कॉकरोच कॉकटेल : लोकतंत्र, मीम और माचिस की तीली
June 12, 2026
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कॉकरोच कॉकटेल : लोकतंत्र, मीम और माचिस की तीली

देश में अचानक उभरे 'कॉकरोच विमर्श' (CJP) और मीम पॉलिटिक्स के पीछे क्या कोई पुराना वॉररूम और टूलकिट है? न्यायपालिका की टिप्पणी को संदर्भ से काटकर देश में अराजकता फैलाने की इस क्रूर राजनीतिक व्यूहरचना, विदेशी बॉट्स का सम्पूर्ण विश्लेषण

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
May 21, 2026, 06:54 pm IST
in विश्लेषण, सम्पादकीय
Cockroach Cocktail Meme Politics CJP Exposed

प्रतीकात्मक चित्र

भारत अद्भुत देश है। यहां पत्थर में देवत्व देखा जाता है, वृक्ष में प्राण, नदी में माता, पर्वत में पुरखा और पशु पक्षी में प्रकृति का संदेश। इसलिए यदि सनातन के देश में एक पुरातन जीव कॉकरोच पर राष्ट्रीय विमर्श उठ खड़ा हुआ है, तो इसमें आश्चर्य नहीं, रस है। यह वही देश है जहां कछुआ अवतार भी है, मत्स्य अवतार भी है, नाग पंचमी भी है, वट सावित्री भी है, तुलसी विवाह भी है और चींटी को आटा डालने वाली दादी भी है। ऐसे देश में कॉकरोच की चर्चा हो रही है, तो प्रकृति विज्ञान, पुराण, राजनीति और सोशल मीडिया सब एक साथ चाय की मेज पर बैठ गए हैं।

मगर समस्या कॉकरोच नहीं है। समस्या यह है कि भीड़ में कॉकरोच छोड़ा किसने। किसने एक अदालती टिप्पणी को संदर्भ से काटकर डिजिटल चप्पल, डिजिटल झाड़ू और डिजिटल नारे में बदलने की कोशिश की। मुख्य न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने बाद में स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी बेरोजगार युवाओं पर नहीं, बल्कि कथित फर्जी-जाली डिग्री लेकर पेशों में घुसने वालों पर थी। यानी निशाना युवा नहीं बल्कि संस्थागत शुचिता को दीमक की तरह खाने वाली प्रवृत्ति थी।

संस्थानों में सेंध लगाने वाले और संवैधानिकता पर हमला करने वाले घुसपैठिये थे।

किन्तु राजनीति की मंडी में संदर्भ सबसे सस्ता माल है। वहां वाक्य का सिर अलग बिकता है, धड़ अलग बिकता है और पूंछ को क्रांति की पताका बना दिया जाता है।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और डिजिटल कारीगरी

इसी से जन्म हुआ कॉकरोच जनता पार्टी का। नाम में व्यंग्य, लोगो में शरारत, भाषा में Gen Z की खुजली और पीछे डिजिटल राजनीति का पुराना कारीगर। यह कोई सड़क किनारे अचानक फूटा जनक्रोध नहीं था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार CJP को जिस अभिजीत दिपके ने शुरू किया वह 2020 से 2023 तक आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम से जुड़ा रहा है। यानी सर से पूंछ तक सांप बहुत लंबा है।

दिल्ली चुनावों में कई मंडी सजाने और हवा बनाने से यह नाम जुड़ा। बाद में Boston University में public relations की पढ़ाई और विदेशी तार-व्यवहार की भी कहानियों की परतें उघड़ रही हैं। CJP ने कुछ ही दिनों में लाखों सदस्य और इंस्टाग्राम पर करोड़ के आसपास followers जुटाने का दावा और दिखावा किया। यह डिजिटल उछाल अपने आप में राजनीतिक अध्ययन का विषय है।

अब यहां पहला प्रश्न खड़ा होता है। यदि यह युवा का स्वतःस्फूर्त आक्रोश है, तो इसकी वेबसाइट, घोषणा पत्र, गाना, मीम के समीकरण, मीडिया की टाइमिंग और राजनीति की छलांगें (political amplification) इतने सुव्यवस्थित कैसे है जैसे कोई जंगली जानवर घात लगाकर बैठा हो।

पीड़ा बनाम राजनीतिक पटाखा

और यदि यह सुव्यवस्थित है, तो इसे केवल बेरोजगार युवा का भावनात्मक विस्फोट कहकर क्यों बेचा जा रहा है। भारत के युवाओं की पीड़ा कुछ सच है। बेरोजगारी, परीक्षा प्रणाली, भर्ती विलंब, पेपर लीक और अवसर असमानता गंभीर विषय हैं। लेकिन पीड़ा को मंच देना और पीड़ा को राजनीतिक पटाखा बनाकर न्यायपालिका की खिड़की पर फोड़ना दो अलग बातें हैं।

अभिजीत दिपके का प्रोफाइल यहीं दिलचस्प हो जाता है। वह राजनीतिक रूप से निर्वात में पैदा कोई डिजिटल साधु नहीं है। राजनीतिक संचार का विद्यार्थी और पैंतरेबाजों के पोसा हुआ हैं। उस तरकश में मीम को हथियार, नारे को पैकेजिंग और आहत भाव को ‘एंगेजमेंट’ में बदलने वाले जहर बुझे तीर है। राजनीतिक शत्रुओं के बीच तीरंदाजी लोकतंत्र में वैध भी हो सकती है, किन्तु तभी जब वह पारदर्शी हो। लेकिन जब वही धूर्तता खुद को निष्पक्ष बताते हुए युवा विद्रोह का ढाल-कवच ओढ़कर निर्दोष आक्रोश के रूप में सामने आती है, तब सवाल बनता है। क्या यह सचमुच कॉकरोचों की स्वतःस्फूर्त कतार है, या किसी पुराने ‘वॉररूम’ से निकालकर दीवार पर चिपकाया नया पोस्टर।

बुजुर्ग पार्टी और वामपंथी प्रेत

एक तरफ बुजुर्ग पार्टी है। उसके कंधों पर वामपंथी प्रेत अभी भी बैठे हैं। त्रिपुरा और बंगाल में अपनी ही विचारधारा की राख देखकर भी यह प्रेत चैन से नहीं बैठा। केरल में अपनी लंका को खुद अंगारे दिखाकर भी उसे लगता है कि क्रांति अभी अधूरी है। CPI का शताब्दी वर्ष 2025 में आया, क्योंकि पार्टी अपनी स्थापना 26 दिसंबर 1925 कानपुर सम्मेलन से मानती है। सौ साल की यात्रा के बाद भी अगर राजनीति का सबसे बड़ा कौशल आग को विचार और उपद्रव को जनांदोलन बताना ही रह जाए, तो यह विचार नहीं, इतिहास की हिचकी है।

वहीं बुजुर्ग पार्टी का बुढाता युवराज इस प्रेत की छाया में संविधान का गुटका संस्मरण लेकर घूमता है। उसे लगता है कि लोकतंत्र जीवंत नहीं हुआ, बल्कि उसके परिवार की पुश्तैनी कुर्सी छीन ली गई है। वह देश में हर जगह पेट्रोल बिखरा देखता है और जेब में माचिस टटोलता है। उसके आसपास जेन-जी के मंजीरे बजाने वाले दरबारी हैं। उन्हें लगता है कि मंजीरों की ताल से युवराज भी प्रसन्न होगा और वामपंथी प्रेत भी। लेकिन इस देश का जेन ज़ी इन मंजीरों को पुराने रेडियो की खड़खड़ाहट की तरह सुनता है। वह देख रहा है कि जिन लोगों ने अपने संगठन नहीं संभाले, वे राष्ट्र की दिशा संभालने का दावा कर रहे हैं।

अराजकतावादी और डिजिटल नैतिकता

दूसरी ओर मदमस्त अराजकतावादी हैं। दिल्ली को शराब नीति की गंध से और पंजाब को चिट्टे की त्रासदी से जोड़कर देखे जाने वाले राजनीतिक चेहरे अब हर संस्था से नाराज हैं। अदालत प्रश्न पूछे तो गुस्सा। जांच एजेंसी पूछे तो बदला। चुनाव आयोग बोले तो षड्यंत्र। मीडिया पूछे तो बिकाऊ। न्यायाधीश पर सवाल उठाना लोकतंत्र में संभव है, मगर अदालत को भीड़ के पोस्टरों में घेरना लोकतांत्रिक असहमति नहीं, दबाव की राजनीति है। मई 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य AAP नेताओं को न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ कथित अपमानजनक पोस्ट के मामले में आपराधिक अवमानना नोटिस जारी किए। यह वही क्षण है जहां बात गंभीर हो जाती है।

इन अराजकतावादियों की डिजिटल नैतिकता भी अजब है। ईडी ने मनीष सिसोदिया पर 43 सिम कार्ड और 14 मोबाइल फोन उपयोग तथा फोन नष्ट करने के आरोप लगाए थे। केजरीवाल के आईफोन तक पहुंचने के लिए ईडी ने एप्पल से मदद मांगी थी, और मुद्दा था पासवर्ड छिपाना। स्वाति मालीवाल प्रकरण में बिभव कुमार के मामले में दिल्ली पुलिस ने फोन फ़ॉर्मेट होने और पासवर्ड न देने की यही बात अदालत में कही थी। ये सभी आरोप और प्रक्रियाएं अदालतों और जांच के दायरे की चीजें हैं, लेकिन कॉकरोच विमर्श में यह प्रश्न तो पूछा ही जाएगा कि जिन्हें पासवर्ड, फोन, सिम और डीवीआर की भूलभुलैया से इतना प्रेम है, वे युवाओं को पारदर्शिता का प्रवचन कैसे बेचते हैं।

प्रपंच के पैंतरे

  •  भावनाओं को तथ्यों पर भारी बना दो
  • आधे सच को पूरा सच बनाकर पेश करो
  •  पुराने वीडियो और तस्वीरों को नए घटनाक्रम से जोड़ दो
  •  फेक स्क्रीनशॉट बनाकर सूत्रों के नाम पर अफवाह फैलाओ
  •  भीड़ की मानसिकता पैदा करो, ताकि लोग सोचने से पहले प्रतिक्रिया दें
  •  हर मुद्दे को हम बनाम वे में बदल दो
  • तथ्य जांच करने वालों को ही पक्षपाती घोषित कर दो
  • एक ही झूठ को सौ बार दोहराओ, ताकि वही सच लगने लगे
  • ट्रोल आर्मी बनाओ, जो सवाल पूछने वालों को डराए
  •  हैशटैग के जरिए झूठा जनमत तैयार करो
  •  कटे-फटे वीडियो क्लिप से पूरी कहानी बदल दो
  • भ्रम फैलाने वाले यूट्यूब थंबनेल और हेडलाइन बनाओ
  •  एल्गोरिदम को समझकर गुस्सा और डर बेचो
  •  हर घटना में साजिश खोजो, ताकि अविश्वास बढ़े
  •  जो तथ्य एजेंडे के खिलाफ हों, उन्हें दबा दो
  • फर्जी विशेषज्ञ और नकली एनालिस्ट खड़े करो
  •  मीम और व्यंग्य के जरिए झूठ को मनोरंजन बना दो
  •  किसी भी आलोचना को हमले की तरह पेश करो
  •  लोगों को सूचना नहीं, उत्तेजना की लत लगाओ
  •  डिजिटल हिंसा को जनभावना का नाम दो
  • फर्जी पोल और एडिटेड डेटा से माहौल बनाओ
  •  अराजकता को जनजागरण कहकर वैधता दो­
  • नया विवाद खड़ा करो, ताकि असली मुद्दे दब जाएं
  •  लोगों का भरोसा संस्थाओं, मीडिया और न्याय प्रक्रिया से खत्म करो
  • समाज को इतने खांचों में बांट दो कि संवाद की जगह सिर्फ शोर बच जाए

वैश्विक इतिहास और रूपक

वैसे, कॉकरोच विमर्श का वैश्विक इतिहास भी कम रोचक नहीं है। रूस में कोर्नी चुकोव्स्की (Korney Chukovsky) की 1921 की बाल कविता ताराकनिशचे (Tarakanishche) यानी The Giant Cockroach में एक बड़ा मूंछों वाला कॉकरोच जानवरों को डराकर आतंक खड़ा कर देता है। बाद में इसे तानाशाही के रूपक की तरह पढ़ा गया, लेकिन समझना जरूरी है कि कविता वामपंथी तानाशाह स्टालिन के पूर्ण सत्ता केंद्र बनने की पृष्ठभूमि में यानी इससे पहले लिखी गई थी। जाहिर है रूसी स्मृति में मूंछों वाला कॉकरोच का डर उस तानाशाही और उदारता की बात करते हुए हास्यास्पद गलतियां करने वाली क्रूर सनक से भरी सत्ता का प्रतीक बन गया।

एक और बात, दिल्ली यूनिवर्सिटी में रूसी भाषा पढ़ने के वक्त सुनी रूसी कहावत की याद आती है। रूसी में тараканы в голове का अर्थ है सिर में कॉकरोच-कीड़ा, यानी सनक, अजीब उलझनें, मानसिक खुराफात। भारतीय राजनीति में यह मुहावरा किसी पर निजी हमला नहीं, बल्कि वैचारिक बीमारी का बढ़िया रूपक है। किसी के सिर में कॉकरोच हो सकते हैं, किसी के घोषणापत्र में, किसी के वॉररूम और व्यूहरचना में, और किसी के सोशल मीडिया डैशबोर्ड में। फर्क इतना है कि आम आदमी अपने सिर के कॉकरोच से परेशान होता है, राजनीतिक दल अपने सिर के कॉकरोच को ‘स्ट्रेटजी कंसलटेंट’ बना देता है।

बेलारूस में 2020 के प्रदर्शनों के दौरान अलेक्जेंडर लुकाशेंको (Alexander Lukashenko) के लिए कॉकरोच उपनाम चला। विरोधियों ने चप्पल तानते हुए स्लीपर रिवॉल्यूशन का प्रतीक खड़ा किया, जैसे चप्पल से कॉकरोच कुचलना है। यह चुकोवस्की की रूसी सांस्कृतिक छवि से जुड़ा था। वहां कॉकरोच वामपंथी तानाशाही सत्ता के विरुद्ध रूपक था। भारत में व्यंग्य उल्टा है। यहां कुछ लोग युवाओं के नाम पर कॉकरोच का झंडा उठाकर खुद सत्ता की सीढ़ी खोज रहे हैं। बेलारूस में चप्पल ऊपर उठी थी सत्ता के विरुद्ध। भारत में सवाल यह है कि चप्पल किसके हाथ में है और निशाना न्यायपालिका क्यों बन रही है।

वामपंथी रोग: निशाने पर कीट-पतंगे और पक्षी व जानवर

वामपंथी इतिहास में कीट पतंगों की कहानी और भी कड़वी है। माओ के चीन में Great Leap Forward यानी लम्बी छलांग के समय Four Pests Campaign चला। निशाने पर चूहे, मक्खियाँ, मच्छर और गौरैया थे। गौरैयों को मारने से सारा तानाबाना हिल गया, कीट बढ़े, फसलें प्रभावित हुईं और भीषण अकाल की त्रासदी में यह नीति भी एक मूर्खतापूर्ण कारण मानी गई। नई शोध चर्चाओं में गौरैया उन्मूलन के कामरेडी करतब को भारी फसल हानि और असंख्य मौतों से भी जोड़कर देखा गया है। यानी जो विचार स्वयं को वैज्ञानिक कहता था, उसने प्रकृति को आदेश देकर सुधरने को कहा और प्रकृति ने अकाल के रूप में उसका उत्तर दिया।

यही कुपढ़ वामपंथी रोग भारत में भी बार बार लौटता है। पहले नाम बदलो, फिर गुस्सा बढ़ाओ, फिर जत्थे बनाओ, फिर संवैधानिक संस्थाओं को खलनायक बताओ फिर भीड़ को सबसे बड़ा न्याय करने का लाइसेंस सड़क पर दे दो। माओ ने गौरैया को दुश्मन कहा, भीड़ ने गौरैया मारी, खेतों ने जवाब दिया। आज कोई न्यायपालिका को ‘इलीट’ कहता है, कोई चुनाव आयोग को कठपुतली, कोई मीडिया को पूरी तरह बिक हुआ, कोई युवा को झुंड की समझ (swarm intelligence) बताकर उपद्रव की दिशा में धकेलना और हिंसा की आग भड़काकर अपनी रोटियां सेंकना चाहते है। अराजकता को पोसने वाले विचार का इतिहास कहता है कि जब विचार प्रकृति, समाज और संस्था को कीट मानने लगे, तब अंत में मनुष्य ही कीड़ा-मकौड़ा बना दिया जाता है।

दो तरह के कॉकरोच

वैसे, कॉकरोच भी दो तरह के हैं। पहला वह है जो सोशल मीडिया पर देशभक्ति की बात करता है। (इस नए उफान के बीच यह फौज भी सोशल मीडिया पर अपना झंडा गाड़े दिखी।)

ऐसा कॉकरोच रात में पढ़ता है, दिन में काम ढूंढता है, नौकरी न मिले तो स्टार्टअप बनाता है, और मीम देखकर हंस भी लेता है। दूसरा वह है जो क्रांति की तिकड़म में आकाओं के इशारे पर किटकिट करता है, जिसकी मूंछों पर Tarakanishche की धौंस है और दिमाग में स्टालिन शैली का छोटा तानाशाह। पहला कहता है कि व्यवस्था सुधारो। दूसरा कहता है व्यवस्था फूंक दो। पहला कहता है कि पेपर लीक रोको। दूसरा कहता है कि सीधा अदालत को धमकाओ। पहला कहता है कि मुझे अवसर चाहिए। दूसरा कहता है कि मुझे अराजकता चाहिए।

युवा भारत की नई कथा

भारत का युवा वास्तव में दुनिया में कई लोगों की नजरों में चुभने वाली मगर भारत को मजबूत बनाने वाली एक अलग ही चीज कर रहा है। यह ऐसी बात है जो इन खूनी क्रांति के राजनीतिक गिरगिटों को फूटी आंख नहीं सुहाती। वह शोध कर रहा है, स्टार्टअप बना रहा है, देश समाज के नाम रोज नई उपलब्धियां जोड़ रहा है।

भारत में दिसंबर 2025 तक 2 लाख से अधिक DPIIT-recognised स्टार्टअप हो चुके थे। पेटेंट दर्ज कराने में पिछले दशक में 215 प्रतिशत वृद्धि हुई है और भारत की ग्लोबल इन्नोवेशन रैंकिंग यानी पूरी दुनिया में खोज की स्थिति 2015 की 81वीं स्थिति से 38वीं तक पहुंच चुकी है।

यह वही युवा है जिसे कोई आलसी कहकर बेचता है, कोई बेरोजगार कहकर च्यूंटी काटता और भड़काता है, कोई कॉकरोच कहकर अपने किनारे पड़ी राजनीति की ‘री पैकेजिंग’ करता है, लेकिन वही युवा ‘लैब, लैपटॉप, लॉन्च पैड, लोकल स्किल और उद्यमिता’ के मिश्रण देश की नई कथा लिख रहा है।

डिजिटल उछाल और विदेशी तार

अब बात सोशल मीडिया फ़ॉलोअर्स की। CJP के करोड़ों के आसपास फॉलोअर, कुछ ही दिनों में विस्फोटक वृद्धि, 50 पोस्ट के आसपास सामग्री और अचानक राष्ट्रीय बहस। NDTV ने 20 मई को 6.6 million followers की बात लिखी, India Today ने 21 मई को 10 million पार करने की रिपोर्ट दी, Economic Times ने जरा देर बाद करीब 13 मिलियन तक पहुंचने की बात कही। ऐसी बढ़त क्या ऑर्गेनिक है लोग सवाल उठा रहे हैं उनकी चिंताएं किनारे नहीं रखी जा सकतीं, क्योंकि राजनीति के खेल हम सब जानते हैं।

ऑरेंज इकोनामी की बात करने वाले देश में पेड़ प्रमोशन नेटवर्क एमप्लीफिकेशन और एल्गोरिथम की उठान के साथ राजनीति की व्यूह रचना को समझना अब आम लोगों के लिए भी अबूझ बात नहीं है। यूरोपीय यूनियन से इंग्लैंड को बाहर करने वाले ब्रिक्जिट का खेल और अमेरिका के पिछले इलेक्शन में ब्लैक लाइफ मैटर का राजनीतिक आंदोलन भी किस तरह नैतिकता के आवरण में लपेटा गया था यह क्रिस्टोफर वायली की अभद्र शीर्षक वाली किताब बहुत अच्छे से बताती है। तिलचट्टा पार्टी की छलांग के पीछे सार्वजनिक रूप से प्रमाणित ‘फ़ॉलोअर्स ज्योग्राफी’ और ‘बॉट ऑडिट’ की रिपोर्ट देखना आवश्यक है। अभी जानकारियां चल रही हैं मगर ऐसे में 35% बांग्लादेशी और 40% पाकिस्तानी फॉलोअर्स जैसी बातें यदि उठी भी हैं तो यह उठा पटक से भरे वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में गहरी चिंता की बात है।

लेकिन प्रश्न फिर भी बचता है। यदि किसी भारतीय मुद्दे पर असामान्य विदेशी सहयोग और उभार के तार हों, तो जांच का विषय है। यदि बॉट फार्म, खरीदे हुए फॉलोअर या सीमा पार के प्रोपेगेंडा नेटवर्क से जुड़ी है तो यह केवल में तक सिमटा ‘मजाक’ नहीं रहता, सूक्ष्मता से रचा गया इनफ्लुएंसर चक्रव्यूह और ‘घातक ऑपरेशन’ बन जाता है। वास्तविक टिड्डी दल कोई राष्ट्रीयता नहीं, बल्कि वह डिजिटल झुंड है जो ‘किसी के इशारे पर’ भारत के निर्वाचित लोकतंत्र और इसकी संवैधानिक संस्थाओं की साख-फसल चट करने निकलता है। भारत का जेन-ज़ी यह समझता है कि हर बड़ा डिजिटल मंच जनता नहीं होता, हर वायरल मीम आंदोलन नहीं होता, हर विदेशी पुष्टि स्वतंत्रता का प्रमाण नहीं होती।


जादुई आईना

बहरहाल, कॉकरोच विमर्श हमें एक रोचक जादुई आईना देता है। कॉकरोच निशाचर है, तो भारत का युवा भी 24 घंटे जागता है। वह रात में कोडिंग करता है, सुबह परीक्षा देता है, दोपहर में ‘इंटर्नशिप’ करता है, शाम को ‘रील्स’ देखता है और रात में देश की राजनीति की खाल भी खींचता है। कॉकरोच सर्वाहारी है, तो यह युवा भी सर्वाहारी है। यह अच्छी राजनीति को ग्रहण करेगा, बुरी राजनीति को पचा जाएगा और यह भारत विरोधी विमर्श को चट कर जाने की क्षमता भी रखता है।

इसलिए सावधान रहिए। सनातन के देश में कॉकरोच भी विमर्श बन सकता है, मगर हर कॉकरोच क्रांति नहीं होता। कुछ कॉकरोच रसोई में होते हैं, कुछ सिर में, कुछ धूर्त मंशाओं में, कुछ राजनीति के वॉर रूम में। और कभी कभी भीड़ में कॉकरोच छोड़ने वाला खुद ही सबसे बड़ा कीट निकल आता है। भारत का युवा चप्पल भी पहचानता है, झाड़ू भी, हथौड़ा भी, और माचिस भी। वह हंसेगा जरूर, मीम भी बनाएगा, लेकिन अंत में बताएगा कि भाई, मुझे पता है कि ‘खुराफात का कीड़ा’ किसके दिमाग में है।

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हितेश शंकर
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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