1986 अनंतनाग दंगे: "कांग्रेस और NC ने जलवाए मंदिर, हमने उनके 170 कार्यकर्ता पकड़े थे", मुज़फ्फर शाह का सनसनीखेज खुलासा
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1986 अनंतनाग दंगे: “कांग्रेस और NC ने जलवाए मंदिर, हमने उनके 170 कार्यकर्ता पकड़े थे”, मुज़फ्फर शाह का सनसनीखेज खुलासा

अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मुज़फ्फर शाह का बड़ा दावा- 1986 के अनंतनाग दंगों में कांग्रेस और NC ने मंदिर जलवाए थे। 170 कार्यकर्ता पकड़े गए थे। पढ़ें पूरी रिपोर्ट

Written byShivam DixitShivam Dixit
May 20, 2026, 10:30 pm IST
in भारत, विश्लेषण, मत अभिमत, जम्‍मू एवं कश्‍मीर
muzaffar shah explosive statement-anantnag riots 1986

नई दिल्ली | जम्मू-कश्मीर की राजनीति के सबसे रसूखदार परिवारों में से एक, शेख अब्दुल्ला के भतीजे और अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता मुज़फ्फर शाह ने एक ऐसा बयान दिया है जिससे जम्मू कश्मीर की सियासत में भूचाल आ सकता है।

मुज़फ्फर शाह ने सीधे तौर पर कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) पर 1986 के अनंतनाग दंगों के दौरान मंदिर जलवाने का गंभीर आरोप लगाया है। मुज़फ्फर शाह ने न केवल आरोप लगाए, बल्कि यह भी दावा किया कि उस समय इन दोनों पार्टियों के दर्जनों कार्यकर्ताओं को रंगे हाथों पकड़ा गया था।

“170 लोग पकड़े गए, जिनमें कांग्रेस और NC के कार्यकर्ता शामिल थे”

फेसबुक पर वायरल एक वीडियो में एक चर्चा के दौरान मुज़फ्फर शाह ने 1986 अनंतनाग के उन दर्दनाक दंगों की परतों को खोलते हुए कहा कि मंदिरों को जलाने की साजिश राजनीतिक थी।

उन्होंने आंकड़ों के साथ दावा करते हुए कहा-

“1986 के अनंतनाग दंगों में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने मंदिर जलवाएं। उस वक्त हमने 170 आदमियों को पकड़ा था। उनमें से लगभग 100 से सवा सौ लोग कांग्रेस के थे और बाकी नेशनल कॉन्फ्रेंस के लोग थे।”

मुज़फ्फर शाह के खुलासे के मुख्य बिंदु:

  • राजनीतिक साजिश: 1986 के दंगों को कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने हवा दी थी।
  • मंदिरों को निशाना बनाया: दंगाई भीड़ ने मंदिरों को आग के हवाले किया, जिसके पीछे सुनियोजित राजनीति थी।
  • पकड़े गए कार्यकर्ता: पकड़े गए 170 लोगों में से बहुमत (125 के करीब) कांग्रेस के थे, जबकि शेष फारूक अब्दुल्ला की पार्टी NC के थे।

“मुख्यमंत्री की कुर्सी को मैंने ठोकर मार दी”

अपने राजनीतिक संघर्ष और सिद्धांतों का जिक्र करते हुए मुज़फ्फर शाह ने एक और बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि उनके पास मुख्यमंत्री बनने के कई मौके आए, लेकिन उन्होंने सत्ता के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

मुज़फ्फर शाह ने भावुक होते हुए कहा, “मैं भी कब का मुख्यमंत्री बन गया होता, लेकिन मैंने उसमें (कुर्सी में) ठोकर मार दी।” यह बयान दर्शाता है कि मुज़फ्फर शाह खुद को कश्मीर की उस सत्तावादी राजनीति से अलग दिखाना चाहते हैं, जिस पर अक्सर वंशवाद और तुष्टीकरण के आरोप लगते रहे हैं।

कौन हैं मुज़फ्फर शाह?

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में मुज़फ्फर शाह एक बड़ा नाम हैं। उनके राजनीतिक कद को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है-

  • पारिवारिक विरासत: वह जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री जी.एम. शाह (Ghulam Mohammad Shah) के पुत्र हैं। जी.एम. शाह ने ही ‘अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस’ की स्थापना की थी।

  • शेख अब्दुल्ला से संबंध: मुज़फ्फर शाह, शेर-ए-कश्मीर कहे जाने वाले शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के सगे भतीजे हैं।

  • विशिष्ट पहचान: अब्दुल्ला परिवार से जुड़े होने के बावजूद उनकी पार्टी अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस अक्सर नेशनल कॉन्फ्रेंस की नीतियों की मुखर आलोचक रही है।

सियासी गलियारों में हड़कंप

मुज़फ्फर शाह के बयान के बाद कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए इन आरोपों का जवाब देना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि यह दावा उसी परिवार के एक सदस्य ने किया है जो उस दौर की राजनीति का गवाह रहा है।

बता दें कि कश्मीर के इतिहास में 1986 अनंतनाग दंगा वह काला पन्ना हैं, जिसने कश्मीरी पंडितों के पलायन की भूमिका तैयार की थी। वहीं अब मुज़फ्फर शाह का यह स्वीकारोक्ति कि उस समय सत्ताधारी दलों के कार्यकर्ताओं ने मंदिर जलाए थे, उस दौर की ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ पर बड़े सवाल खड़े करती है।

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Shivam Dixit
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अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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