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भारत में सड़क पर नमाज पर तनाव, मगर विकसित मुस्लिम देशों मे क्या हैं नियम?

उत्तर प्रदेश, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सड़कों पर नमाज़ पढ़ने पर लगी पाबंदी से लेफ्ट और इस्लामिक मीडिया बौखलाया हुआ है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
May 28, 2026, 06:18 pm IST
in भारत, विश्व, मत अभिमत, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल
muslim offering namaz on the road on eid

चांदनी चौक में सड़क पर नमाज (फोटो साभार: ANI) चित्र वर्तमान का नहीं है.

इन दिनों पूरा लेफ्ट और इस्लामिक मीडिया भारत को लेकर गुस्से से लाल है और जमकर दुष्प्रचार कर रहा है और विशेषकर बंगाल और उत्तर प्रदेश की सरकारों के कारण और भी निशाना साध रहा है। बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सड़कों पर नमाज पढ़ने पर पाबंदी लगाई गई है। वैसे तो सड़क पर नमाज पढ़ने को लेकर हमेशा ही विवाद और चर्चा होती रही है कि इतनी बड़ी मस्जिदें होने के बाद भी सड़कों पर नमाज क्यों पढ़ी जानी चाहिए?

मगर हर बार अल्पसंख्यकों के विशेषाधिकार को लेकर तमाम चर्चाएं होती रहीं थी। और भारत का एक बहुत बड़ा वर्ग लगातार ही यह कहता है कि और लोग भी तो मनाते हैं अपने-अपने त्योहार!

और सड़कों पर नमाज पढ़ने को मूल अधिकार बनाकर बहस की जाने लगती थी। इस बार तो और भी यह बहस तेज है, बल्कि इस बार तो इस्लामिक कट्टरपंथी मीडिया भी इस झूठ को फैलाने में आगे हैं। इस बार बकरीद पर सड़कों पर नमाज पढ़ने को लेकर और भी गलत खबरें चलाई जा रही हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विशेषकर कहा कि नमाज सड़कों पर नहीं होगी। और उन्होनें यह भी कहा कि शांतिपूर्वक तरीके से उन्हें सहमत होना होगा।

जब सरकारों की सख्ती हुई, तो सड़कों पर नमाज पढ़ने को अपना अधिकार बताने वाले लोगों के भी सुर बदल गए और यह बात की जाने लगी कि जो सरकार नियम बनाए, उसे के अनुसार त्योहार मनाया जाए। उत्तर प्रदेश में कई मौलानाओं ने भी मुख्यमंत्री योगी की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर सड़कों पर नमाज न हो।

मौलाना खालिद रशीद फ़रंगी महल ने कहा कि हिन्दू और मुस्लिम सभी को कानून का पालन करना चाहिए। उन्होनें कहा कि सार्वजनिक स्थानों और सड़क पर नमाज नहीं पढ़नी चाहिए। मौलाना ने बकरीद पर कुर्बानी का वीडियो इंटरनेट मीडिया पर अपलोड न करने की भी अपील की है।

शिया मौलाना यासूब ने कहा कि नमाज का मतलब है कि पाक स्थान, पाक जिस्म और पाक वस्त्र। बकरीद पर बड़ी मस्जिदों में नमाज अदा करने से सड़क पर नमाज पढ़ने की जरूरत नहीं होगी। सभी को चाहिए कि वह सड़क के बजाय बड़ी मस्जिदों में नमाज अदा करें।

वहीं ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन (AIIA) के प्रमुख मौलाना साजिद रशीदी ने भी कहा कि इस्लाम में नमाज के लिए साफ और पाक जगह होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि सड़क पर लोग चलते हैं, जानवर गुजरते हैं, थूकते और पेशाब भी करते हैं, इसलिए वहां इबादत नहीं हो सकती। उन्होंने कहा, सड़क पाक नहीं हो सकती, तो वहां नमाज कैसे होगी।

यह तो मौलानाओं की बात थी। मगर भारत में कथित सेक्युलर वर्ग है, उसे यह लगता है कि मुस्लिमों को अल्पसंख्यक होने के नाते कानून से दायरे से बाहर ही रखा जाना चाहिए। उन्हें न ही कानून का पालन करना है और न ही कोई नियम मानना है, क्योंकि वे मुसलमान हैं।

क्या सड़कों पर नमाज वास्तव में इतनी आवश्यक है?

अब प्रश्न उठता है कि क्या सड़कों पर नमाज वास्तव में इतनी आवश्यक है कि जिसे न करने पर भारत पर क्रूर, निर्दयी और मुस्लिमों के प्रति असहिष्णु देश होने का ठप्पा लग जाए?

अब आइए देखते हैं कि विकसित इस्लामी मुल्कों में सड़कों पर नमाज पढ़ने को लेकर क्या कानून हैं? और क्या वहाँ पर मुस्लिम सड़कों पर बिना किसी रोकटोक के नमाज पढ़ सकते हैं? भारत और यूरोप के तमाम सेक्युलर देशों में इस बात पर जोर दिया जाता है कि मुस्लिमों का यह अधिकार है कि वे सड़कों पर नमाज पढ़ सकें। मगर क्या ये अधिकार उन्हें विकसित मुस्लिम मुल्कों में भी हैं या नहीं? यह देखते हैं।

  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE): सबसे पहले बात संयुक्त अरब अमीरात की। संयुक्त अरब अमीरात में अबू धाबी में सड़क किनारे या हाईवे पर नमाज़ पढ़ने/गाड़ी रोककर नमाज़ पढ़ने पर 1,000 दिरहम (लगभग ₹22,000 से ₹23,000) का जुर्माना है। वहीं दुबई में भी यह प्रतिबंधित है। दुबई में अवैध पार्किंग या सड़क जाम करने पर 500 दिरहम (लगभग ₹11,000-12,000) से शुरू, गंभीर मामलों में 1,000 दिरहम तक का दंड है। इस निर्णय के पीछे का कारण ट्रैफिक सुरक्षा, दुर्घटना का खतरा और सार्वजनिक अव्यवस्था बताया जाता है। यहाँ तक कि ईद या जुम्मे पर भी सार्वजनिक नमाज पढ़ने की अनुमति नहीं है, केवल मस्जिदों में नमाज पढ़ने की अनुमति है।
  • सऊदी अरब: यहाँ पर भी सड़कों, हाईवे या पब्लिक जगहों पर सामूहिक नमाज़ सख्ती से प्रतिबंधित है। यहाँ पर भी नियम तोड़ने पर आर्थिक दंड है। 1,000 दिरहम (या उसके बराबर SAR में)। अगर बार-बार ऐसा किया जाता है तो प्रतिव्यक्ति दंड और सजा दोनों ही बढ़ सकते हैं। यहाँ पर मुतावा अर्थात मजहबी पुलिस और ट्रैफिक पुलिस दोनों निगरानी रखते हैं।
  • कतर: यहाँ तक कि कतर तक में भी सड़क पर नमाज़ पर प्रतिबंध है और नियम तोड़ने पर जुर्माना लगता है। ईद कि नमाज भी मस्जिदों में पढ़ी जाती है।
  • कुवैत: यहाँ पर भी सड़क/पब्लिक जगह पर सामूहिक नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती है और यहाँ पर जुर्माना + प्रशासनिक कार्रवाई दोनों ही की जाती हैं।
  • बहरीन और ईरान: बहरीन में भी समान नीति है। यहाँ तक कि ईरान में भी सुरक्षा कारणों से केवल मस्जिदों के भीतर नमाज पढ़ने की अनुमति है।

अब एक बात पर अगर गौर किया जाए तो अधिकांश खाड़ी देशों में दंड प्रति व्यक्ति है। पहली बार जुर्माना लगता है और दूसरी बार यदि ऐसी कोई भी गलती होती है तो दंड राशि बढ़ती है और साथ अन्य कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है, जैसे कि विदेशियों के लिए हिरासत में लेना/ या डेपोर्ट करना।

मीडिया की खबरों के अनुसार साल 2026 की भी ईद की नमाज के लिए यूएई, कतर और कुवैत जैसे विकसित मुल्कों ने सड़कों पर नमाज पर पाबंदी लगाकर केवल मस्जिदों में ही नमाज की अनुमति दी है और इसका कारण केवल ट्रैफिक सुरक्षा, सार्वजनिक सुविधा और व्यवस्था बताया जाता है।

मुस्लिम मुल्कों से परे चीन का हाल

मुस्लिम मुल्कों से परे यदि कथित आजादी वाला देश चीन देखें तो वहाँ पर भी सड़कों पर नमाज की आजादी नहीं है, वहाँ पर तो मुस्लिमों की मस्जिदें भी किसी न किसी बहाने से तोड़ दी जाती हैं तो भी कोई मुस्लिम मुल्क अपना मुंह नहीं खोलता।

जब विकसित इस्लामी मुल्क में कानून और सुरक्षा की बात करते हुए सड़कों पर नमाज पर पाबंदी लगाई जा सकती है तो भारत में कानून पालन में मजहब का वर्चस्व क्यों आता है?

Topics: Road Namaz Ban IndiaLeft Media PropagandaAppeasement Politics UP BengalMuslim Privilege DebateYogi Adityanath Action Namaz
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