मयूरभंज में संथाल परिवार की पारंपरिक तरीके से 'घरवापसी' के बाद तेज हुई कन्वर्जन पर बहस
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मयूरभंज में संथाल परिवार की पारंपरिक तरीके से ‘घरवापसी’ के बाद तेज हुई कन्वर्जन पर बहस

मयूरभंज जिले के जनजाति बहुल क्षेत्र में एक संथाल परिवार की पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुई घरवापसी ने कनवर्जन और जनजातीय संस्कृति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Lalit Fulara
May 26, 2026, 01:16 pm IST
inओडिशा

भुवनेश्वर: मयूरभंज जिले के जनजाति बहुल क्षेत्र में एक संथाल परिवार की पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुई घरवापसी ने कन्वर्जन और जनजातीय संस्कृति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। ईसाई प्रचारकों के प्रभाव में आकर करीब पांच वर्ष पहले मजहब बदलने वाले परिवार ने अब पुनः अपने मूल सांथाली समाज और परंपरा में वापसी की है। इस घटना के बाद स्थानीय सामाजिक संगठनों ने जनजातीय इलाकों में गैरकानूनी कन्वर्जन गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग तेज कर दी है।

यह मामला खुंटा प्रखंड के भोलागाड़िया पंचायत अंतर्गत नुआगांव क्षेत्र के डुंगुरुडिही गांव का है। गांव निवासी लेंबु हांसदा का परिवार लगभग पांच साल पहले अपनी पारंपरिक संस्कृति छोड़कर ईसाई मजहब में शामिल हो गया था। परिवार का कहना है कि उस समय वे बीमारी और आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे थे। इसी दौरान ईसाई मजहब के प्रचारक उनके संपर्क में आए और उन्हें समझाया कि यदि वे अपने पारंपरिक धर्म को छोड़कर ईसा की शरण में चले जाएंगे तो उनका स्वास्थ्य सुधर जाएगा और जीवन की परेशानियां समाप्त हो जाएंगी।

लेंबु हांसदा ने बताया कि कठिन परिस्थितियों में वे ईसाई पास्टरों के बहकावे में आ गए और धीरे-धीरे अपनी जड़ों तथा पारंपरिक पहचान से कटते चले गए। उन्होंने कहा कि काफी समय बाद उन्हें एहसास हुआ कि जिन बातों और वादों के जरिए उन्हें कन्वर्ट कराया गया था, वे सभी झूठे साबित हुए। इसके बाद उन्होंने अपने समाज में वापस लौटने का निर्णय लिया और गांव के बुजुर्गों तथा प्रमुख लोगों से इस विषय पर चर्चा की।

गांव के एक बुजुर्ग ने बताया कि पांच वर्ष पहले गांव का यही एक परिवार क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट हुआ था। जब लेंबु हांसदा और उनके परिवार के अन्य सदस्यों ने घरवापसी की इच्छा जताई, तब समाज के लोगों ने बैठक कर इस पर सहमति दी। इसके बाद पारंपरिक सांथाली रीति-रिवाजों के अनुसार उनका पुनः समाज में स्वागत किया गया। ग्रामीणों के अनुसार यह केवल घर वापसी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जन्म की प्रक्रिया मानी जाती है।

पारंपरिक तरीके से हुई घरवापसी
सांथाली परंपरा में घरवापसी को ‘पुनर्जन्म’ के रूप में देखा जाता है। इसी मान्यता के तहत गांव के खेत में करीब तीन फुट गहरा गड्ढा खोदा गया। परिवार के सदस्य उस गड्ढे में प्रवेश किए और नवजात शिशु की तरह रोते हुए बाहर निकले। बाहर निकलते समय ग्रामीणों ने उन पर चावल छिड़के। एक अन्य प्रतीकात्मक अनुष्ठान में उनकी कमर में बांधी गई कमल की डंडियों को नाल का प्रतीक मानकर विधिवत काटा गया, जो उनके पूर्व धार्मिक पहचान से अलग होने और समुदाय के भीतर नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक था।

इसके बाद परिवार को घर लाया गया, जहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत ‘नाभि संस्कार’ सम्पन्न किया गया। ग्रामीणों ने प्रतीकात्मक रूप से घर की छत को पीटा और फिर पूरे परिवार का ‘एकौइशिया’ संस्कार आयोजित किया गया। इसके बाद परिवार के सदस्यों का मुंडन कराया गया, उन्हें नए वस्त्र पहनाए गए और पवित्र लेप छिड़ककर पुनः सांथाली समाज में शामिल किया गया। घरवापसी के उपलक्ष्य में लेंबु हांसदा के परिवार की ओर से सामूहिक भोज का आयोजन भी किया गया। भोज में पारंपरिक हांड़िया पेय परोसा गया । ग्रामीणों ने परिवार की घरवापसी का स्वागत करते हुए इसे अपनी संस्कृति और परंपरा की पुनर्स्थापना बताया।

कन्वर्जन को लेकर फिर उठे सवाल
इस घटना के बाद स्थानीय स्तर पर कन्वर्जन और ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों का आरोप है कि जनजातीय इलाकों में बीमारी, गरीबी और अशिक्षा का फायदा उठाकर लोगों को बहला-फुसलाकर मजहब परिवर्तन कराया जा रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार के कनवर्जन से जनजातीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक संरचना प्रभावित हो रही है। उनका आरोप है कि विदेशी फंडिंग के जरिए जनजातीय समाज में मजहब परिवर्तन को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे सामाजिक सौहार्द और भाईचारे पर भी असर पड़ रहा है। ग्रामीणों ने मांग की है कि गैरकानूनी कनवर्जन गतिविधियों की जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगी, तो जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक पहचान संकट में पड़ सकती है।

कानून के सख्त पालन की मांग
उल्लेखनीय है कि ओडिशा फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट के तहत बल, प्रलोभन या धोखे से कराए गए मजहब परिवर्तन पर रोक लगाने का प्रावधान है। हालांकि स्थानीय संगठनों का आरोप है कि कानून होने के बावजूद उसका प्रभावी तरीके से पालन नहीं हो रहा है। सामाजिक संगठनों ने राज्य सरकार से मांग की है कि गैरकानूनी कनवर्जन रोकने के लिए बने कानून को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपरा और धार्मिक पहचान सुरक्षित रह सके।

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