
नई दिल्ली | देश की राजधानी दिल्ली के लाल किला मैदान में रविवार को जनजाति सांस्कृतिक समागम भव्य आयोजन ने जनजातीय गौरव का एक नया अध्याय लिख दिया। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित इस विशाल ‘जनजातीय महाकुंभ’ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। साथ ही कई अन्य मंत्री, सांसद और दिल्ली व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भी शामिल हुए।
इस जनजाति सांस्कृतिक समागम का मूल उद्देश्य मिशनरियों और अन्य द्वारा किए जा रहे मतांतरण (कन्वर्जन) के खिलाफ सनातन संस्कृति से जुड़ाव और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना था। इस दौरान पूरे समागम में “तू-मैं एक रक्त, वनवासी-ग्रामवासी-नगरवासी” का मूल नारे की गूंज सुनाई देती रही।
उलगुलान के बाद सबसे बड़ी सांस्कृतिक चेतना
गृहमंत्री ने समागम में लाखों की संख्या में उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि यह कोई आम आयोजन नहीं है, बल्कि भगवान बिरसा मुंडा के ‘उलगुलान’ (क्रांति) के बाद देश को सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में पिरोने वाला सबसे बड़ा आंदोलन है।
“मैंने भगवान बिरसा मुंडा को देखा नहीं, लेकिन आज इस महाकुंभ में उपस्थित वनवासी भाइयों की आंखों में उनके संघर्ष की वही चमक और आत्मा जीवंत दिखाई दे रही है। प्रकृति पूजन ही सनातन संस्कृति का मूल आधार है।”
– अमित शाह
अपने संबोधन में अमित शाह ने मतांतरण (Conversion) के मुद्दे पर कड़ा रुख अख्तियार किया। उन्होंने बिना नाम लिए मतांतरण कराने वालों चेतावनी दी जो जनजातीय समाज को उनकी जड़ों से काटने का प्रयास कर रही हैं।
गृहमंत्री ने अपने संबोधन में स्पष्ट कहा कहा- ‘हम अपने जंगलों पर किसी का कब्ज़ा नहीं होने देंगे’
उन्होंने कहा- संविधान हर व्यक्ति को अपने धर्म के साथ जीने का हक देता है, लेकिन लोभ-लालच की कोई जगह नहीं है। भगवान राम ने शबरी के बेर खाकर यह सिद्ध किया था कि वनवासी और सनातन समाज एक ही रक्त हैं।
शाह ने आह्वान किया कि समाज को उन भ्रांतियों से बचना होगा जो हमारे बीच भेद पैदा कर रही हैं।
इस ऐतिहासिक समागम में देशभर के 550 से अधिक अलग-अलग जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। जिनमे मुख्यतः मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, सहित अन्य राज्यों सहित सुदूर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से भी छोटा नागपुरी मूल के 12 जनजाति समूहों के 133 प्रतिनिधियों का विशेष दल भी शामिल रहा।
वैसे तो इस पूरे समागम कुंभ जैसा नजारा नजर आ रहा था, जिससे की संख्या का अनुमान लगाना मुश्किल है, लेकिन अगर दिल्ली पुलिस और ट्रैफिक विभाग के आधिकारिक अनुमानों तथा आयोजकों के अनुसार, लाल किला मैदान में 1.5 लाख (डेढ़ लाख) से अधिक जनजातीय भाई-बहन, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता और पारंपरिक समुदायों के लोग एकत्र हुए थे।
जनजाति सांस्कृतिक समागम स्थल लाल किला मैदान पहुंचने से पहले दिल्ली की सड़कों पर लगभग 13.3 किलोमीटर लंबे क्षेत्र को समेटती हुई भव्य जनजातीय शोभायात्रा निकाली गईं। जो कि राजघाट चौक, रामलीला मैदान, अजमेरी गेट चौक, कुदसिया बाग (कश्मीरी गेट), और श्यामगिरि मंदिर से होते हुए लाल किला मैदान तक पहुंची। वहीं दिल्ली वासियों से जगह जगह पुष्पवर्षा कर वनवासी भाई बहनों का भव्य स्वागत किया।
विविधता का महासंगम: शोभायात्रा के दौरान पूरा मार्ग भारत की अनूठी जनजातीय सांस्कृतिक विविधता से सराबोर दिखा। पारंपरिक वेशभूषा, तीर-धनुष, पारंपरिक आभूषण और लोक वाद्यों से लैस हजारों लोक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति दी।
राजधानी में गूंजा एकता और देशभक्ति का स्वर: पूरी शोभायत्रा के दौरान “भारत माता की जय”, “वंदे मातरम” और “जय जोहार-जय बिरसा” के नारे गूँजते रहे।
अस्मिता की हुंकार (यूसीसी और मतांतरण): इस समागम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यह केवल एक उत्सव नहीं था, बल्कि जनजातीय समाज के वनाधिकार, शिक्षा, रोजगार और डी-लिस्टिंग (मतांतरित वनवासियों को आरक्षण की सूची से बाहर करने) जैसे गंभीर मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करने का एक वैचारिक मंच भी बना।
कार्यक्रम में “तू और मैं एक रक्त हैं” के मंत्र के साथ अमित शाह ने जनजातीय समाज से 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनाने के संकल्प में जुड़ने का आह्वान किया।
आवास व्यवस्था: इस आयोजन में देशभर से भाग लेने पहुंचे विभिन्न जनजाति समूहों के लिए दिल्ली के 79 विभिन्न स्थानों पर आवासीय व्यवस्थाएँ की गयी थी।
आयोजक समिति: जनजाति सांस्कृतिक समागम को प्रकाश उईके, महेश भाग चन्दका, अशोक कुमार गोंड के साथ सैकड़ों सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों ने दिन-रात एक कर अपने परिश्रम से इसे भव्य और सफल बनाया ।
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