प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 21 मई की सुबह पांच देशों (संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली) की यात्रा पूरी कर नई दिल्ली लौट आए। उनकी इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी सहयोग, जलवायु परिवर्तन और रक्षा साझेदारी को मजबूत करना था। उनकी यात्रा की शुरुआत 15 मई को संयुक्त अरब अमीरात से हुई। पश्चिम एशिया में बढ़ते ऊर्जा संकट से निकलने के लिए स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व में 3 करोड़ बैरल कच्चे तेल का योगदान देने और एलपीजी आपूर्ति के लिए दोनों देशों ने हस्ताक्षर किए। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद नाहयान ने होर्मुज से सुरक्षित आवाजाही की वकालत की।
प्रधानमंत्री मोदी नीदरलैंड की यात्रा पर भी गए, जहां उन्हें सांस्कृतिक, कूटनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में बड़ी सफलताएं मिलीं। वहां की सरकार ने 11वीं सदी की चोल साम्राज्य की ताम्र पट्टिकाएं भी भारत को सौंप दीं। प्रधानमंत्री ने स्वीडन की दो दिन की यात्रा की। स्वीडन की उनकी यात्रा के कई महत्वपूर्ण परिणाम निकले, जो द्विपक्षीय संबंधों को एक नई गति प्रदान करेंगे।
नॉर्वे के मीडिया पर उठे प्रश्न
नॉर्वे के एक समाचार पत्र द्वारा इस बीच प्रधानमंत्री मोदी का आपत्तिजनक व्यंग चित्र प्रकाशित किया गया जिसके बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया व सोशल मीडिया जगत ने इसे नस्लवादी पूर्वाग्रह का उदाहरण माना। इसी प्रकार नॉर्वे की एक पत्रकार हेले लिंग स्वेनसेन ने ओस्लो में भारत से जुडे प्रश्नों को जिस ढंग से उठाया, उससे यह प्रभाव बना कि उन्होंने दोनों देशों के राजनयिकों द्वारा तय संवाद-व्यवस्था की सीमा लांघी है। इसके बाद भारतीय मीडिया के एक वर्ग और कुछ राजनीतिक दलों ने भी इसे हल्की राजनीति का विषय बनाने की कोशिश की। किंतु गंभीर दृष्टि से यह मामला केवल प्रेस-स्वतंत्रता का नहीं, बल्कि पत्रकारिता की मर्यादा, संदर्भ और पारस्परिकता का भी था। पत्रकार को यह स्मरण रखना चाहिए था कि वह देगसाविसेन नामक जिस समाचारपत्र से जुडी हैं, वह आज भले स्वयं को स्वतंत्र समाचारपत्र कहता है, किंतु ऐतिहासिक रूप से नॉर्वेजियन लेबर पार्टी का मुखपत्र रहा है। साठ और सत्तर के दशक तक उसका इस दल से स्पष्ट राजनीतिक संबंध रहा। इसलिए स्वतंत्र पत्रकारिता का दावा करते समय अपने संस्थान के राजनीतिक इतिहास को भी खुलेआम स्वीकार करना चाहिए।
नॉर्वे को भारत में अल्पसंख्यकों और मानवाधिकारों पर प्रश्न उठाने से पूर्व, उसी कसौटी पर नॉर्वे के भीतर बाल-कल्याण सेवा द्वारा बच्चों को परिवार से अलग करने, प्रवासी परिवारों की सांस्कृतिक परवरिश में राज्य के हस्तक्षेप, अफ्रीकी मूल के लोगों के साथ भेदभाव और सामी आदिवासी अधिकारों जैसे विषय भी वैश्विक समुदाय की चिंता रहे हैं। यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय ने भी नॉर्वे के कुछ बाल-कल्याण मामलों में परिवार-जीवन के अधिकार पर सवाल उठाए हैं। इसलिए पत्रकार प्रश्न पूछतीं, पर उपदेशात्मक या राजनीतिक मुद्रा से बचतीं, तो अधिक संतुलित होता। मानवाधिकार या मीडिया विमर्श एकतरफा नहीं, परस्पर आत्ममंथन वाला होना चाहिए।
स्वीडन के बाद प्रधानमंत्री ने नॉर्वे का दौरा किया। इस दौरान भारत को आर्थिक, रणनीतिक, तकनीकी और कूटनीतिक मोर्चों पर कई बड़ी उपलब्धियां हासिल हुईं। भारत-नॉर्डिक संयुक्त वक्तव्य में आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद और सीमापार आतंकवाद की स्पष्ट निंदा हुई। नॉर्डिक देशों ने पहलगाम और लाल किला आतंकी घटनाओं की भी कड़ी निंदा की। साथ ही व्यापार, हरित साझेदारी, समुद्री सहयोग, प्रौद्योगिकी और स्वच्छ ऊर्जा सहयोग आगे बढ़ा। अपनी यात्रा के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री इटली पहुंचे।
उन्होंने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से कई मुद्दों पर सार्थक बात की। दोनों देशों ने द्विपक्षीय सहयोग को और गहरा और समृद्ध बनाने पर सहमति जताई। प्रधानमंत्री की इन पांच देशों की यात्रा से भारत में लगभग 40 अरब डॉलर (करीब 3.85 लाख करोड़) के निवेश की प्रक्रिया शुरू हुई है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने प्रमुख क्षेत्रों में नए निवेश और विस्तार योजनाओं का वादा किया। अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने 50 से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और वरिष्ठ प्रतिनिधियों के साथ बैठकें कीं। इनमें सेमीकंडक्टर, लॉजिस्टिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र शामिल थे।

















