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उपजाऊ धरती का संकल्प

राजस्थान की कृषि केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि प्रकृति, पशुधन और ग्रामीण जीवन की सांस्कृतिक धुरी भी है। ऐसे समय में जब रासायनिक खेती मिट्टी और मानव स्वास्थ्य दोनों पर दबाव बढ़ा रही है, प्राकृतिक और संतुलित खेती की ओर लौटना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है

Written byभजनलाल शर्माभजनलाल शर्मा
May 29, 2026, 08:25 am IST
in पर्यावरण, विश्लेषण, राजस्थान

भारत की आत्मा गांवों में और गांवों की आत्मा किसान में बसती है। किसान केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी भी है। पिछले कुछ दशकों में उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का व्यापक उपयोग किया गया। इससे उत्पादन तो जरूर बढ़ा, लेकिन मिट्टी की उर्वरता, जल की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से भूमि की उत्पादकता घट रही है, वहीं खेती की लागत दिनों प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।

ऐसे समय में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और “धरती माता की सेहत बचाने” का आह्वान आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने का राष्ट्रीय संकल्प है। राजस्थान जैसे विशाल कृषि प्रधान राज्य के लिए यह संदेश और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

चुनौती और बदलती जरूरत

राजस्थान की पहचान केवल मरुस्थल से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी कृषि और पशुपालन को जीवित रखने वाले मेहनतकश किसानों से भी है। यहां जल संकट, कम वर्षा, बढ़ती गर्मी और भूमि की क्षारीयता जैसी अनेकों चुनौतियां मौजूद हैं। यदि यहां रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में मिट्टी की शक्ति और अधिक कमजोर हो सकती है। अब समय की मांग है कि किसान कम लागत, अधिक लाभ और स्वस्थ खेती की दिशा में आगे बढ़ें। हरित क्रांति के दौर में यूरिया, डीएपी और अन्य रासायनिक उर्वरकों का खेती में खूब इस्तेमाल किया गया।

इससे उत्पादन में तो बढ़ोतरी जरूर हुई लेकिन लंबे समय तक रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी के प्राकृतिक पोषक तत्वों का संतुलन बिगाड़ दिया। नतीजतन उसकी उत्पादकता घट गई। आज किसानों को खेत में हर वर्ष पहले से अधिक खाद डालनी पड़ती है, फिर भी उनका उत्पादन बढ़ता नहीं है, स्थिर बना रहता है है। रासायनिक उर्वरकों की लगातार बढ़ती कीमतों ने खेती की लागत को और बढ़ा दिया है। राजस्थान में श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, कोटा, बूंदी और झालावाड़ जैसे क्षेत्रों में अत्यधिक रासायनिक उपयोग के कारण भूमि और जल की गुणवत्ता प्रभावित होने की चिंताएं बढ़ी हैं।

प्राकृतिक खेती और तकनीक

प्रधानमंत्री मोदी जी ने “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के साथ-साथ “धरती मां को जहर से बचाने” का भी संदेश दिया है। केंद्र सरकार प्राकृतिक खेती, गौ-आधारित कृषि, नैनो यूरिया, जैविक खाद और ड्रोन आधारित संतुलित छिड़काव जैसी तकनीकों को बढ़ावा दे रही है। विशेष रूप से नैनो यूरिया ने किसानों के बीच नई आशा जगाई है। यह कम मात्रा में अधिक प्रभावी साबित हो रहा है, जिससे लागत घटती है और पर्यावरणीय नुकसान भी कम होता है।

खेती केवल फसल उगाने का माध्यम नहीं, बल्कि मिट्टी, जल, पशुधन और पर्यावरण को संतुलित रखने की जीवन पद्धति है। आज पूरी दुनिया फिर उसी दिशा में लौट रही है। यूरोप और अमेरिका सहित अनेक देशों में जैविक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। राजस्थान के किसान इस अवसर को समझकर वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना सकते हैं। राजस्थान के मोटे अनाज, बाजरा, मूंग, मैथी, जीरा और जैविक सब्जियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी संभावनाएं हैं।

संरक्षण का संकल्प

राजस्थान में पशुधन की समृद्ध परंपरा रही है। यहां का ग्रामीण जीवन गाय, भैंस, ऊंट और भेड़ जैसे पशुओं से गहराई से जुड़ा रहा है। यदि पशुपालन और प्राकृतिक खेती को एक साथ जोड़ा जाए, तो किसान आत्मनिर्भर बन सकता है। गोबर और गौमूत्र आधारित खाद एवं जैविक घोल खेतों की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ रासायनिक निर्भरता भी कम कर सकते हैं।

हमारे बुजुर्गों ने सदियों तक धरती को मातृस्वरूप मानकर उसकी सेवा और संरक्षण किया। उन्होंने भूमि की उर्वरता, जैविक संतुलन और प्राकृतिक संपदा को सहेजकर अगली पीढ़ियों को सौंपा। आज हमारा दायित्व है कि हम रासायनिक उपयोग के अंधाधुंध विस्तार से बचते हुए मिट्टी की शक्ति, उसकी जीवंतता और प्रकृति के संतुलन को सुरक्षित रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी समृद्ध और उपजाऊ धरती मिल सके। हमारी संस्कृति भूमि को केवल संसाधन नहीं, बल्कि पूजनीय तत्व मानती है। इसलिए धरती की रक्षा करना हमारे लिए कर्तव्य के साथ-साथ पवित्र उपासना भी है।आज आवश्यकता केवल उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसी कृषि व्यवस्था विकसित करने की है जो पर्यावरण, जल संसाधनों और मानव स्वास्थ्य के लिए भी सुरक्षित हो। राजस्थान जैसे राज्य में यह चुनौती और अधिक गंभीर है, क्योंकि यहां जल संकट पहले से ही गहरा रहा है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग भूजल की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। कई क्षेत्रों में मिट्टी की जैविक शक्ति लगातार घट रही है, जिससे भविष्य की कृषि पर खतरा मंडरा रहा है। यदि समय रहते खेती की पद्धतियों में संतुलन नहीं लाया गया, तो आने वाले वर्षों में उत्पादन और लागत दोनों का संकट और गहरा सकता है।

राजस्थान सरकार किसानों को जागरूक करने, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और आधुनिक तकनीक को गांवों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। युवा किसानों को भी कृषि में नवाचार और तकनीकी प्रयोगों के माध्यम से जोड़ने की आवश्यकता है।

यह केवल खेती सुधार का अभियान नहीं, बल्कि धरती, जल और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने का राष्ट्रीय संकल्प है। जब किसान प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़ेगा, तभी आत्मनिर्भर और समृद्ध भारत का सपना साकार होगा।

यदि मिट्टी स्वस्थ रहेगी तो किसान समृद्ध रहेगा, गांव खुशहाल रहेंगे और देश सुरक्षित रहेगा। प्रधानमंत्री मोदी जी का यह आह्वान वास्तव में “स्वस्थ धरती, स्वस्थ किसान और स्वस्थ भारत” का मंत्र है। आइए, हम सब मिलकर भावी पीढ़ियों के लिए उर्वर भूमि, स्वच्छ जल और सुरक्षित पर्यावरण के संरक्षण का संकल्प लें। यही सच्चे अर्थों में राष्ट्रसेवा है और यही भारतीय कृषि की स्थायी समृद्धि का मार्ग भी है।

Topics: जैविक खेतीमिट्टी की उर्वरतापर्यावरण संरक्षणगौआधारित कृषिआधुनिक तकनीकनैनो यूरियापाञ्चजन्य विशेषड्रोन आधारित छिड़कावएक पेड़ मां के नामकृषि में नवाचारजैविक खादउपजाऊ धरती(Bhajan Lal Sharma CMधरती मां की सेहतप्राकृतिक खेतीस्वस्थ धरती स्वस्थ किसान
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