पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी लगातार बड़े कदम उठा रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने फैसला किया है कि सरकार 2011 से अब तक जारी किए गए सभी जाति प्रमाणपत्रों की फिर से जांच शुरू करेगी। इस काम के लिए जिला प्रशासन को साफ निर्देश दे दिए हैं। इसमें ‘दुआरे सरकार’ कैंपों के जरिए बांटे गए प्रमाणपत्र भी शामिल हैं।
पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों को चिट्ठी लिखकर कहा है कि 2011 से 2026 तक जारी एससी, एसटी और ओबीसी प्रमाणपत्रों का पुनः सत्यापन किया जाए। यह पूरी प्रक्रिया पिछले 15 सालों को कवर करेगी।
कितने प्रमाणपत्रों की जांच होगी?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इन 15 सालों में राज्य में कुल करीब 1.69 करोड़ जाति प्रमाणपत्र जारी किए गए थे। इनमें करीब 1 करोड़ एससी प्रमाणपत्र, 21 लाख एसटी प्रमाणपत्र और 48 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र शामिल हैं। सरकार का कहना है कि जांच का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति गलत तरीके से आरक्षण का फायदा न उठा सके।
क्या होगा अगर फर्जी पाया गया?
सूत्रों के अनुसार, अगर किसी ने फर्जी दस्तावेज देकर प्रमाणपत्र बनवाया है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही, अगर कोई सरकारी अधिकारी पैसे या किसी और लाभ के चक्कर में गलत व्यक्ति को प्रमाणपत्र जारी करता पाया गया तो उस पर भी सख्त एक्शन लिया जाएगा।
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क्यों पड़ी जरूरत?
पिछली सरकार के समय कुछ प्रमाणपत्र जारी करने में अनियमितताओं की शिकायतें आई थीं। इन्हीं शिकायतों के आधार पर नई सरकार ने यह कदम उठाया है।
कोर्ट और आयोग का फैसला
मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 2010 के बाद जारी सभी ओबीसी प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि 2010 के बाद बनी ओबीसी सूची कानून के अनुसार नहीं थी।इसके अलावा, दिसंबर 2025 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने पश्चिम बंगाल की 35 जातियों (जो मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय से थीं) को केंद्रीय ओबीसी सूची से बाहर कर दिया था।
भाजपा लंबे समय से यह आरोप लगाती रही है कि पिछली ममता बनर्जी सरकार ने ओबीसी सूची में हेरफेर करके खास समुदायों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की थी। जिला स्तर पर अधिकारी इसकी जांच में जुट गए हैं। आम लोगों को भी इसकी जानकारी दी जा रही है ताकि जो सही हैं, उन्हें कोई परेशानी न हो।















