उत्तराखंड में जड़ी-बूटियों का ‘खजाना’ मिला, 1011 औषधीय पौधों खोज पतंजलि ने चौंकाया
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उत्तराखंड में जड़ी-बूटियों का ‘खजाना’ मिला, 1011 औषधीय पौधों को खोज पतंजलि ने चौंकाया

आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि जनजातीय समाज के पास प्रकृति और औषधीय वनस्पतियों का जो पारंपरिक ज्ञान है, वह मानवता की अमूल्य धरोहर है।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो — edited by Mahak Singh
May 18, 2026, 05:01 pm IST
inउत्तराखंड
आचार्य बालकृष्ण

आचार्य बालकृष्ण

हरिद्वार: अभी तक उत्तराखंड में 1300 औषधीय पौधों का रिकॉर्ड है, लेकिन अकेले पतंजलि ने जनजातीय इलाकों के सिर्फ़ पांच ज़िलों में स्टडी करके 1011 पौधे खोजे और अब इससे कहीं आगे बढ़कर पतंजलि के साइंटिस्ट और रिसर्चर की टीम उत्तराखंड के 13 ज़िलों में दूसरे औषधीय पौधों की खोज में लगी हुई है।

उत्तराखंड में औषधीय पौधों की नई खोज

टीम को पॉजिटिव रिजल्ट मिले हैं और यह उत्तराखंड में अब तक मिले 1300 मेडिसिनल प्लांट्स के रिकॉर्ड को भी पार कर सकता है। यह पहली बार होगा कि पूरे उत्तराखंड में नई औषधीय पौधों की खोज को लेकर नई तस्वीर सामने आ सकती है। आचार्य बालकृष्ण के निर्देशन में उत्तराखंड के चार जिलों देहरादून, चमोली, पिथौरागढ़ और उद्यमसिंहनगर में टीम गांव-गांव तक पहुंची। जब टीम ने जनजातीय लोगों से जानकारी जुटाने शुरू की तो कई अहम बातें सामने आने लगी। लगा जैसे जड़ी-बूटियों का छिपा खजाना मिल गया हो। टीम पहाड़ों और तराई के गांवों में खूब चली।

आंकड़े खुद कहानी बनते चले गए। आचार्य की टीम 122 गांव, 14 तहसील तक गई। इन इलाकों में जाकर शोधकर्ताओं ने सीधे उन लोगों से बात की, जिनके पास पीढ़ियों से संचित चिकित्सा ज्ञान है। आश्चर्यजनिक रूप से पूरी कवायद में 216 जनजातीय वैद्यों की पहचान की गई और सभी अलग-अलग तरीके से इलाज करते थे। हर वैद्य अपने आप में एक ‘ज्ञान का भंडार’ निकला। इन वैद्यों से बातचीत के दौरान 238 औषधीय पौधों का वैज्ञानिक आधार पर दस्तावेजीकरण किया गया। यह इसलिए भी और महत्वपूर्ण हो जाता है कि इससे पहले ऐसे  पौधों के बारे में आम दुनिया शायद ही जानती थी। इस पहल में उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियों की भागीदारी सामने आई है।जौनसारी ( 39%), भोटिया (36%),  थारू (10%), बुक्सा (9%) और वन राजी ( 6%) ।

अमूमन हर बीमारी का जनजातीय लोग कर रहे थे इलाज

पतंजलि टीम के अध्ययन के दौरान देखने में आया कि जनजातीय लोग पेट दर्द, कोल्ड-कफ, कान-गला, बुखार, मधुमेह, धाव-चोट, दांत दर्द, डायरिया, मलेरिया-डेंगू, पाइल्स, उल्टी-दस्त, अस्थमा-मुंह के छाले, हडि्डयों को जोड़ना, किडनी में पथरी, आंख सहित कई अन्य बीमारियों का उपचार कर रहे थे। इसमें सबसे अधिक उपचार जनजातीय क्षेत्रों के लोग ज्वाइंट पेन और अर्थराइटिस में करते थे।

पहली बार जनजातियों की जियो टैगिंग पतंजलि ने की

पतंजलि की टीम को पांच जिलों में जहां जनजातियां रहती है, वहां उनकी जानकारी जुटाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। घुमंतू प्रवृति वाले जनजातियों का एक जगह बसेरा नहीं था। लिहाजा इनसे जानकारी हासिल करना आसान नहीं था। इसी कड़ी में जनजातीय परिवारों की पतंजलि की टीम ने जियो टैगिंग की। जो अब तक भारत में कहीं भी किसी ने नहीं की है। सरकार भी 50 हजार जनजातीय परिवार की मौजूदगी की बात कहते आ रही थी। लेकिन पतंजलि ने ही बताया कि 28 हजार के करीब जनजातीय परिवार यहां रहता है। इसके अलावा, इन जनजातीय परिवारों को कृषि, व्यवसाय, नौकरी-पेशा से जोड़ने का प्लेटफार्म भी पतंजलि ने ही उपलब्ध कराया। जनजातियां समुदायों को अपने प्रोडक्ट को अन्रदाता एप के माध्यम से बिना किसी बिचौलिये के अपने उत्पाद को बेच का माध्यम भी पतंजलि ही बना।

जनजातीय औषधीय ज्ञान संरक्षण अभियान

आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि जनजातीय समाज के पास प्रकृति और औषधीय वनस्पतियों का जो पारंपरिक ज्ञान है, वह मानवता की अमूल्य धरोहर है। पतंजलि ने उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्रों में पहुंचकर इस विलुप्त होती विरासत को वैज्ञानिक रूप से संरक्षित करने का कार्य शुरू किया है। अभी तक सीमित क्षेत्रों के अध्ययन में 1011 औषधीय पौधों की पहचान हो चुकी है और अब पतंजलि के वैज्ञानिकों की टीम पूरे 13 जिलों में नए औषधीय पौधों की खोज में दिन-रात कार्य में जुटी है। प्रारंभिक परिणाम अत्यंत सकारात्मक हैं। आंकड़ों के पूर्ण संकलन के बाद उत्तराखंड में औषधीय वनस्पतियों की एक नई तस्वीर सामने आ सकती है। यह कार्य अत्यंत दुरुह और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन पतंजलि इसे जनजातीय समाज सहित अन्य के सहयोग से सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रहा है।

 

Topics: Ayurvedic medicinal plantsUttarakhand NewsAcharya BalkrishnaPatanjali ResearchUttarakhand medicinal plantsdiscovery of medicinal plantstribal knowledge conservationUttarakhand Botanical Surveymedicinal plants in Uttarakhand
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