दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी (AAP) के कई अन्य नेताओं को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस ‘क्रिमिनल अवमानना’ (क्रिमिनल कंटेंप्ट) के एक मामले में भेजा गया है। आरोप है कि इन नेताओं से जुड़े सोशल मीडिया हैंडल और समर्थकों ने दिल्ली हाई कोर्ट की एक जज जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक और इमेज खराब करने वाली पोस्ट साझा की थीं।
क्या है पूरा विवाद?
यह पूरा विवाद दिल्ली की चर्चित ‘आबकारी नीति’ (एक्साइज पॉलिसी केस) से जुड़ा है। इस केस में सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें केजरीवाल, सिसोदिया और 21 अन्य लोगों को बरी कर दिया गया था। जब यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा की बेंच के सामने आया तो उस दौरान कुछ AAP नेताओं ने मांग की थी कि जस्टिस शर्मा खुद को इस मामले से अलग कर लें। हालांकि, जस्टिस शर्मा ने इस मांग को खारिज कर दिया था। इसके बाद सोशल मीडिया पर जज के खिलाफ एक अभियान सा छिड़ गया और कई आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं।
जस्टिस शर्मा ने क्या कहा था?
जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा ने अपने आदेश में बेहद सख्त टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा कि उनके और कोर्ट के खिलाफ ‘अत्यंत अपमानजनक और मानहानिकारक’ सामग्री फैलाई जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की आलोचना करना एक बात है, लेकिन किसी जज को जानबूझकर पक्षपाती दिखाने के लिए सोचा-समझा अभियान चलाना बिल्कुल अलग और गंभीर अपराध है।
जस्टिस शर्मा ने इस अवमानना मामले को शुरू किया, लेकिन न्यायिक गरिमा बनाए रखने के लिए उन्होंने मुख्य आबकारी नीति मामले को किसी दूसरी बेंच में ट्रांसफर कर दिया।
इसे भी पढ़ें: खाड़ी संकट के बीच केंद्र सरकार की दो टूक, भारत रूस से तेल खरीदता रहेगा
4 अगस्त को होगी सुनवाई
इस मामले की अगली सुनवाई अब 4 अगस्त को तय की गई है। फिलहाल यह अवमानना मामला जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंद्र दुडेजा की डिविजन बेंच के पास है। वहीं मुख्य आबकारी नीति केस की सुनवाई जस्टिस मनोज जैन की बेंच करेगी। हाईकोर्ट ने सभी संबंधित नेताओं को 4 सप्ताह का समय दिया है ताकि वो अपना जवाब दाखिल कर सकें।
क्या है आबकारी नीति केस?
आपको बता दें कि, यह विवाद तब शुरू हुआ जब 27 फरवरी को एक निचली अदालत ने अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत 21 आरोपियों को बरी कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि अभियोजन पक्ष (सीबीआई) का केस पूरी तरह से अविश्वसनीय है। इसी फैसले के खिलाफ सीबीआई हाईकोर्ट पहुंची और उसी दौरान आप के नेताओं ने जज पर टिप्पणी कर दी जिसके कारण यह अवमानना विवाद खड़ा हो गया।

















