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‘मुसलमानों में राष्ट्रवादी नेतृत्व का अभाव’

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने समाचार एजेंसी पीटीआई को एक साक्षात्कार दिया है। प्रस्तुत हैं उसके मुख्यांश-

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 19, 2026, 04:04 pm IST
inसंघ को जानें, संघ @100

प्रधानमंत्री की अपील का समर्थन

युद्ध जैसी स्थिति हो या न हो, भारतीय जीवनशैली में सादगी और संयम हमेशा होना चाहिए। संकट के समय यह और ज्यादा जरूरी हो जाता है। भारत दुनिया के देशों और नेताओं को शांति और समझदारी का संदेश देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

ईरान-अमेरिका युद्ध

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष सभ्यताओं का संघर्ष नहीं, बल्कि तेल और संसाधनों को लेकर पैदा हुआ विवाद है। दुनिया के ज्यादातर युद्ध लालच, अहंकार और दूसरों पर कब्जा करने की मानसिकता से जन्म लेते हैं। इतिहास में हर दौर में युद्ध होते रहे हैं और आगे पानी को लेकर भी संघर्ष की आशंका जताई जा रही है। युद्ध मानवता को खत्म नहीं करेंगे, लेकिन मानव जीवन और व्यवस्था को जरूर बदल देंगे।

ईसाई और मुस्लिम भी एक नहीं

मौजूदा संघर्ष को विचारक सैमुअल हंटिंगटन के ‘सभ्यताओं के संघर्ष वाले सिद्धांत’ के नजरिए से नहीं देख सकते। सभी ईसाई देश अलग-अलग हैं, मुस्लिम देश भी एक मंच पर नहीं हैं।

शाश्वत है सनातन

सनातन शाश्वत है, यह समाप्त नहीं हो सकता। सनातन बरगद के पेड़ की तरह अविनाशी है और यह किसी के कहने से खत्म नहीं होगा। सनातन सार्वभौमिक जीवन मूल्य है, जो समय के साथ नया रूप लेता रहता है। भारतीय जीवन—मूल्य पश्चिम की सामाजिक समस्याओं का समाधान दे सकते हैं। परिवार, बड़ों का सम्मान, योग और गीता जैसे भारतीय संस्कार पश्चिमी समाज के लिए भी उपयोगी हैं।

भारत हिंदू राष्ट्र है

हम हिंदू राष्ट्र बना नहीं रहे हैं, यह पहले से हिंदू राष्ट्र है। ब्रिटिश शासन के समय भी यह हिंदू राष्ट्र ही था। हिंदू राष्ट्र का अर्थ सांस्कृतिक पहचान से है, न कि धार्मिक राज्य से। कन्वर्जन से राष्ट्रीयता नहीं बदलती। जब राष्ट्रीयता एक है तो हम किसी को अलग नहीं मानते। भारत में मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक नहीं माना जाता। सरकारी योजनाओं का लाभ सभी तक पहुंच रहा है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लगातार अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं से बात करता है।

संघ किसी मजहब के विरुद्ध नहीं

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब पश्चिमी देशों के बुद्धिजीवियों, प्रोफेसरों और नीति—निर्माताओं से सीधे मिलकर अपनी बात रख रहा है। संघ समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण का संगठन है, किसी मजहब के खिलाफ नहीं। संघ स्वयं को ‘एंटी-माइनॉरिटी’ नहीं मानता।

मेहनती हैं भारतीय

विदेशों में हनुमान मंदिर या मूर्तियां गैरकानूनी तरीके से नहीं बनाई गईं। भारतीय आमतौर पर कानून मानने वाले लोग हैं और उनकी अपराध दर भी कम है। कई देशों में भारतीयों ने मेहनत से अपनी पहचान बनाई है, लेकिन उनकी सफलता से कुछ लोगों में नौकरी छिनने का डर पैदा होता है। जिस देश में भी भारतीय रहते हैं, कमाते हैं, उसके प्रति जिम्मेदारी और वफादारी भी दिखानी चाहिए। भारत से जुड़ाव स्वाभाविक है, लेकिन वहां के समाज और समुदाय की चिंता करना भी जरूरी है। भाषा, राज्य और जाति के आधार पर बंटने के बजाय भारतीयों को साथ मिलकर काम करना चाहिए। अमेरिका और दूसरे देशों में बसे भारतीयों को समाज सेवा, दान और लोककल्याण में ज्यादा भागीदारी करनी चाहिए।

स्वीकार नहीं लव जिहाद

लव जिहाद तब होता है जब कोई एजेंडा हो, हिंदू लड़कियों को ले जाने की सोची-समझी साजिश हो। यह मंजूर नहीं है। जब यह एकतरफा हो तो यह प्यार नहीं एक साजिश है।

हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता

आज के समय में मुस्लिम समुदाय के भीतर राष्ट्रवादी नेता का मिलना कठिन हो गया है। वर्तमान परिस्थितियां ऐसी बना दी गई हैं कि मुस्लिम समाज में केवल उन्हीं नेताओं को व्यापक समर्थन मिल पाता है जो अलगाववादी विचार रखते हों। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई प्रखर राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता हुआ करते थे, जिन्होंने मां भारती की सेवा को सर्वोपरि रखा। सचाई यह है कि मुसलमानों में राष्ट्रवादी नेतृत्व का फिलहाल अभाव है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि विभाजन के बाद भारत में ‘छद्म पंथनिरपेक्ष’ दलों ने जन्म लिया। इन दलों की तुष्टीकरण की नीतियों ने ही ऐसी स्थितियां पैदा कीं, जहां अलगाववादी स्वर मुखर हुए। यदि कोई मुस्लिम नेता अपने समुदाय का समर्थन चाहता है, तो उसे अक्सर अलगाववादी रुख अपनाना पड़ता है। राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता आज भी मौजूद हैं, लेकिन तंत्र में घुसे लोग उन्हें हाशिए पर धकेल देते हैं।

मजहबी राजनीति देश के लिए घातक

नेतृत्व बुरा नहीं है और हर समुदाय का अपना नेतृत्व होना चाहिए, लेकिन जब कुछ राजनीतिक दलों का आधार केवल ‘मजहब’ हो जाता है, तो वहां से देश के लिए समस्या शुरू होती है। केरल में ईसाई समुदाय के नाम पर पार्टियां बनी हैं, इसी तरह सिख आधारित पार्टियां भी हैं। इस विषय पर राष्ट्रव्यापी चर्चा की आवश्यकता है। कभी पंडित नेहरू, संपूर्णानंद और महात्मा गांधी जैसे नेताओं के बीच भी इस गंभीर विषय पर विमर्श हुआ था।

हिंदू वोटर बना हिंदू वर्कर

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में संघ के स्वयंसेवकों ने नागरिक के तौर पर हर स्तर पर काम किया। बंगाल में हर हिंदू वोटर हिंदू वर्कर बन गया था। नतीजों से यह सिद्ध होता है कि जब जनता परेशान होगी तो पलटवार करेगी।

पाकिस्तान से बातचीत बंद न हो

भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए। दोनों देशों को एक-दूसरे को वीजा भी देना चाहिए। खेलकूद और व्यापार भी होना चाहिए, लेकिन पुलवामा जैसे हमले का जवाब भी मजबूती से देना होगा। भारत और पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक संबंध पुराने हैं और हम एक ही राष्ट्र रहे हैं। राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व पर भरोसा कम होने के कारण पाकिस्तान के खिलाड़ियों, वैज्ञानिकों और सिविल सोसायटी को आगे आना चाहिए।

 

Topics: राष्ट्रवादी मुस्लिमसांस्कृतिक पहचानसंघ दृष्टिसनातन धर्मतुष्टीकरण की नीतिलव जिहादछद्म पंथनिरपेक्षदत्तात्रेय होसबालेअलगाववादी विचारमजहबमजहबी राजनीतिमुस्लिम समाजहिंदू राष्ट्रपाञ्चजन्य विशेषRSS
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