, भविष्य की सभ्यता के रूप में देखे क्योंकि कृषि पारिस्थितिकी कोई नया विचार नहीं, बल्कि भारत की उसी प्राचीन चेतना का आधुनिक नाम है जो हमारी मिट्टी में, हमारी संस्कृति में और सचमुच हमारे सामूहिक डीएनए में सदियों से प्रवाहित होती रही है।


















