अमेरिका में गूंजी थी ‘गदर’ की हुंकार, आज वहीं से उठ रहा भारत विरोधी नैरेटिव? जानिए करतार सिंह सराभा की कहानी
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अमेरिका में गूंजी थी ‘गदर’ की हुंकार, आज वहीं से उठ रहा भारत विरोधी नैरेटिव? जानिए करतार सिंह सराभा की कहानी

अमेरिका से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की गर्जना करने वाले महारथी करतार सिंह सराभा की आज जयंती है।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Mahak Singh
May 24, 2026, 01:06 pm IST
in भारत
Kartar singh sarabah jayanti

करतार सिंह सराभा

अमेरिका से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की गर्जना करने वाले महारथी करतार सिंह सराभा की आज जयंती है। अभी चार दिन पहले अमेरिका में ही कथित रूप से अध्ययन के लिए गए आम आदमी पार्टी के आई.टी. सेल के सरगना और अर्बन नक्सली अभिजीत दिपके ने दुश्मन देशों के समर्थन से भारत में विद्रोह और अराजकता फैलाने के लिए “कॉकरोच जनता पार्टी” की स्थापना की। यह विडंबना देखिए कि एक ओर भारत की स्वतंत्रता के लिए अमेरिका के सेन फ्रांसिस्को में सन् 1913 में लाला हरदयाल और सोहन सिंह भकना “गदर” पार्टी की स्थापना करते हैं, जिसमें करतार सिंह सराभा पूर्णाहुति देते हैं, वहीं दूसरी अमेरिका के बोस्टन में रह रहे अभिजीत दिपके भारत में अराजकता फैलाने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी की स्थापना करता है। अतः देश के युवाओं को यह समझना पड़ेगा कि कौन देशप्रेमी था और कौन देशद्रोही है?

विदेशों से संचालित भारत विरोधी नैरेटिव पर वामपंथी युवाओं को भड़काने का आरोप

भारत से विदेशी सत्ता को उखाड़ने के लिए इंग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और स्विट्जरलैंड जैसे देशों से श्याम जी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर वीर सावरकर, मदन लाल धींगरा, लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना, करतार सिंह सराभा और भीकाजी कामा जैसे अनेक क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल फूंका था, उसी देश को बर्बाद करने और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए वामपंथियों ने विदेश में बैठे भारत के दुश्मनों की शह पर युवाओं को दिशाभ्रमित कर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को जन्म दिया। जिसका उद्देश्य भारत में अशांति और अराजकता फैलाकर उसे तोड़ना है। अमेरिका से अभिजीत दिपके, जर्मनी से ध्रुव राठी और ऑस्ट्रेलिया से अर्पित शर्मा इसके सूत्रधार प्रतीत होते हैं। ये तीनों क्रांतिकारी नहीं वरन् परजीवी कॉकरोच हैं, जो ये चाहते हैं कि भारत में सुव्यवस्थित शासन तंत्र  को छिन्न -भिन्न किया जाए। इसके लिए युवा आंदोलित होकर रैलियां निकालें और तोड़फोड़ कर, अराजकता फैलायें, फलस्वरूप ये डॉलर कमाएं, अपनी रीच बढ़ाएं और समय आने में सत्ता प्राप्त कर सकें। इसलिए इन तथाकथित कॉकरोचों को निष्क्रिय करना ही भारत के लिए श्रेयस्कर होगा।

महान क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा का जीवन युवाओं के लिए राष्ट्रभक्ति

करतार सिंह सराभा के जीवन दर्शन को युवाओं के लिए जानना अत्यंत आवश्यक और प्रासंगिक है। महान् क्रांतिकारी स्वतंत्रता संग्राम के अद्भुत एवं अद्वितीय नायक, अंग्रेजों के लिए भय का पर्याय करतार सिंह सराभा – सरदार भगत सिंह के आदर्श थे। आधुनिक भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अद्भुत एवं अद्वितीय नायक थे। आधुनिक भारत में सन् 1857 से सन 1947 तक, स्वतंत्रता संग्राम के 3  प्रमुख सोपान हैं- प्रथम सोपान सन् 1857 का स्वतंत्रता संग्राम जो कतिपय भारतीय गद्दार सामंतों के अंग्रेजों के साथ मिल जाने के कारण असफल हुआ पर बावजूद इसके राष्ट्रीयता के सुनहरे बीज को रोपित कर गया, जिसे अंग्रेजों के साथ मिलकर परजीवी इतिहासकारों और वामपंथियों ने “चोर चोर मौसेरे भाई” की कहावत के आलोक में स्वतंत्रता संग्राम को विभिन्न प्रकार से उपमायें देकर नकार दिया और “गदर” जैसे शब्दों का नाम देकर उसके महत्व को कम किया, इसलिए तो अमेरिका में भारत के स्वतंत्रता संग्राम हेतु जिस दल का गठन किया उसका नाम लाला हरदयाल ने “गदर” रखा और समाचार पत्र का भी! इसी के महानायक थे “करतार सिंह सराभा”।  उनका जन्म 24 मई 1896 और बलिदान 16 नवंबर सन् 1915 (19 वर्ष 6 माह की उम्र में फांसी) को हुआ। आपकी माताश्री का नाम माता साहिब कौर पिताश्री का नाम मंगल सिंह था।

क्रांतिकारी राष्ट्रवाद ने सशस्त्र संघर्ष के बल पर स्वतंत्रता आंदोलन

इतिहास के विद्यार्थी होने के नाते मेरे दृष्टिकोण से सन् 1857 के  स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम सोपान के बाद 1947 तक स्वतंत्रता प्राप्ति के  लिए स्वतंत्रता संग्राम के 2 समानांतर सोपान रहे हैं, प्रथम – क्रांतिकारी राष्ट्रवाद – जो मुखर होकर अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र  संग्राम कर स्वतंत्रता प्राप्ति कर भारतीयों के वीरोचित विजय दिलाने में विश्वास रखते थे। इस श्रंखला में सुनियोजित परंपरा के नायक करतार सिंह सराभा से लेकर रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, मास्टरदा, प्रीतिलता, और फिर सैलाब के रूप में महानायक सुभाषचंद्र बोस के साथ उभरते हैं। इस सोपान में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की संख्या लाखों में है, जो स्वतंत्रता संग्राम के वास्तविक नायक थे परंतु अंग्रेजी इतिहासकारों और देशी परजीवी इतिहासकारों के साथ वामपंथियों ने इनके इतिहास और योगदान को धूमिल किया है जिसकी सजा इनको मिलेगी।

द्वितीय सोपान- उदार राष्ट्रवाद का था जिसमें कभी – कभी मौसम के बदलने के साथ गर्माहट भी आती जाती रहती थी पहले अंग्रेजों के समर्थन में स्वराज्य चाहते थे, फिर महा महारथी लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल बरतानिया सरकार के विरुध्द उग्र हुए साथ ही स्वाधीनता संग्राम का मोर्चा संभाल लिया परंतु चाटुकारों की फौज ने इनके साथ भी धोखा किया। परंतु प्रथम सोपान वालों को तो श्रेय तो छोड़िये, आतंकवादियों का तक तमगा दिया गया अब इस विषय पर फिर किसी दिन लिखना प्रासंगिक होगा।

लाला हरदयाल के आह्वान पर करतार सिंह सराभा ने क्रांतिकारी जीवन का संकल्प लिया

आज तो करतार सिंह सराभा जी का दिन है.. हाँ! मैट्रिक की परीक्षा के बाद उच्च शिक्षा के लिए करतार सिंह सराभा अमेरिका निकल गये। परंतु किस्मत में तो स्वतंत्रता संग्राम के महान् महारथी होना लिखा था, नियति ने करवट बदली और जब 25 मार्च सन् 1913 के दिन लाला हरदयाल सेन फ्रांसिस्को भाषण दे रहे थे, तब अंत में उन्होंने कहा कि कौन अपने प्राणों की आहुति देगा? फिर क्या था करतार सिंह सराभा ने कहा कि “मैं दूंगा”और इस दिन हुआ करतार सिंह सराभा का नया अवतार।आनन-फानन में अमेरिका और कनाडा में 8 हजार भारतीयों को सदस्य बना लिया गया और युद्ध की तैयारी आरंभ हो गयी।

विश्व युद्ध के दौरान करतार सिंह सराभा ने क्रांति का बिगुल फूंका

प्रथम विश्व युद्ध 1914 में आरंभ हो गया, इसी का लाभ उठाते हुए भारत में अंग्रेजों पर आक्रमण करने के करतार सिंह सराभा के निर्देशन में 4 हजार स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने भारत की ओर कूच किया, परन्तु हाय रे! दुर्भाग्य भारत के कुछ नामी-गिरामी गद्दारों ने इस योजना को अंग्रेजों को बता दिया। फलस्वरूप धरपकड़ी हुई आधे से अधिक क्रांतिकारी पकड़े गये लेकिन करतार सिंह सराभा बच निकले और जालंधर पहुंचे, जहां रासबिहारी बोस और शचीन्द्र नाथ सान्याल से मिले और योजना बनायी। पुराने साथी बिछड़ गये इसलिए करतार सिंह सराभा ने पंजाब की सभी सैनिक छावनियों में जाकर स्वतंत्रता के युद्ध के लिए सैनिकों को अपनी ओर करने का अभियान चलाया। अभियान गति पर था परन्तु फिर धोखा हुआ गद्दारों ने खबर कर दी और करतार सिंह सराभा को वैसे ही घेरा जैसे वीर अभिमन्यु को घेरा गया था। अंग्रेज़ बहुत खौफजदा थे इसलिए जेल में एक फौजी टुकड़ी 24 घंटे उनकी निगरानी करती थी।

करतार सिंह सराभा पर लाहौर षड्यंत्र के नाम से प्रकरण चलाया गया, उनके साथ 63 अन्य क्रांतिकारियों पर भी मुकदमा चलाया गया था। करतार सिंह पर हत्या, डाका और शासन को उलटने का अभियोग लगाया गया था। प्रकरण में 24 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दी गई परन्तु अपील करने पर सात क्रांतिकारियों की फांसी की सजा को स्थिर रखा गया था। उन सातों क्रांतिकारियों के नाम थे -करतार सिंह सराभा, विष्णु पिंगले, काशीराम, जगत सिंह, हरिनाम सिंह, सज्जन सिंह और बक्शीश सिंह। बरतानिया सरकार को करतार सिंह सराभा से किस प्रकार भय था,इसका अनुमान जज के निर्णय से लगाया जा सकता है। जज ने अपने फैसले में करतार सिंह सराभा के लिए लिखा था कि ” इस युवक ने अमेरिका से लेकर हिंदुस्तान तक अंग्रेजी शासन को उलटने का प्रयत्न किया है।इसे जब और जहाँ भी अवसर मिला, अंग्रेजों को हानि पहुंचाने का प्रयत्न किया।इसकी अवस्था बहुत कम है,किंतु अंग्रेजी शासन के लिए बड़ा भयानक है।”

आखिर बलिदान का दिन आ ही गया, उन्होंने कहा था कि “जज साहब मुझे फांसी ही देना.. मैं पुनर्जन्म में विश्वास करता हूँ और तब तक जन्म लेता रहूंगा जब तक की मेरा देश स्वतंत्र न हो जाए” -भारत माता की जय। देश तो स्वतंत्र हो गया पर अभी इनके साथ न्याय नहीं हुआ है और न्याय यही है कि इनकी पूजा करें, इनके योगदान को याद करें, इतिहास के पुनर्लेखन में सहयोग करें। इतिहास का पुनर्लेखन जारी है, इसी कड़ी में यह शब्दांजलि अर्पित है। करतार सिंह सराभा एक महान् क्रांतिकारी कवि और शायर थे उनकी,यह गज़ल भगत सिंह को बेहद प्रिय थी, वे इसे अपने पास हमेशा रखते थे और अकेले में अक्सर गुनगुनाया करते थे। श्रद्धांजलि स्वरुप प्रस्तुत है – 

“यहीं पाओगे महशर में जबां मेरी बयाँ मेरा,
मैं बन्दा हिन्द वालों का हूँ है हिन्दोस्तां मेरा;
मैं हिन्दी ठेठ हिन्दी जात हिन्दी नाम हिन्दी है,
यही मजहब यही फिरका यही है खानदां मेरा;
मैं इस उजड़े हुए भारत का यक मामूली जर्रा हूँ,
यही बस इक पता मेरा यही नामो-निशाँ मेरा;
मैं उठते-बैठते तेरे कदम लूँ चूम ऐ भारत!
कहाँ किस्मत मेरी ऐसी नसीबा ये कहाँ मेरा;
तेरी खिदमत में अय भारत! ये सर जाये ये जाँ जाये,
तो समझूँगा कि मरना है हयाते-जादवां मेरा!”

अंत में यही कि जब भी भारत को बदनीयती से हानि पहुंचाने के लिए  परजीवी कॉकरोच पैदा होंगे, तब उनके उपचार के लिए करतार सिंह सराभा का कृतित्व और व्यक्तित्व भारत के युवाओं के लिए सदैव मार्गदर्शी और कालजयी रहेगा। करतार सिंह सराभा की प्रेरणा से युवाओं में यही स्वर मुखरित होना चाहिए कि-

“देश से है प्यार तो,
हर पल ये कहना चाहिए,
मैं रहूं या ना रहूं,
भारत ये रहना चाहिए।
सिलसिला ये बाद मेरे,
 यूँ ही चलना चाहिए,
मैं रहूं या ना रहूं 
भारत ये रहना चाहिए।
जय हिंद, जय भारत

Topics: Sardar Bhagat SinghKartar Singh SarabhaRevolutionary NationalismKartar Singh Sarabha JayantiIndian Freedom MovementIndia's Independence MovementLahore Conspiracy CaseKartar Singh Sarabha BiographyIndian Revolutionary
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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