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मंदिरों के साथ सामरिक,सामाजिक, आर्थिक उद्धार भी जरुरी

बीते कुछ दशकों से हिंदू, यहां वाग्देवी सरस्वती के मंदिर होने का दावा बता रहे थे। उन्हें बड़े जनआंदोलन और न्यायिक प्रक्रिया द्वारा पूजा का अधिकार बीते वर्षों में मिला था।

Written byमुनीश त्रिपाठीमुनीश त्रिपाठी — edited by Mahak Singh
May 20, 2026, 02:32 pm IST
inभारत
धार स्थित भोजशाला

धार स्थित भोजशाला

अयोध्या में प्रभु श्रीराम का भव्य दिव्य मंदिर  का निर्माण लंबी न्यायिक प्रक्रिया और संघर्ष  के बाद संभव हुआ। बीते 15 मई को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी धार में ज्ञान की अधिष्टाती देवी सरस्वती के प्राचीन मंदिर होने का निर्णय सुनाया साथ ही हिंदुओं के सर्व अधिकार का निर्णय देकर मुस्लिम पक्ष के मजहबी अधिकारों को ख़ारिज कर दिया। इस मंदिर का निर्माण ज्ञानी, साहित्य प्रेमी राजा भोज ने  सन 1034 में करवाया था, साथ ही परिसर में एक महाविद्यालय की भी स्थापना की थी। बाद में दिल्ली सल्तनत के क्रूर हिंदू विरोधी शासक अलाउद्दीन खिलजी ने  इस्लामिक वर्चस्वता के कारण इस मंदिर को ध्वंस करवा दिया। बाद में यहां परवर्ती मुस्लिम शासकों ने एक बड़ी मस्जिद का निर्माण करवा दिया।

मंदिरों के ऐतिहासिक दावे और न्यायिक विवाद

बीते कुछ दशकों से हिंदू, यहां वाग्देवी सरस्वती के मंदिर होने का दावा बता रहे थे। उन्हें बड़े जनआंदोलन और न्यायिक प्रक्रिया द्वारा पूजा का अधिकार बीते वर्षों में मिला था। परन्तु पूर्ण अधिकार प्राप्त नहीं था। मंदिर पक्ष के अधिवक्ता पिता पुत्र हरिशंकर जैन और विष्णु शंकर जैन है। ये दोनों अधिवक्ता, देश भर के  काशी, मथुरा सहित दर्जनों हिंदुओं के प्रमुख दावों वाले विवादित धर्म स्थलों की पैरवी कर रहे है। हिंदू मान्यता के अनुसार जिन पर मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा मंदिरों को तोड़कर मस्जिदों का निर्माण किया गया है। लगभग सभी की पैरवी ये पिता पुत्र अधिवक्ता ही कर रहे है। उनका कहना है कि भारत में ऐसे सैकड़ों हिंदू मंदिर थे जिन पर ताकत और सत्ता के कारण मस्जिदें बना ली गई है। उन सबकी  मुक्ति वह न्यायिक प्रक्रिया द्वारा निकट भविष्य में करवाएंगे। यह सही है भारत में मंदिर आस्था के ही नहीं विद्या, संस्कार, शिक्षा, चेतना के केंद्र भी रहे है। दक्षिण भारत में चोल, पल्लव तथा विजयनगर प्राचीन साम्राज्य में तो मंदिर प्रशासन, राज्य और अर्थव्यवस्था के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। इसलिए इनका पुनरुद्वार, पुनर्निर्माण आवश्यक है। परंतु उससे भी ज्यादा आवश्यकता भारतीय, राष्ट्रीय समाज की सुरक्षा व्यवस्था की है।

सांस्कृतिक सुरक्षा और समाज की सशक्त भूमिका

भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है, जहाँ विविध पंथिक , सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराएँ सहस्राब्दियों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। हिंदू समाज ने भारतीय संस्कृति, दर्शन, साहित्य, विज्ञान, कला और राष्ट्रीय जीवन को गहराई से प्रभावित किया है। वर्तमान समय में देश में अनेक धार्मिक स्थलों, सांस्कृतिक विरासतों तथा ऐतिहासिक विवादों को लेकर न्यायिक और सामाजिक स्तर पर विमर्श चल रहा है। ऐसे समय में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि केवल मंदिरों या धार्मिक स्थलों की सुरक्षा पर्याप्त है या उससे अधिक आवश्यक एक सशक्त, शिक्षित, संगठित और आत्मविश्वासी समाज का निर्माण है। वास्तव में किसी भी सभ्यता की स्थायी सुरक्षा उसके सामाजिक आधार की मजबूती पर निर्भर करती है। अतः हिंदू समाज की सुरक्षा का प्रश्न केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, शैक्षिक, आर्थिक, वैचारिक, सामरिक और राष्ट्रीय आयामों से जुड़ा हुआ विषय है। वैश्विक कट्टर मुस्लिम जगत के लोग,पीएफआई जैसे कई संगठन भारत को दारुल हरब मानकर, दारुल इस्लाम बनाने का मंसूबा पाले हुए है जो आये दिन हिंसक, विध्वंसक वारदातें करते रहते है। भारतीय सरकार के साथ साथ, भारतीय समाज को भी चौकन्ना होकर मुकाबला करना होगा।

सांस्कृतिक जागरूकता और समाज की आत्मरक्षा

किसी भी समाज की शक्ति उसकी सांस्कृतिक स्मृति में निहित होती है। हिंदू समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक अपनी परंपराओं, ग्रंथों, महापुरुषों और इतिहास के प्रति जागरूकता का अभाव है। यदि समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, तो वह बाहरी वैचारिक दबावों के प्रति अधिक प्रभावित हो जाता है। इसलिए आवश्यक है कि भारतीय इतिहास को संतुलित और प्रमाणिक दृष्टि से समझा जाए। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों तथा सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से भारतीय दर्शन, वेदांत, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भक्ति आंदोलन, संत परंपरा और स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू समाज के योगदान का अध्ययन बढ़ाया जाना चाहिए। सांस्कृतिक गौरव का अर्थ किसी अन्य समुदाय के प्रति विरोध नहीं, बल्कि अपनी पहचान और परंपरा के प्रति आत्मविश्वास होना चाहिए। स्वाधीनता के पहले और बाद में भी हिंदू,धार्मिक जानलेवा हमले, धर्मान्तरण, जनसंख्या असुन्तलन, अवैध घुसपैठियेजैसी समस्याओं से जूझ रहा है, जिसका तत्काल समाधान होना आवश्यक है।

ज्ञान, शिक्षा और वैचारिक सशक्तिकरण

आज का युग ज्ञान और सूचना का युग है। यदि कोई समशिक्षा, अनुसंधान और बौद्धिक नेतृत्व में पिछड़ जाता है तो वह दीर्घकाल में कमजोर हो जाता है। हिंदू समाज की सुरक्षा केवल भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और वैचारिक स्पष्टता से सुनिश्चित होगी। उच्च शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, न्यायपालिका, मीडिया और अकादमिक जगत में अधिकाधिक उच्च संस्कारित प्रतिनिधित्व आवश्यक है। साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधुनिक शोध को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। संस्कृत भाषा, भारतीय दर्शन, आयुर्वेद, योग और पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत करना समय की आवश्यकता है।

डिजिटल युग, सामाजिक समरसता और वैचारिक एकता

डिजिटल युग में सोशल मीडिया और इंटरनेट वैचारिक संघर्ष के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। इसलिए युवाओं को तथ्यपरक अध्ययन, तार्किक संवाद और संवैधानिक मूल्यों के साथ अपनी बात रखने का प्रशिक्षण भी आवश्यक है जिससे देशभक्त बौद्धिक योद्धाओं का निर्माण हो सके। हिंदू समाज की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक उसकी आंतरिक विभाजित संरचना रही है। जातिगत भेदभाव, सामाजिक दूरी और क्षेत्रीय विभाजन ने समाज की सामूहिक शक्ति को प्रभावित किया है। यदि समाज स्वयं भीतर से विभाजित रहेगा तो बाहरी चुनौतियों का सामना करना कठिन होगा। इसलिए सामाजिक समरसता हिंदू समाज की सुरक्षा का मूल आधार होना चाहिए। संत रविदास, कबीर, नारायण गुरु, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और अनेक सामाजिक सुधारकों ने समानता और सामाजिक न्याय पर बल दिया। मंदिर, धर्म और संस्कृति तभी सुरक्षित रहेंगे जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान और सहभागिता का अनुभव करेगा। तभी गैर धर्म के कट्टरपंथी,हिंदू धर्म और समुदाय पर आघात करने की हिम्मत नहीं कर सकेंगे । जाति-आधारित भेदभाव, अस्पृश्यता और सामाजिक बहिष्कार जैसी प्रवृत्तियों का पूर्ण त्याग आवश्यक है। धार्मिक आयोजनों, सामाजिक संस्थाओं और सांस्कृतिक मंचों पर समावेशी दृष्टिकोण विकसित किया जाना चाहिए।

आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक विकास

किसी भी समाज की स्थिरता उसके आर्थिक आधार पर निर्भर करती है। आर्थिक रूप से कमजोर समाज दीर्घकाल में अपनी सांस्कृतिक संस्थाओं और शैक्षिक संरचनाओं को सुरक्षित नहीं रख सकता। इसलिए हिंदू समाज के व्यापक वर्गों में उद्यमिता, कौशल विकास और आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना आवश्यक है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, लघु उद्योग, पारंपरिक कारीगरी, कृषि और स्टार्टअप संस्कृति को प्रोत्साहित करने से समाज की सामूहिक शक्ति बढ़ेगी। धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं को केवल अनुष्ठानों तक सीमित न रहकर शिक्षा, स्वास्थ्य, छात्रवृत्ति और रोजगार सृजन में भी योगदान देना चाहिए। दान और सेवा की भारतीय परंपरा को आधुनिक सामाजिक संस्थाओं से जोड़कर समाज के कमजोर वर्गों को आगे बढ़ाने का प्रयास होना चाहिए।

Topics: Judicial Process Religious PlacesHindu Culture and HistoryVeda Upanishad StudiesIndian knowledge traditionDigital Age and SocietyAyodhya Ram TempleEconomic Self-RelianceIndian Cultural HeritageRural Economy Developmenttemple-mosque disputeSmall Industries IndiaCultural RenaissanceSkill Development SchemeSaraswati Temple DharStartup Culture IndiaRaja Bhoj Temple HistoryAncient Civilization of IndiaIndian Religious Places Dispute
मुनीश त्रिपाठी
मुनीश त्रिपाठी
मुनीष त्रिपाठी पत्रकार, इतिहासकार और साहित्यकार हैं। हाल ही में प्रकाशित चर्चित पुस्तक 'आंबेडकर, हिंदुत्व और भारत' के लेखक। उन्हें उनकी पुस्तक' विभाजन की त्रासदी'के लिये यूपी हिंदी संस्थान द्वारा प्रतिष्ठित "केएम मुंशी" पुरस्कार दिया गया है। औरैया जनपद प्रशासन ने उन्हें पत्रकारिता और साहित्य में 'औरैया रत्न' से विभूषित किया है। 'भरतपुर का सूरजमल' , the line which divided bharat अन्य प्रसिद्ध पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। [Read more]
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